मुख्यपृष्ठस्तंभउड़न छू : निलंबित सरकार

उड़न छू : निलंबित सरकार

अजय भट्टाचार्य

पुराणकाल से बहुत पहले की बात है। शायद इस ग्रह से परे किसी दूर ग्रह की कहानी है। उस समय कौन सा मन्वन्तर चल रहा था यह किसी को ज्ञात नहीं। अलबत्ता राजसत्ता पैतृक होते हुए भी जनतंत्र पर आधारित थी। सच और झूठ भी उसी तरह मौजूद थे जैसे आजकल हैं। कलियुग-सतयुग हुए और होते रहेंगे, लेकिन सच और झूठ सनातन शाश्वत हैं। जैसे धर्म सनातन है यह अलग बात है कि कुछ डेढ़ सयानों ने सनातन को ही धर्म घोषित कर दिया, जबकि धर्म अपनी हर विधा में आदिकाल से विद्यमान है जाति, पंथ, विश्वास से परे धर्म की सनातनता सदैव रही है। तो दूर ग्रह/देश के राजा रानी प्रात: विहार के लिए एक उद्यान में बैठे थे।
प्रात: का समीर बह रहा था। पेड़ों की शाखाओं पर चिड़ियां चहचहा रही थीं। महल के सेवादारों ने राजाजी के आस-पास मोर छोड़ दिए थे विचरण के लिए। राजा साहब रानी साहिबा के हाथों तैयार गरम-गरम चाय सुड़क रहे थे, तभी रानी साहिबा ने अखबार खोल लिया। अखबार संसद की खबरों से सराबोर था। राजा साहब के तीसरी बार राजा बनने की भविष्यवाणी से लेकर संसद से निलंबित सांसदों की खबरों से लबरेज अखबार में यह खबर भी मोटे-मोटे अक्षरों में शीर्षक के साथ छपी थी कि निलंबित दलों के सांसद भी सरकार बनाने का दावा करने लगे हैं।
दरअसल, हफ्ते भर से अजीब तमाशा चल रहा था। सांसद कोई मुंह खोले, उसके पहले उसे निलंबित कर दिया जाता। हद तो यह थी कि जो सांसद सदन में हाजिर भी नहीं था, उसे भी बोलने के जुर्म में निलंबित कर दिया गया था। मानो संसद बोलने की जगह न होकर मौन साधना का स्थान हो। राजा साहब ने हाल ही में अपने प्रिय विदूषक को सभापति बनाया था। सभापति बनते ही उसे अब इज्जत का शौक चर्राया था। सभापति बनते ही वो अपने गांव गया, क्योंकि जिस राज्य में उसका गांव था, वहां चुनाव होने थे। विदूषक अपने गांव/जाति वालों को यह बताने गया था कि राजा साहब उसकी जाति और जाति वालों से कितना प्यार करते हैं कि उसे सभापति बना दिया। सभापति की पीड़ा यह थी कि उसके पास पद था, सदन में सबसे ऊंचा सिंहासन था, मगर इज्जत नहीं थी। राजा साहब के सामने आते ही उसकी इज्जत का फालूदा बन जाता था और राजा साहब के सामने विदूषक की भी अन्य दरबारियों की तरह हाथ जोड़े खड़े रहना नियति थी। सभापति को यह बात सालती थी। सदस्यगण उसकी नकल करते और मीडिया वाले उस नकल की क्लिपिंग वायरल कर हल्ला मचाते कि यह सभापति के साथ-साथ उनकी जाति का भी घोर अपमान है। जब राजा साहब भरी सभा में अपने एक हाथ से गुदामुद्रा बनाकर दूसरे हाथ से थप्पी देते, तब मीडिया अहोभाव से गदगद हो बखान करता कि राजा साहब का अंदाजे बयां ही कुछ और है। खैर, अपनी नकल किए जाने से सभापति के अहम को चोट पहुंचती। माना कि वे जन्मजात विदूषक थे या नहीं थे मगर यह बात कहने की तो नहीं होती और मजाक उड़ाने की तो कतई नहीं होती।
सदस्यों को उसकी नहीं तो उसके पद की.. कम से कम महंगे कपड़ों और जूतों की इज्जत करनी चाहिए। खासकर उन कपड़ों की जो राजा साहब की उतरन जैसे हों।
कपड़ों की यह समानता सिद्ध करती थी कि सभापति विदूषक का अपमान सिर्फ उसका ही नहीं, बल्कि राजा का भी अपमान था। राज्य का, राष्ट्र का अपमान था। तो अपमान करने वालों को निलंबित करने की खुली छूट सभापति को स्वत: ही मिली हुई थी। वे अपना अपमान बर्दाश्त कर सकते थे, राजा का नहीं। इसके बाद तो उन्होंने कहर बरपा दिया। तो अखबार में खबर यह थी कि सभापति ने कल भी तीन दर्जन सदस्यों को थोक में निकाल बाहर किया। जिससे निलंबित सदस्यों की संख्या, सदन में तीन चौथाई पार कर गई। निलंबित सांसदों के दल ने नहले पर दहला ठोक दिया। उन्होंने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया।
यह संवैधानिक संकट की घड़ी थी। नियम कहता है- शपथ दिलाओ। अखबार का संपादक चिंतित था कि निलंबित दल का निलंबित नेता, एक निलंबित प्रधानमंत्री बनेगा। उसकी वैâबिनेट निलंबित होती और एक निलंबित सरकार देश चलाती, जो निलंबित होने के कारण नहीं चलाती और इस तरह पूरा देश निलंबित मोशन में चलती। ये खबर सुनाती रानी खीझी हुई थी। दुनिया में रियासत का डंका, यानी डुगडुगी पिट रही है। सब हंस रहे हैं, मजाक बना रहे हैं। भुनभुनाती हुई रानी ने कहा.. – बहुत हुआ। अब हटा दो। राजा साहब चाय पीते रहे। देर तक गहन विचार और दाढ़ी खुजाने के बाद अंतत: उच्छवास छोड़कर कप रखा। बोले-ठीक है। हटा देते हैं। अगले दिन सुबह रानी ने देखा। संसद हट चुकी थी।
वैधानिक चेतावनी : यह कहानी काल्पनिक है और कतिपय समानता संयोग से मिल भी सकती है, बशर्ते राजा अकेला न हो।

अन्य समाचार