मुख्यपृष्ठस्तंभउड़न छू : चंद्रयान में उनका योगदान

उड़न छू : चंद्रयान में उनका योगदान

अजय भट्टाचार्य

वे लोग बड़े किसिम के देशद्रोही हैं जो चंद्रयान-३ की सफलता पर कुढ़ रहे हैं। हमारे फलाने के बहाने खगोल वैज्ञानिकों का अपमान कर रहे हैं। बताइए जैसे ही चंद्रयान-३ ऊपर की तरफ बढ़ा नीचे के लोगों द्वारा लांच पैड बनाने वाली सरकारी कंपनी एचईसी (हेवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन) के कर्मचारियों को १७ महीने का वेतन न मिलने की खबर पैâलाकर अमृतकाल के खास मिशन पर सवाल करना कौन सी राष्ट्रभक्ति है? और वो रांची की वाणिज्य अदालत को क्या पता नहीं है कि मिशन कितना जरूरी था/है, जो पूरा होने से पहले ही एचईसी के सीएमडी और तीन प्लांट के महाप्रबंधकों के दफ्तर सील करवा दिए। अरे, जहां १७ महीने वहां कुछ दिन और बिना पगार के बिता देते तो कौन-सा चंद्रग्रहण पड़ जाता! यह तालियां पीटने का समय है न कि एचईसी को बचाने का। वैसे प्रज्ञान के चंद्रमा की धरती पर कदम टिकाने से तीन हफ्ते पहले ही कॉमर्शियल कोर्ट द्वारा एचईसी अफसरों के ऑफिस सील करने के आदेश के बाद की स्थिति से एचईसी ने केंद्र सरकार को अवगत करा दिया था। साथ ही एचईसी को आर्थिक मदद देने के लिए भारी उद्योग मंत्रालय को पत्र लिखा था। कहा गया है कि केंद्र से आर्थिक मदद नहीं मिली तो एचईसी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। पत्र में एचईसी की देनदारियों समेत विभिन्न कंपनियों के बकाए के बारे में बताया गया है। कुछ कंपनियों द्वारा बकाया व विलंब से कार्यादेशों की आपूर्ति पर विलंब शुल्क मांगने के बारे में बताया है। कुछ कंपनियों की ओर से एचईसी को मिले नोटिस की भी जानकारी दी है। केंद्र से तत्काल आर्थिक मदद देने का आग्रह करते हुए प्रबंधन ने कहा है कि यदि बकाए का भुगतान नहीं हुआ तो एचईसी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। लगता है इसरो की तरह एचईसी को भाषण देना वे भूल गए, वरना नाक कटाने के लिए एचईसी के लोग धरने पर क्यों बैठते? उन्हें हमारे जैसे लोगों से प्रेरणा लेनी चाहिए, जो पिछले नौ सालों से अपने खाते में १५ लाख आने का विश्वास लिए जमे हुए हैं और जयकारे में कोई कमी नहीं होने दे रहे हैं। वैसे भी चांद पर अभी किसी आबादी का पता नहीं चला है। पूरा ग्रह पाकिस्तान के सरकारी खजाने की तरह वीरान पड़ा है। यानी अगर किसी का दस का नोट वहां गिर जाए तो कोई उठाने वाला नहीं है। इसलिए हमारे चंद्रयान में चोरी-चकारी का कोई खतरा नहीं है, लेकिन जरा कल्पना कीजिए कि किसी और ग्रह का यान अपने देश में लैंड कर जाता! तो क्या होता? उस परग्रही पर सवार एलियन देखते कि ३.८४ लाख किलोमीटर की यात्रा के लिए महज ६५० करोड़ रुपए लगे, लेकिन १२ हजार किमी व्यास की धरती की परिक्रमा के लिए हमारे डंकापति को ८ हजार करोड़ का विमान खरीदना पड़ा! जो लोग फलाने के चंद्रारोहण मिशन पर सवाल उठा रहे हैं, उनकी जानकारी के लिए बताना जरूरी है कि जब इसरो के वैज्ञानिकों को यह समझ में नहीं आ रहा था कि चंद्रयान-३ की लैंडिंग कहां करवाई जाए? तब माननीय ने उन्हें जवाहरलाल नेहरू के इंद्रजाल से बाहर निकालकर चंद्रयान को जुलाई के महीने में तब ऊपर उछलवाया जब बारिश हो रही थी, ताकि बादलों की गड़गड़ाहट में चंद्रयान की आवाज दब जाए और कोई दुश्मन देश हमारे मिशन की राह में रोड़ा न बने। रूस ने हमारे मिशन के बीच में अपनी टांग उठाई और मुंह की खाई। इसके पीछे गुजरात के सबसे बड़े ज्योतिषाचार्य द्वारा निकाला गया मुहूर्त था, जिसमें कोई ग्रह, नक्षत्र हमारे मिशन के बीच बाधा नहीं बन सका। सोचिए, अगर चंद्रयान-३ की यात्रा के समय चंद्रमा-शनि में होता तो? शनि की नजर कुछ भी कर सकती थी। इसे कहते हैं उनके विज्ञान के अंतर्ज्ञान का योगदान। आपको मालूम भी है कि जब विक्रम लैंडर चंद्रमा की सतह के ऊपर क्षैतिज अंतराल में उड़ रहा था, तब चंद्रमा की तस्वीरों के साथ एक आवाज भी बंगलुरु में बैठे कमान सेंटर में सुनाई पड़ी। यह आवाज सुनते ही चंद्रयान-३ टीम के मुखिया सोमनाथ को जानकारी दी गई, जो उस समय लैंडिंग के सफल होने की सूचना देश को देने की तैयारी में थे। स्क्रीन पर लैंडर ने चंद्रमा की धरती को छुआ किसी ने सोमनाथ के कान में कहा, ‘आएगा तो फलाना ही!’ और सचमुच हुआ भी यही, स्क्रीन से सोमनाथ बाहर थे फलाने का चेहरा देश के सामने था। अब भी जिनको लगता है कि चंद्रयान-३ में उनका योगदान नहीं है तो वे भयंकर वाली गलती कर रहे हैं। सोचो अगर वे नेहरू चच्चा और उनके बाद कांग्रेसियों द्वारा बनाई बैंकों, रेलवे, हवाई अड्डों, बंदरगाहों, सरकारी कंपनियों की तरह इसरो को भी बेच देते तो चंद्रमा पर हमारे कदम पड़ सकते थे क्या? हां, नर्इं तो…!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

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