मुख्यपृष्ठनए समाचारमेहनतकश : ऑटोरिक्शा ही नहीं वह तो पूरा घर चला रही है 

मेहनतकश : ऑटोरिक्शा ही नहीं वह तो पूरा घर चला रही है 

आनंद श्रीवास्तव

ऑटोरिक्शा चलाना अब सिर्फ पुरुषों का पेशा नहीं रह गया है। अब इसमें कई महिलाएं भी शामिल हो गई हैं और बेहतरीन ढंग से अपनी ड्यूटी निभा रही हैं। घर का काम करने के बाद ये महिलाएं ऑटोरिक्शा चलाकर अपने परिवार के लिए रोजी-रोटी का साधन भी जुटा रही हैं। इन्हीं महिला ऑटोरिक्शा चालकों में से एक हैं सायन के प्रतीक्षा नगर में रहनेवाली शर्मिला म्हापर्ले, जो सुबह ८ बजे से लेकर शाम ६ बजे तक ऑटोरिक्शा चलाकर अपना घर चला रही हैं। पिछले पांच साल से वे ऑटोरिक्शा चला रही हैं। सुबह ६ बजे उठती हैं, बच्चे को तैयार कर स्कूल भेजती हैं, उसके बाद खाना पकाकर ८ बजे ऑटोरिक्शा लेकर मुंबई की सड़कों पर निकल पड़ती हैं। उसके बाद शाम को लगभग ५ बजे ऑटोरिक्शा में गैस भरवाकर घर लौटती हैं और फिर से रात के भोजन की तैयारी में जुट जाती हैं। उनके पति सचिन म्हापर्ले कहते हैं कि मैं भी कार ड्राइवर हूं। मेरी पत्नी शर्मिला ने खुद ही ड्राइविंग की इच्छा व्यक्त की, उसके बाद मोटर ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट से ऑटोरिक्शा सीखी और लाइसेंस मिलने के बाद खुद का परमिट भी ले लिया और उतर गई ड्यूटी पर। सचिन कहते हैं कि शर्मिला की कमाई से मुझे सहारा मिल गया है। एक साल तो मैं बीमार था, बीमारी के कारण पूरे साल घर पर आराम करता रहा, उस वक्त शर्मिला की कमाई पर ही मेरा पूरा परिवार आश्रित था। तब मैं लोगों से कहता कि सिर्फ ऑटोरिक्शा ही नहीं, वह तो पूरा घर चला रही है, जबकि शर्मिला इसे अपना फर्ज समझती हैं। वे कहती हैं कि असंख्य महिलाएं नौकरी या व्यवसाय करती हैं, मैं भी वही कर रही हूं। शर्मिला म्हापर्ले ने अपने ऑटोरिक्शा चालक के तौर पर मिले अनुभव के बारे में बात करते हुए कहा कि अक्सर लोग ऑटो रोकने के लिए हाथ हिलाते हैं, लेकिन जब उन्हें महिला ड्राइवर दिखती है तो वे उसमें चढ़ने से इनकार कर देते हैं। कई लोग हमारा मजाक भी उड़ाते हैं। शर्मिला कहती हैं कि महिलाएं आज हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। मैंने भी तो अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए ऑटो चलाना शुरू किया है, तो इसमें गलत क्या है? शर्मिला कहती हैं कि कई जगह महिला ड्राइवरों को ऑटो स्टैंड पर कतार में खड़े होने की अनुमति नहीं मिलती है। यहां तक कि अगर मैं कतार का पालन भी करती हूं, तो पुरुष ड्राइवर मेरी बारी को रोकते हुए लाइन पार कर जाते हैं। वह इस अघोषित नियम पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहती हैं कि ऐसा बर्ताव हमारे साथ नहीं होना चाहिए। अब धीरे-धीरे पुरुष ऑटोरिक्शा चालकों का हमें बहुत अच्छा सहयोग मिलना शुरू हो गया है। लेकिन अभी भी कई बार पैसेंजरों के ताने सुनने को मिलते रहते हैं। शर्मिला कहती हैं कि `हम पुरुष ड्राइवरों या यात्रियों से किसी विशेष व्यवहार की उम्मीद नहीं करते हैं, हम बस यही चाहते हैं कि वे हमारे साथ इंसानों जैसा व्यवहार करें।’

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