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धनगर समुदाय को एसटी का दर्जा देने की योजना के विरोध में आदिवासी संगठनों ने हाइवे पर यातायात रोक कर किया प्रदर्शन

– भाजपा सरकार के खिलाफ जमकर हुई नारेबाजी… आदिवासियों ने सरकार को दी चेतावनी… कहा- आरक्षण में घुसपैठ बर्दाश्त नहीं

योगेंद्र सिंह ठाकुर / पालघर

धनगर समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की किसी भी योजना के विरोध में आदिवासी एकता परिषद और भूमि सेना संगठनों के करीब हजारों आदिवासियों ने रविवार को पालघर के मनोर में मुंबई-अहमदबाद हाइवे पर यातायात रोक जमकर प्रदर्शन किया, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल रहीं। प्रदर्शनकारी आदिवासियों ने सरकार के विरोध में नारेबाजी की और आरोप लगाया कि सरकार की आदिवासियों के आरक्षण को लेकर नियत साफ नहीं और वह इसमें घुसपैठ करना चाहती है, जिसे आदिवासी किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे। हाथों में तख्तियां लिए हुए नारे लगा रहे कुछ प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि धनगर समुदाय को एसटी का दर्जा देना भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की एक चाल है। प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि धनगर समुदाय को पहले से ही अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) श्रेणी के तहत आरक्षण मिला हुआ है और उन्हें एसटी का दर्जा देने से आदिवासियों के लिए अवसर और कम हो जाएंगे। आदिवासियों के प्रदर्शन के दौरान घंटों कई किमी. तक हाइवे पर यातायात प्रभावित रहा। इस दौरान आदिवासियों ने अपनी मांगों संबंधित ज्ञापन उपजिलाधिकारी उमासे को सौंपा।
सरकार आदिवासियों की मार रही हक
भूमि सेना के अध्यक्ष और आदिवासियों के दिग्गज नेता कालू राम धोधडे ने कहा कि सरकार आदिवासियों का चौतरफा हक मार रही है। उन्होंने कहा कि जल-जंगल जमीन छीनने के बाद अब सरकार अब आदिवासियों के आरक्षण में भी घुसपैठ कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार आरक्षण को हथियार बना कर आपस में विभिन्न जातियों को लड़वाने का षड्यंत्र रच रही है। कालू राम धोधड़े ने सरकार से स्कूलों के निजीकरण के फैसले को तत्काल वापस लेने की मांग की है। उन्होंने कहा कि सरकार हिटलरशाही पर उतर गई है।
सरकार के खिलाफ मछुआरों का भी हल्ला बोल
पालघर के समुद्र तट पर स्थित वाढ़वन जिसे गोल्डन बेल्ट कहा जाता है। यहां केंद्र सरकार की अन्य दूसरी परियोजनाओं को लेकर भी किसान और मछुआरे विरोध कर रहे हैं। राज्य की राजधानी मुंबई से लगे पालघर जिले में ही पर्यावरण के लिए अति-संवेदनशील क्षेत्र वाढ़वण में बंदरगाह बनाने से जुड़ी परियोजना को लेकर स्थानीय लोगों ने हाइवे पर प्रदर्शन कर उन्हें उजाड़ने का आरोप लगाया। मछुआरों का कहना था कि इस परियोजना से कई गांवों की करीब एक लाख आबादी के प्रभावित होने की आशंका है। यह क्षेत्र जैव-विविधता और मछुआरों की आजीविका की दृष्टि से भी अहम है, वहीं आस-पास के क्षेत्र में हजारों किसान परिवार खेती करते हैं। वर्ष 2014 में केंद्र में भाजपानीत एनडीए सरकार आने के बाद प्रधानमंत्री ने इसे ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ बताया है। लगभग 65 हजार करोड़ रुपए की लागत से प्रस्तावित इस परियोजना में केंद्र 74 प्रतिशत और राज्य 26 प्रतिशत पैसा खर्च करेगी। इस इलाके में रहने वाले लोग पारंपरिक खेतीबाड़ी, मछली पालन और बागवानी को देखते हुए उन्होंने पूरी परियोजना खिलाफ लोगों को एकजुट करने का निर्णय लिया है। इनका आरोप है कि परियोजनाओं के अंतर्गत पर्यावरण को होने वाले नुकसान से जुड़े पर्याप्त अध्ययन नहीं किए जाते हैं। केंद्र की इस बंदरगाह परियोजना में भी यही चूक दोहराई जा रही है।

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