" /> ट्रंप का दावा…झूठ का पुलिंदा!

ट्रंप का दावा…झूठ का पुलिंदा!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दोस्त डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर हिंदुस्थान पर निशाना साधा है। व्हाइट हाउस छोड़ने के बाद अपने पहले ही सार्वजनिक भाषण में ट्रंप ने जलवायु परिवर्तन का मुद्दा उठाया और अपने उत्तराधिकारी जो बाइडन के उस पैâसले की आलोचना कर डाली, जिसमें उन्होंने पेरिस जलवायु समझौते में फिर लौटने का निर्णय लिया है। ट्रंप ने अपने कार्यकाल के दौरान यह कहते हुए कि पेरिस समझौता अमेरिका के लिए नुकसान का सौदा है, अमेरिका को बाहर कर लिया था। अब एक बार फिर ट्रंप ने यह आरोप लगाकर कि जब अमेरिका पहले से ही स्वच्छ है, जबकि चीन, रूस और हिंदुस्थान स्वच्छ नहीं हैं, वे लगातार धुआं छोड़ रहे हैं तो इस समझौते का क्या लाभ?.. फिर वही तान छेड़ दी है। अमेरिका की अंतर्गत राजनीति को छोड़ भी दें तब भी ट्रंप के दावों में कितनी सच्चाई है इसका ‘पोस्टमार्टम’ तो होना ही चाहिए, क्योंकि ट्रंप एक ओर तो हिंदुस्थान से गहरी दोस्ती का दावा करते रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई मोर्चों पर तथ्यहीन आरोप लगाकर हिंदुस्थान को वैश्विक स्तर पर बदनाम करने का खेल भी खेलते हैं। लिहाजा, इस दावे को विभिन्न मानकों पर परखने और उसकी सच्चाई को उजागर करने की जरूरत है।
सबसे पहले बात करते हैं कच्चे तेल की खपत और ‘धुआं छोड़ने’, मतलब कार्बन उत्सर्जन की। क्योंकि कच्चा तेल वायु प्रदूषण के साथ-साथ तापमान में भी जबरदस्त वृद्धि करता है। परख १९६० के दशक से शुरू करते हैं। तब अमेरिका में प्रतिदिन १० हजार मिलियन बैरल कच्चे तेल की खपत थी, जो दुनिया में सर्वाधिक तो अपने निकटतम सोवियत (रूस) से ४ गुना अधिक थी। उस सूची में महज १७० और १६० मि. बैरल/दिन के इस्तेमाल के साथ चीन और भारत का नाम क्रमश: ११वें व १२वें नंबर पर आता था। ७० के दशक में अमेरिका की खपत १५,००० तो सोवियत की ५,५०० मि. बैरल/दिन तक पहुंच गई, जबकि ९वें स्थान पर ६७१ मि. बैरल/दिन की खपत के साथ चीन था। हालांकि, भारत तब भी टॉप-१० देशों की सूची में नहीं था। १९८० का दशक आते-आते सोवियत में खपत बढ़ी और वहां प्रतिदिन ८,९०० मि. बैरल कच्चा तेल जलाया जाने लगा। तब भी सोवियत से दुगुनी खपत करके १७,५०० मि. बैरल/दिन के साथ अमेरिका ही पहले नंबर पर बना रहा। उस दौर में चीन १,८०० मि. बैरल/दिन के साथ ९वें स्थान पर ही था। १९९० में भी स्थिति तकरीबन ऐसी ही बनी रही और अमेरिका १७,००० और सोवियत ८,४०० मि. बैरल/दिन के साथ पहले और दूसरे नंबर पर बने रहे। जबकि ५वें नंबर पर चाइना २,३५० तो १२वें नंबर पर हिंदुस्थान १,१७० मि. बैरल/दिन की खपत के साथ पहुंचे थे। यह वो दौर था जब सोवियत विघटन की ओर बढ़ रहा था। तब हिंदुस्थान कच्चे तेल की खपत में १५वें स्थान पर था। वर्ष २००० आते-आते अमेरिका में तेल की खपत तकरीबन २०,००० मि. बैरल/दिन हो गई, जबकि दूसरे स्थान पर ५,६०० मि. बैरल/दिन के साथ जापान आ गया। उस समय चाइना ४,४०० के साथ तीसरे तो रूस २,५०० मि. बैरल/दिन के साथ पांचवें नंबर पर था। तब हिंदुस्थान २००० मि. बैरल/दिन के साथ १०वें नंबर पर था।
ये सच है कि २०१० की शुरुआत में चीन और हिंदुस्थान में कच्चे तेल की खपत बढ़ी और इन देशों में ९,५०० और ३,२०० मि. बैरल/दिन तक खपत पहुंच गई। तब भी ये दोनों देश सूची में क्रमश: दूसरे व चौथे स्थान पर ही थे। तब भी अमेरिका १९,००० मि. बैरल/दिन कच्चा तेल इस्तेमाल करनेवाला दुनिया का सबसे बड़ा देश था। इस दौरान रूस में तेल की खपत काफी कम हुई और वो २,९५० मि. बैरल/दिन के साथ पांचवें स्थान पर बना रहा। आज भी स्थिति वही है। २०१९ के ताजातरीन आंकड़ों के आधार पर अमेरिका सर्वाधिक लगभग २०,००० मि. बैरल/दिन के करीब कच्चा तेल इस्तेमाल करता है, जबकि चाइना दूसरे स्थान पर लगभग १३,५०० तो भारत ५,३०० और रूस ३,३०० मि. बैरल/दिन ही इस्तेमाल करते हैं। यहां दिलचस्प बात ये है कि कोरोना काल में जहां चीन और भारत में कच्चे तेल की खपत कम हुई, तो अमेरिका और रूस में ये बढ़ी है। इन आंकड़ों की सच्चाई यही है कि १९६० के दशक से लेकर अब तक तेल का ‘धुआं’ करने में अमेरिका निर्विवाद रूप से नंबर एक पर रहा है। बावजूद इसके ट्रंप अमेरिका को स्वच्छ करार वैâसे दे सकते हैं?
