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उड़न छू : छिला हुआ केला

अजय भट्टाचार्य

बाजार जब बिल्कुल विचार-विहीन हो जाता है तो वह लोगों को इस तरह से गुमराह करने लग जाता है कि बाजार उसे सहूलियत प्रदान कर रहा है। ठीक जैसे बाजार में उपलब्ध ये छिले हुए केले और इसे खरीदकर खाने वाले स्वयं को सहूलियत के लायक समझने वाले इस कदर गुमराही के अंधेरे में धकेले जाएंगे कि वो समझ ही नहीं सकेंगे कि इस तरह बाजार ने दो काम किए। पहला तो यह कि आपसे सहूलियत के नाम पर ज्यादा पैसे वसूल लिए और दूसरा यह कि अपना काम दिखाने के लिए एक काम आपको गिनवा दिया। जनता यह कभी समझ ही नहीं सकेगी कि उन्हें प्लास्टिक की पन्नी तो अब भी छीलनी ही पड़ेगी, जो कि केले का छिलका छीलने से ज्यादा मुश्किल है। ठीक वैसे ही जैसे मंदिर-मस्जिद, चर्च-गुरुद्वारा बनने के बावजूद आपको रोजगार की जरूरत पड़ेगी, शिक्षा की जरूरत पड़ेगी, अर्थव्यवस्था की जरूरत पड़ेगी, मुश्किलों में अस्पताल की जरूरत पड़ेगी। क्योंकि सिर्फ केले का छिलका छीलना आपके जीवन का एकमात्र लक्ष्य नहीं हो सकता।
आप खरीदकर जो भी अखबार पढ़ते हैं तो ध्यान दें कि पिछले तीन हफ्ते पहले के किसी भी अखबार खासकर हिन्दी अखबार/अखबारों में मणिपुर हिंसा की खबर शायद ही मिली या पढ़ी हो। सीमा पर लगातार हो रही शहादत की खबरें गायब थीं/हैं। छत्तीसगढ़ में मजदूरों का अडानी के खिलाफ प्रदर्शन शायद ही पढ़ा हो, पढ़ा तब जाता जब छपता। बिहार में एक साथ सवा लाख लोगों को रोजगार दिए जाने की खबर गायब थी जो अब बदले हुए निजाम के साथ चुनाव भर पढ़ाई-दिखाई-सुनाई जाएगी क्योंकि सत्ता पर बैठा व्यक्ति अब दिल्लीशाही के साथ है। भारत की पासपोर्ट रैंकिग गिरने की खबर गायब है। चीन खुलकर मालदीव के समर्थन में उतर आया है ये खबर गायब कर दी गई। किसानों की कपास की फसल की बिकवाली नहीं होने की खबर भी जगह न पा सकी। महंगाई ने ऊंचाई का नया शिखर छू लिया है, ये भी खबर गायब रही। फिर था क्या? मंदिरों पर ४ – ४ पेज की जानकारी। चरम यह था कि आखिरी दो दिन मंदिर विशेष के जैकेट पेज विज्ञापन। बहुत अच्छा इसमें कोई बुराई भी नहीं है। लेकिन आपके दिमाग में ठूंस-ठूंस कर यह भरना जरुरी था/है कि देखो मंदिर बन गया और इसमें फलानेजी का बहुत बड़ा योगदान है। यह किसी ने नहीं बताया कि देश की सर्वोच्च अदालत के पैâसले के तहत मंदिर बना है और फलानेजी से ज्यादा इस देश के नागरिकों ने चंदा देकर मन्दिर के सपने को पूरा किया है। जो आज दावा कर रहे हैं कि उन्होंने बहुत भयंकर लड़ाई लड़ी, वे अदालतों में यह साबित करने में लगे रहे कि घटना विशेष से उनका कोई संबंध नहीं था/है। हमारे फर्रूखाबाद में एक कहावत उन लोगों के लिए कही जाती है जो किसी के लिए हुए काम का श्रेय खुद ले लेते हैं। मुलाहिजा फरमाइए-
तेल जरै बाती जरै नाम दीया को होय।
लल्ला खेले यार को नाम पिया को होय
जिन्होंने इस महायज्ञ में अपने तन-मन-धन की आहुतियां दीं उनका जिक्र तक नहीं किया गया। वह निर्मोही अखाडा हो या निहंग सिखों का शौर्य, सब धुल गया और जिसने कुछ नहीं किया उसकी अप्रत्यक्ष विरुदावली से मीडिया गुलजार था। मजाल क्या कि कोई यह ज्ञान दे कि पूजा के बाद चरनामृत हाथों में लेकर शीश से लगाकर मुखारविंद में लिया जाता है। जबकि यहां खुद सीधे आचमनी मुंह में घुसेड दिए जाने पर किसी ने कोई प्रश्न नहीं किया। करते भी वैâसे जब देश में सनातन धर्म के सबसे बड़े पीठाधीश्वरों को ही अपमानित कर पूरा कुनबा हिंदुत्व की सेवा कर रहा था। यह चमत्कार केवल भेड़चाल ही कर सकती है जिसमें शंकराचार्यों को भी सरेआम बेइज्जत किया गया। तो अब जो आने वाले चुनाव हैं, उनमें मंदिर महिमा होगी। नहीं होंगी तो १०० स्मार्ट सिटी, बीस करोड़ नौकरियां (प्रति वर्ष दो करोड़ के हिसाब से) कहां और किसे मिलीं, नहीं पता चलेगा। हवाई चप्पल पहनने वाले हवाई यात्री नहीं मिलेंगे और न ही दुगुनी कमाई की ख़ुशी में झूमते किसान। भाषणों में दरभंगा में एम्स भले मिले मगर हकीकत में नहीं मिलेगा। फिलहाल आप इस लेख के साथ छिला हुआ पैक केला देखिए और मंदिर पर सोचिए!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

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