दरख्त

कल अनायास ही मन किया
पहुंचा उस दरख्त के पास
उसके तने को एक टक निहारता
कुछ याद करता, कुछ याद आता
यही तो हुआ था, हमारा प्रणय मिलन
शिकवा शिकायत, रूठना मनाना,
हां यही दरख्त तो गवाह है।
मेरे और उनके मिलन का,
लेकिन उसे शायद पता नहीं,
कि अब तुम मुझसे दूर
बहुत दूर जा चुकी हो,
ये इसे बता भी नहीं सकता
डर है कहीं इस सदमे से
ये दरख्त मुर्झा ना जाए,
पूरन ठाकुर ‘जबलपुरी’
कल्याण

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