अब कार्बन उत्सर्जन यानी ‘धुआं’ छोड़ने का आंकड़ा भी देख लीजिए। १९६० की शुरुआत में इस मामले में अमेरिका २,८९० मिलियन टन के साथ पहले नंबर पर था, जबकि ७८० के साथ चीन दूसरे व मात्र १२० मि. टन के साथ हिंदुस्थान ८वें स्थान पर। इस मामले में तब सोवियत टॉप-१० की सूची में भी नहीं था। उस दौर में पूरी दुनिया का एक/तिहाई कार्बन उत्सर्जन अकेला अमेरिका ही करता था। १९७५ के बाद इस मामले में चीन कुछ आगे बढ़ा और १९८५ तक उसने कार्बन उत्सर्जन को काफी हद तक काबू में रखा, जबकि अमेरिका का उत्सर्जन ४,४५० मि. टन औैर उससे एक / तिहाई १,८७४ मि. टन के साथ चीन दूसरे स्थान पर था। चीन से भी एक/चौथाई से भी कम यानी महज ४०३ मि. टन के साथ तब भी हिंदुस्थान ८वें नंबर पर आता था। चूंकि ९० के दशक में भारत में कच्चे तेल की खपत बढ़ी, लिहाजा उत्सर्जन भी बढ़ा। परंतु उससे कहीं तेजी से चीन, रूस और जर्मनी में इजाफा हुआ। हालांकि, उन परिस्थितियों में भी ५००० मि. टन के साथ अमेरिका पहले नंबर पर ही बना रहा। वर्ष २००० के बाद चीन ने कार्बन उत्सर्जन के मामले में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया। २०१० आते-आते चीन ८,५०० व अमेरिका ५,४०० मि. टन तो उससे एक/तिहाई से भी कम यानी १,७५० पर हिंदुस्थान और १,६५० मि. टन पर रूस था। तकरीबन यही स्थिति २०१७-१८ तक बनी रही। जब चीन ११,०००, अमेरिका ५,२००, हिंदुस्थान २,५०० और रूस १,८०० मि. टन कार्बन उत्सर्जन कर रहा था। कुल मिलाकर, न केवल कच्चे तेल की खपत बल्कि कार्बन उत्सर्जन (हाल के दशक को छोड़कर) के मामले में भी १९६० से अब तक अमेरिका नंबर एक पर ही रहा है। ऐसे में ट्रंप का ये दावा कि अमेरिका स्वच्छ है और बाकी देश धुआं छोड़ रहे हैं, मात्र एक झूठ का पुलिंदा है।
अब बात करते हैं किस देश ने कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए क्या किया? चूंकि ट्रंप लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि चीन, रूस और भारत ने इस मामले में कुछ भी नहीं किया है तो इस दावे को परखने के लिए रिन्यूएबल एनर्जी यानी ग्रीन एनर्जी के उत्पादन आंकड़ों पर नजर डाल लेनी चाहिए। १९६० के दशक में अमेरिका सबसे ज्यादा कच्चा तेल जला रहा था, तो दूसरी ओर इटली सबसे अधिक ग्रीन एनर्जी का उत्पादन कर रहा था। तब इटली २,१९० गीगा वॉट तो न्यूजीलैंड ४५०, ऑस्ट्रेलिया ३०० और अमेरिका महज १४० गीगा वॉट रिन्यूएबल एनर्जी उत्पादन के साथ क्रमश: पहले, दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान पर थे। १९७० में स्थिति बदली तो इटली ४०००, जर्मनी २,५००, न्यूजीलैंड १,३००, प्रâांस ९५० और अमेरिका एक पायदान और नीचे सरककर मात्र ८०० गीगा वॉट उत्पादन के साथ पांचवें नंबर पर आ गया। आलोचनाओं से बचने के लिए तब अमेरिका ने उत्पादन बढ़ाया और ८० के दशक में इटली को पीछे छोड़ते हुए ५००० गीगा वॉट उपादन तक पहुंचा। ९० के दशक में निसंदेह अमेरिका ने इसमें तेजी से वृद्धि की और ७८,००० गीगा वॉट ग्रीन एनर्जी के उत्पादन तक पहुंच गया, जबकि उससे सबसे नजदीक जापान मात्र १५,५०० गी.