मुख्यपृष्ठस्तंभउड़न छू : ....तमाशा घुस-घुस देखेंगे

उड़न छू : ….तमाशा घुस-घुस देखेंगे

अजय भट्टाचार्य

बाबा जुमलेश्वर की शरण में वापस लौटे पलटेश्वरानंद उर्फ पलटेश कुमार उर्फ पलटूचाचा उर्फ पलटीमार इन दिनों परेशान हैं। महीने के पहले इतवार की बात है। नवादा में पूरा मजमा जुटा था। जुमलेश्वर बाबा आने वाले थे इसलिए चेलेचपाटे उत्साह से लहालोट थे। कुनबे में वापस लौटे पलटेश्वरानंद महाराज खींसे निपोरते हुए कुलगुरु महामुने ढपोरशंख को मन ही मन प्रणाम करते हुए बोले- हे जुमलाकुलनंदन आप परेशान न हों, चिंतित न हों, कहां चार सौ के चक्कर में उलझे हुए हो! आपका पलटेश्वर वापस आ गया है और आपको वचन देता है कि ४०० क्या पूरे चार लाख ओ…गड़ब..ऐ (मिस्टेकवा हो गया) चार हजार नमूने भेंट करेगा। किसी ने पीछे से पलटेश महाराज के कान में फूंका- अरे दईया..! सदन में अभी तो ५४३ कुल नमूनों की जगह है। सार्वजनिक सभा थी इसलिए बाबा जुमलेश्वर शांत रहे और इधर पलटीमार साहब पूरे जोश में भाषण चेंपे जा रहे थे। इतने विभोर हो गए कि बाबाजी के चरणों में शीश धर दिया। उठे और फिर भाषण शुरू…. ।
२० मिनट से अधिक समय तक बोले और मंच पर जुमलेश्वर बाबा और अन्य चेले स्पष्ट रूप से पलटेश का भाषण समाप्त होने का उत्सुकता से इंतजार कर रहे थे। जब नहीं रुके तो उनके ही अखाड़े के करीबी साथी अपनी घड़ी की जांच करते और पलटेश कुमार की ओर इशारा करते कि महाराज अपना भाषण रोकिए वरना मंच पर बैठे सबसे बड़े भाषणवीर नरजिया जाएंगे। १० दिन बाद बाबाजी गया और पूर्णिया में चुनावी प्रवचन देने पहुंचे थे, मगर आश्चर्यजनक रूप से मंच पर पलटू चाचा नहीं दिखे। गया और पूर्णिया में बाबा जी की सत्संग सभाओं में स्थानीय अखाड़ा प्रमुख की स्पष्ट अनुपस्थिति ने राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू कर दी है कि पलटी कुमार को बाबाजी की मंडली ने साफ मना कर दिया है कि वे बाबाजी के साथ मंच साझा न करें। पिछली सार्वजनिक रैली में उनकी हालिया गलतियों ने बाबाजी को विचलित कर दिया है। दूसरा यह कि जिस मंच पर खुद बाबाजी विराजमान हों, वहां २० मिनट का भाषण नहीं देना चाहिए। बाबाजी के एक वरिष्ठ चेले जो नवादा की सार्वजनिक बैठक में मौजूद थे, जिसमें पलटेश कुमार ने भीड़ को संबोधित किया था, ने पूरी गोपनीयता के साथ बताया कि पलटू चाचा के आचरण ने न केवल जुमलेश्वर बाबा, बल्कि पूरे अखाड़े को भी शर्मिंदा किया है। हालांकि, उन्होंने इस बात पर अनभिज्ञता जताई कि १६ अप्रैल को गया और पूर्णिया की रैलियों में उनके मौजूद नहीं रहने का क्या कारण हो सकता है। उन्होंने कहा कि मुझे रैलियों में उनकी अनुपस्थिति के बारे में कोई जानकारी नहीं है, लेकिन राज्य में सहयोगी अखाड़े के मुखिया होने के नाते उसे वहां होना चाहिए था। यह पहली बार नहीं था कि पलटेश कुमार ने विवाद को जन्म देने के लिए ऐसी गलती की हो। हाल ही में राज्य की बड़ी पंचायत में महिला शिक्षा से जोड़कर महिला गर्भधारण पर ज्ञान देते हुए उन्होंने जो टिप्पणी की उससे चौतरफा निंदा और विवाद खड़ा हो गया था। अगले ही दिन उन्होंने अपनी अनजाने में की गयी टिप्पणी के लिए माफी मांग ली थी। मजेदार बात यह है कि तब वे जुमलेश्वर बाबा के अखाड़े से अलग थे इसलिए बाबाजी ने भी तब उनकी थोक में निंदा की थी। इसी तरह सितंबर २०२३ में साप्ताहिक जनता दरबार (सार्वजनिक बैठक) में जब एक व्यक्ति ने राज्य के गृह मंत्री से संबंधित एक मुद्दे के बारे में शिकायत की, तो साहब ने एक अधिकारी को गृह मंत्री को फोन करने के लिए कहा। वे यह भूल गए कि गृह विभाग उनके पास ही है। बहरहाल, ताजा घटनाक्रम पलटेश्वरानंद की बेइज्जती की तरफ इशारा करता है। ‘बड़े बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले’ को अगर पलटूचाचा के नजरिए से लिखा जाए तो पंक्तियां होंगी कि ‘बड़े बे-आबरू होकर भी तेरे कुनबे में हम आये।’ अगर हमारी ठेठ फर्रुखाबादी में कहें तो `सौ-सौ जूते खाय, तमाशा घुस-घुस देखेंगे’ वाली भूमिका में पलटू चाचा फिट बैठते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

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