मुख्यपृष्ठस्तंभउड़न छू : (प्र)पंचतंत्र की कहानी...!

उड़न छू : (प्र)पंचतंत्र की कहानी…!

अजय भट्टाचार्य

कहा जाता है कि ३०० वर्ष ईसा पूर्व चाणक्य की लिखी पंचतंत्र की कहानियां हमेशा प्रासंगिक रही हैं। इसी तरह पंचतंत्र की शेर और गधे की कहानी में गधे को सियार की दोस्ती में अपनी जान गंवानी पड़ी थी। उस कहानी के अनुसार एक जंगल में करालकेसर नाम का एक शेर अपने प्रिय सेवक धूसरक नामक सियार के साथ रहता था। एक बार शेर की लड़ाई एक हाथी से हो गई, जिसमें वह इतना जख्मी हो गया कि उससे चला भी नहीं जा रहा था। शेर और सियार का भूख के मारे बुरा हाल था। तब शेर ने सियार से कहा- ‘सुन सेवक तू किसी ऐसे जीव को मेरे पास लेकर आ जिसे मैं आसानी से मार सकूं और मुझे ज्यादा मेहनत न करनी पड़े।’ शेर का आदेश सुनकर सियार किसी ऐसे जानवर को ढूंढ़ने के लिए जंगल से होता हुआ एक गांव में पहुंचा। गांव में पहुंचकर उसे एक परम उदासी गधा दिखाई दिया। सियार ने उससे पूछा- ‘भाई तुम बड़े दिन बाद दिखाई दिए हो। कुशल तो है?’
गधा बोला- ‘अरे भाई एक धोबी मेरे ऊपर बोझा ढोता है और खाने के लिए कुछ भी नहीं देता।’
तब सियार बोला- ‘भाई तुम चिंता मत करो मैं तुम्हारी बिरादरी की तीन मादाओं को जंगल में हरी-हरी पन्ना जैसी घास के मैदान में ले गया। जहां वह बोझा ढोने से बच गर्इं और आज अपना जीवन आराम से जी रही हैं। उनमें से एक विवाह योग्य हो गई है और मैं उसका विवाह तुम्हारे साथ करवा दूंगा, जिससे तुम बिना बोझा ढोये अपना जीवन आराम से बिता सकते हो।’ यह सुनकर गधा सियार के साथ बातें करते हुए जंगल की तरफ बढ़ चला जहां जख्मी शेर ने गधे पर झपट्टा मारने की कोशिश की लेकिन किस्मत से गधा बच निकला मगर उसका एक कान शेर के पंजे के प्रहार में शहीद हो गया। इधर सियार ने शेर की खिल्ली उड़ाई तो शेर ने कहा कि मैं शिकार के लिए तैयार नहीं था इसलिए गधा बच गया।
तब सियार फिर बोला- ‘अच्छा ठीक है मैं एक बार और प्रयास करके उसे तुम्हारे पास लाता हूं।’ शेर ने कहा- ‘वह तुम्हारे साथ नहीं आएगा क्योंकि वह डर गया है।’
‘तुम उसकी चिंता मत करो।’ यह कहकर सियार फिर से गधे के पास पहुंचा तो गधा बोला- ‘अरे भाई तुम मुझे अच्छी जगह ले गए। अगर मैं वहां से नहीं भागता तो जीवन समाप्त हो जाता। पता नहीं वो कौन-सा जीव था जिसका इतना भारी पंजा मेरी पीठ पर पड़ा।’
सियार बोला- ‘वह वही मादा थी जो उत्साह से तुम्हें मिलने के लिए उठी और तुम्हें भागता देख अपने पंजे से रोकने की कोशिश की। वह बहुत दुखी है क्योंकि तुम वहां से भाग आए हो। अगर तुम मेरे साथ नहीं गए तो वह अपने प्राण त्याग देगी इसलिए तुम मेरे साथ चलो।’ गधा सियार के साथ दोबारा जंगल में गया और शेर का शिकार बन गया। शेर गधे को मारकर स्नान करने के लिए चला गया। पीछे से सियार ने गधे का दिल और कान खा डाला। वापिस आकर गधे के शरीर में कान और दिल न देख शेर कहता है- ‘दुष्ट तूने मेरे भोजन को जूठा कर दिया।’ तब सियार बोला- ‘स्वामी नहीं, मैंने आपका भोजन जूठा नहीं किया, बल्कि इसमें कान और दिल नहीं था तभी तो यह जाकर दोबारा वापिस आ गया।’ यह सुनकर शेर को सियार की बात पर यकीन हो गया और दोनों ने भोजन का आनंद लिया। पंचतंत्र की कहानी यहीं समाप्त हो जाती है।
अब प्रपंचकाल चल रहा है इसलिए पंचतंत्र की जगह प्रपंचतंत्र की कहानी ने जगह ली। पात्रों में सियार की जगह लोमड़ी ने ले ली। नई कहानी में शेर को भूख लगी तो उसने लोमड़ी से कहा- ‘मेरे लिए कोई शिकार ढूंढ़कर लाओ अन्यथा मैं तुम्हें ही खा जाऊंगा।’ लोमड़ी एक गधे के पास गई और बोली- ‘मेरे साथ शेर के पास चलो क्योंकि वह तुम्हें जंगल का राजा बनाना चाहता है।’ शेर ने गधे को देखते ही उस पर हमला करके उसके कान काट लिए लेकिन गधा किसी प्रकार भागने में सफल रहा। तब गधे ने लोमड़ी से कहा- ‘तुमने मुझे धोखा दिया। शेर ने तो मुझे मारने का प्रयास किया और तुम कह रही थी कि वह मुझे जंगल का राजा बनाएगा!’ लोमड़ी ने कहा- ‘मूर्खता भरी बातें मत करो उसने तुम्हारे कान इसीलिए काट लिए, ताकि तुम्हारे सिर पर ताज आसानी से पहनाया जा सके। आओ चलो लौट चलें शेर के पास।’ गधे को यह बात ठीक लगी इसलिए वह फिर लोमड़ी के साथ चला गया। शेर ने इस बार गधे की पूंछ काट ली। गधा फिर किसी तरह बचकर लोमड़ी से यह कहकर भाग चला कि ‘तुमने मुझसे फिर झूठ कहा। इस बार शेर ने तो मेरी पूंछ भी काट ली।’ लोमड़ी ने कहा- ‘शेर ने तो तुम्हारी पूंछ इसलिए काट ली, ताकि सिंहासन पर बैठने पर तुहें कष्ट न हो।’ इस प्रकार लोमड़ी ने गधे को फिर मना लिया। इस बार शेर ने गधे को मार डाला। इसके बाद शेर और लोमड़ी के बीच वार्तालाप पंचतंत्र की कहानी जैसा ही है इसलिए दोहराने की जरूरत नहीं है। लेकिन शेर, सियार और लोमड़ी की इस तिकड़ी में गधे की ही बलि चढ़नी है। देश की वर्तमान स्थिति में सियार और लोमड़ी गोदी मीडिया के रूप में हैं और जनता को गधा समझकर मिट्टी के शेर के हर जनविरोधी काम को जनहितकारी बता जनता को भरमा रहे हैं। देश के किसानों, जवानों, वैज्ञानिकों सहित आमजन के पुरुषार्थ को डंकापति शौर्य बताकर तुमुलनाद जारी है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

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