वॉट उत्पादन तक ही पहुंच पाया था। तब दुनिया के तमाम देश ५००० या उससे कम गी.वॉट ग्रीन एनर्जी का उत्पादन ही कर पा रहे थे। अमेरिका ने लगभग ३ दशकों तक बेतहाशा कच्चा तेल जलाकर पर्यावरण का वैश्विक नुकसान करने के बाद ग्रीन एनर्जी की ओर रुख किया था, जबकि चीन और हिंदुस्थान ने १९९० के दशक में कच्चे तेल की खपत बढ़ाई तो ग्रीन एनर्जी का महत्व भी समझ लिया। तब चीन ३००० गीगा वॉट ग्रीन एनर्जी के साथ १३वें नंबर पर था। हालांकि, दशक के आखिर तक चीन जहां टॉप-२० से बाहर हुआ तो ३,८०० गीगा वॉट ग्रीन एनर्जी उत्पादन के साथ भारत ने १८वें स्थान पर जगह बना ली। इस दौरान हालात तेजी से बदले और २०१० के अंत तक अमेरिका सर्वाधिक १,५५,००० तो जर्मनी ७७ हजार गीगा वॉट उत्पादन और तीसरे नंबर पर चीन ५० हजार गीगा वॉट का उत्पादन कर रहा था। इस सूची में ३० हजार गीगा वॉट के साथ हिंदुस्थान ५वें नंबर पर था। २०१० के बाद चीन ने इस मामले में तेजी से वृद्धि की, जबकि अमेरिका तुलनात्मक तौर पर चीन से पीछे रहा। यहां भारत ने भी ग्रीन एनर्जी उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि कर ली। २०१७-१८ की शुरुआत तक चीन जहां साढ़े चार लाख तो अमेरिका तकरीबन ४ लाख गीगा वॉट ग्रीन एनर्जी का उत्पादन कर रहे थे। हिंदुस्थान भी तब तक ७७ हजार गीगा वॉट ग्रीन एनर्जी का उत्पादन करने लगा था।
इतने सारे आंकड़े बताने का तात्पर्य यही है कि यहां भी ट्रंप का यह दावा कि अमेरिका को छोड़कर ग्रीन एनर्जी उत्पादन का प्रयास नहीं हो रहा, कोरा झूठ है। वर्तमान हालात ये हैं कि अमेरिका में प्रति व्यक्ति ९३५ गैलन कच्चे तेल का इस्तेमाल होता है, जबकि चीन में ये आंकड़ा १३९ तो हिंदुस्थान में मात्र ५१ गैलन प्रति व्यक्ति का ही है। इस मामले में रूस भी ३८३ गैलन प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष कच्चे तेल की खपत करता है, तब भी वो अमेरिका से एक/तिहाई ही है। कार्बन उत्सर्जन में हिंदुस्थान अमेरिका के ५.४१ जीटी की तुलना में आधे से भी कम यानी २.६५ जीटी कार्बन वायुमंडल में छोड़ता है। यहां सर्वाधिक १० जीटी चीन उत्सर्जन करता है, तो रूस मात्र १.७ जीटी ही उत्सर्जन करता है।
इन तमाम मानकों के आधार पर यह तय है कि अमेरिका कच्चे तेल की खपत से कार्बन उत्सर्जन तक लगातार सबसे ऊपर बना रहा है। रहा ग्रीन एनर्जी का सवाल तो इस मामले में अमेरिका नहीं बल्कि चीन पहले नंबर पर है। लिहाजा, ट्रंप का ये दावा कि अमेरिका स्वच्छ है और चीन, रूस और भारत प्रदूषण पैâला रहे हैं, तथ्यात्मक दृष्टि से सरासर गलत है। उन्हें आंकड़ों का यह आईना साफ-साफ झुठला रहा है।