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डमरूगंज के बरात में मुसाफिर चचा

(लेखक ‘बखार कला पत्रिका’ के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

बरात डमरूगंज के पहिले वाले बड़के बाग में रुकनी थी। मुसाफिर चचा सबको समझाकर भेज दिए थे। सीधे पूरबै निकल जाना है। सबसे बड़का ताल के और आगे कच्ची सड़क से दहिने मुड़ जाना है। करीब मील भर चलने के बाद एक पीपल का पेड़ पड़ेगा। बड़की बखरी होगी। दरवाजे पर चौदह ठो भैंस बंधी होगी, तीन जोड़ी बर्धा पागुर कर रहे होंगे। पीपल के बड़का चबूतरा पर करीब पचास आदमी बैठ सकते हैं। दो-चार बैठे गप्प भी मार रहे होंगे। पहलवाइन का नइहर है वहां। वहीं रुक कर पानी-वानी पी सकते हैं लोग। उसके आगे करीब तीन मील चलने के बाद बड़का नार पड़ेगा, डांक कर उस पार पहुंच जाना है। चारों तरफ बरगद होगा बीच में कुआं भी होगा। हमेशा दो-चार लड़के वहीं भैंस चराते मिल जाएंगे।

लाठी लिए एक लड़का समझ न आनेवाला गीत गा रहा होगा। बस, वहीं सभी को रुकना है पर ध्यान रहे कोई भी घराती वाले से बिना पूरी बरात पहुंचे कुछ भी नहीं मंगाएगा। सारी हिदायतों के बाद बरात रवाना हो चुकी थी। शोखई, रमेशर, मालिक अपने साइकल से निकल गए थे। झूलन ददा करीब सात जने के संगे पैदलइ दाब दिए थे। लकड़ू आपन जूता डंडा में बांधकर डंडा कंधे पर धरे आगे-आगे भागे जा रहे थे। दस-दस, बारह-बारह लोगों की दस-बारह टोली रात में ही निकल गई थी। होड़ मची थी पहले पहुंच जाने की। दूल्हा मुंडा मूड़ लिए जोड़ा-जामा तथा मउर पहने नोखई के इंतजार में था, उसी के साइकल पर पीछे बैठ वो बरात जाने वाला था। बड़की काकी दौड़ी-दौड़ी पहुंच गई थी नोखइ के घर।

पतोहिया बता रही थी कि वो तो कब के चले गए थे। काकी परेशान, पसीना बदबदा रहा था माथे पर। भागती हुई वापस लौट ही रही थीं काकी कि रास्ते में ही भेंटा गया नोखइ। का रे नोखइया कहां था रे। बेचारा दुलहवा परेशान बा। काकी साइकिल के चैनियइ टुटि गइ रही रे, चला गऽ रहे बनवावइ। अच्छा-अच्छा चल, जल्दी चल। जोड़ा-जामा पहने साइकिल पर बैठा दूल्हा तेज रफ्तार में भागा जा रहा था। जिसकी भी नजर पड़ती नजर उतारने लगते थे लोग। इधर देवथाने से पूजा-पाठ के बाद वापसी में रास्ते में ही नाच-गाना होने लगा था, बाद में फुआ-भौजी सब वापस आ गई थीं। रात नकटा होना था। हम तो बुढ़वा बाबू बनबऽ कमली भौजी बोल गई थीं, शरमा गई थीं बड़की अम्मा।

बरात थोड़ा-थोड़ा करके पहुंचने लगी थी। घराती वाले दर्जनों न्योहड़, खांची भरि उपरी, आलू, आटा आदि दे गए थे। चार-चार, पांच-पांच लोगों का समूह अपना खाना बनाने लगा था। कोई बगल में ही तालाब में नहाने चला गया था तो कोई बाटी और चोखा बनाने के लिए अहरा लगा रखा था। कोई सिखरन घोरने बैठा था तो कोई बरगदे तर बैठा देश-दुनिया की बातें गाए जा रहा था। चारों तरफ हो-हल्ला जारी ही था कि दूल्हा भी पहुंच गया था। थका-हारा होने के बाद भी ससुराल पहुंचने का सुख चेहरे से छलक रहा था। लोग मौका मिलते ही मजा लेने में पीछे नहीं रह रहे थे। नोखई भैंस चराने वाले कका से बतियाने लगे थे। अपने शादी के जुगत में लग गए थे, ४० बरिस के हो गए थे पर हाथ पीयर नहीं हुआ था। भैंस वाले चचा कुछ बता ही रहे थे कि भैंइसिया पड़ि गइ केहू के खेते में। बेचारू दौड़ पड़े और दूर चले गए दुबारा नहीं लौटे। बेचारे नोखइ को खाली हाथ ही लौटना पड़ा।

लकड़ू कांधे पर से जूता उतारकर चमकाने लगे थे। पहनकर दुवरा लगेंगे। अगुवई वही कर रहे थे। सभी बराती पहुंच गए हैं, खबर भी करवा दिए थे। चना, चबैना, सिखरन लिए घराती वाले आ गए थे। खाना खा चुकने के बाद भी बारह गिलास सिखरन सोख गया था बुधिया। उसका पेट बरात वाले दिन ही जगता था,बाकी दिनों में सो रहा होता था। घर का दाना बचाता था बाकी दूसरों का चबाता था। `पातर कोखा सरबस सोखा’ कहकर लोग चिढ़ाने लगे थे, बुधिया को कोई फर्क नहीं पड़ना था सो नहीं पड़ा।

शाम हो गई थी दुवरा लगने के लिए बरात निकल चुकी थी। घराती सेवा सत्कार को तैयार हो गए थे। हवाओं में भी हलचल सी मच गई थी।

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