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उड़न छू: एंटायर पॉलिटिक्स

अजय भट्टाचार्य

एक बार हवाई जहाज बनाने वाली वंâपनी बोइंग ने अमेरिकी एरोनॉटिकल साइंस के प्रोपेâसर्स को मुफ्त हवाई यात्रा का न्योता दिया। सारे अध्यापक पहुंच गए और हवाई जहाज में जाकर बैठ गए।
जब हवाई जहाज का दरवाजा बंद हो गया, तब पायलट ने घोषणा की कि सभी सज्जनों को सूचित किया जाता है कि यह हवाई जहाज आपके द्वारा पढ़ाए गए उन छात्रों द्वारा बनाया गया है, जो पिछली साल ही पास हुए थे। आज इसकी पहली परीक्षण उड़ान है। क्या आपको गर्व महसूस हो रहा है?
यह सुनकर अध्यापकों के पसीने छूट गए। सब आनन-फानन में सीट बेल्ट खोल के उतरने को भागे। उतरने के लिए जहाज में भगदड़ मच गई। लोग चीखने-पुकारने लगे कि हमें जल्दी से जल्दी नीचे उतारो। लेकिन एक प्रोफेसर आराम से बैठा था। उतरने की लाइन में लगे एक प्रोफेसर ने उसे शांत बैठे देखकर पूछा कि आप बड़े शांत लग रहे हो। अपको नहीं लगता कि परीक्षण उड़ान वाले जहाज में बैठना खतरनाक है! वह भी तब जिसे हाल में पास हुए छात्रों ने बनाया हो। आपको नहीं लगता कि यह कुछ ज्यादा ही खतरनाक है। अपनी सीट पर बैठे उन प्रोफेसर ने सबकी बात पूरे इत्मीनान के साथ सुनी। एक-एक कर सबकी तरफ देखा, मानो पूछना चाहते हों कि क्या तुमको अपने अध्यापन पर भरोसा नहीं है। उनके सामने खड़े सभी लोग प्रश्नवाचक भाव लिए हवाई जहाज छोड़कर भागने से पहले सीट पर बैठे प्रोफेसरसाहब से जानना चाहते थे कि आखिर वे इतने निश्चित क्यों हैं? प्रोफेसर ने विमान परिचारिका को बुलाकर कहा कि पानी लेकर आए। विमान परिचारिका उन प्रोफेसर के लिए पानी लेकर लौटी। प्रोफेसर साहब ने उस विमान सुंदरी की ओर मोहक अंदाज में शुक्रिया कहा और धीरे-धीरे पानी का गिलास गट-गट कर खाली किया और सभी की जिज्ञासा शांत करने के लिए बहुत ही सधे हुए अंदाज में पूरे आत्मविश्वास के साथ उत्तर दिया कि `हो सकता है कि यह जहाज उतना मजबूत न हो अथवा उतना सटीक न बना हो जितना आप अपेक्षा करते हैं, लेकिन फिर भी मुझे अपने विद्यार्थियों पर पूरा भरोसा है।’ प्रोफेसर की इतनी-सी बात सुनते हुए उनकी बाकी बात को बिना सुने सभी लोग हवाई जहाज से बाहर जाने के लिए लाइन में लगकर आगे बढ़ने लगे। उस प्रोफेसर ने जो आगे कहा उसे जानने से पहले आपको यह जानना जरुरी है एंटायर पॉलिटिकल साइंस के विशेषज्ञ ने विमान में बैठे प्रोपेâसर की कहानी से ही प्रेरणा ली थी। यकीन मानिए, जो लोग प्रोफेसर साहब की पूरी बात सुने बिना विमान से चले गए वे न जाते।
प्रोफेसर ने आखिरी बात जो कही थी उस पर एंटायर पॉलिटिकल साइंस का सारा पाठ्यक्रम टिका है। इसलिए जब वे देश को विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना देने और १३ करोड़ परिवारों को गरीबी की रेखा से बाहर निकालने का दावा पेश करते हैं, तब उन्हें मालूम है कि सामने बैठे लोग उसी प्रोफेसर जैसे किसी विद्वान से पढ़े होंगे। यदि पति-पत्नी और दो बच्चे शामिल कर एक परिवार मानें तो यह संख्या ५२ करोड़ हो जाती है। फिर वे ८० करोड़ लोग कौन हैं, जिन्हें मुफ्त राशन दिया जा रहा है? पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था में यदि ८० करोड़ लोग सरकारी भीख पर जिंदा रहने को विवश हैं तो ऐसी अर्थव्यवस्था मजबूत वैâसे कही जा सकती है? यह ठीक उसी तरह है जिसमें १३५ करोड़ की जनसंख्या वाले देश में उनकी पार्टी को ६५० करोड़ मतदाता मतदान कर देते हैं और लोग अहोभाव से स्वीकार कर जय-जयकार में खुद को धन्य मानकर लहालोट हैं। आप सोच रहे होंगे कि इस सबका प्रोफेसर और उस उड़ान से क्या संबंध है? तो संबंध यह है कि लोग हवाई जहाज छोड़कर चले तो गए लेकिन किसी ने प्रोपेâसर की आखिरी बात नहीं सुनी थी। प्रोफेसर ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा था, कि अगर यह हवाई जहाज सच में मेरे विधार्थियों ने बनाया है तो ये कभी स्टार्ट ही नहीं होता… उड़ना तो दूर की बात है, बैठो आराम से।’
एंटायर पॉलिटिकल साइंस में भी यही विषय प्रधान है कि वही पढ़ो, जिसका कोई उपयोग न हो। देश के सरकारी उपक्रम बेचकर आय बताना मास्टर स्ट्रोक है और कश्मीर नेहरू की गलती, महाराज हरिसिंह की नहीं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

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