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उड़न छू : आज की शोले

अजय भट्टाचार्य

साल १९७३ से १९७५ के बीच ‘शोले’ की अधिकांश शूटिंग कर्नाटक के रामनगरम में हुई थी, जिसे फिल्म में रामगढ़ बना दिया गया था। लेकिन ‘शोले’ की शूटिंग के ५० साल बाद भी यहां के लोगों की शिकायत है कि इस फिल्म की शूटिंग से उन्हें कुछ मिला तो नहीं, बल्कि यहां की खासियत भी छिन गई। रामनगरम जाना जाता था अपनी पहाड़ियों और उन पर मिलनेवाले दुर्लभ प्रजाति के गिद्धों की वजह से। ७०-८० के दशक में यहां सैकड़ों गिद्ध थे, ले‌किन अब इक्का-दुक्का दुर्लभ गिद्ध ही बचे हैं। रामनगरम की पहाड़ियों में ‘शोले’ की शूटिंग के लिए रामगढ़ नाम का एक गांव बसाया गया था, जो रामनगरम से ज्यादा लोकप्रिय हुआ। आज भी दूर-दराज के इलाकों में लोग यहां के वाशिंदों को रामगढ़ वालों के रूप में ही जानते हैं। अब ‘शोले’ वाला रामगढ़ गांव मौजूद नहीं है। क्योंकि शूटिंग खत्म होने के बाद ये गांव उजाड़ दिया था। जाते वक्त फिल्म के निर्माता ने रामगढ़ गांव का कीमती सामान स्थानीय दुकानदार को एक लाख रुपए में बेचने की भी पेशकश की थी, लेकिन बात बनी नहीं।
यह तो रही ‘शोले’ के उजड़े हुए रामगढ़ की बात। देश को स्वर्ग बनाने का सपना ‘अच्छे दिन आनेवाले हैं’ का ट्रेलर बना/दिखा कर बेचा गया। लोगों ने भरोसा किया और देश को स्वर्ग बनाने का जिम्मा उनको दे दिया। उन्होंने देश को स्वर्ग बनाना शुरू किया और पहले के शासकों को दैत्य प्रचारित कर दैत्यों द्वारा निर्मित देश की सभी संपत्तियां बेचना शुरू किया, ताकि स्वर्ग में दैत्यों के शासन की कोई निशानी बाकी न रहे। संपत्तियां बिक गईं तो फिर धीरे-धीरे देश को बेचना शुरू हुआ और हवाई अड्डों, बंदरगाहों को ठेके का आवरण ओढ़ाकर स्वर्ग के धनाध्यक्ष कुबेरों को दे दिया गया। फर्जी राष्ट्रवाद के पटाखों ने सर्वयोनियों में उत्तम मानव को खत्म करना शुरू किया, जो धीरे-धीरे धार्मिक बम बनकर कहीं भी फटने लगा। सदियों से जो लोग एक-दूसरे के सुख-दु:ख में साथ नजर आते थे, वे एक-दूसरे में अपने लिए खतरा देखने लगे। स्वर्ग के निर्माण में पतित और पावन का भेद अभेद विभेद का विवेक कुंद होता गया और आदमी नाम की संज्ञा भीड़ में बदल गई। भेड़ के कुल से उत्पन्न भीड़ शब्द भेड़ियों के झुंड का हिस्सा बना और जहां मौका मिला भीड़ भेड़िया बनकर अपने पाश्विक अवतार में नजर आ रही है। मणिपुर से लेकर नूंह तक ये झुंड बेरोकटोक घूम रहे हैं।
सोचिए, आज ‘शोले’ फिर बन जाए तो जय-वीरू के बिना वैâसे पूरी होगी। मौसी के बिना तो फिल्म का महत्वपूर्ण दृश्य अधूरा रह जाएगा। आप कॉपी राइट के प्रावधानों से बचने के लिए जय-वीरू को हीरा-पन्ना और बसंती का नाम बदलकर सत्तासुंदरी कर दीजिए और फिर जय मतलब पन्नालाल यानी पन्ना को मौसी के पास सत्तासुंदरी का हाथ मांगने का प्रस्ताव रखते हुए देखिये-
‘बस मौसी, तीसरी बार मौका दे दो लड़के को…! अपना हीरालाल हीरा है, हीरा। इस बार मौसी कसम से… आपका घर बनवा देगा। आपकी आय दोगुनी कर देगा।’
मौसी बोली- ‘अरे बेटा, इस उमर में मैं क्या कामधाम करूंगी? मकान बनाने के लिए सुंदरी इलेक्ट्रिक रिक्शा चलाकर कमा लेगी। मगर मैं किसी झूठे के साथ सुंदरी का हाथ देने से रही।’
‘अरे मौसी सुनो तो! गब्बर ने जो धन रामगढ़ से लूटकर ऊपर पहाड़ियों (विदेशों) में छुपा रखा है, अपना हीरा उसे भी (काला धन) ले आएगा।’ पन्ना ने फिर दलील दी और आगे बोला, ‘अपना हीरा पाकिस्तान के छह टुकड़े कर देगा, चीन की आंखें निकालकर गोटियां खेलेगा, रामगढ़ को दुनिया की सबसे बड़ी इकोनॉमी बना देगा। सबके खाते में १५ क्या ३० लाख दे देगा, गैस सिलिडर आपको २०० रुपए में, पेट्रोल ४० रुपए में देगा।’
‘मगर बेटा हमारी सुंदरी का रिक्शा तो बिजली से चलता है’, मौसी बोली।
‘वही तो… ये देखो खंभे लग गए हैं। अब तार आने में थोड़ी देर तो लगती है न मौसी। बिजली भी आ ही जाएगी। इसके अलावा डॉलर को २० रुपए में लाकर खड़ा करेगा। आपका गांव भी २०० स्मार्टसिटी में शामिल हो जाएगा। हिंदू-मुस्लिम के दंगे बंद हो जाएंगे, साल में दो करोड़ नौकरियां पैदा करके बेरोजगारी खत्म कर देगा। रेलवे को जापान की तरह बना देगा। हजार रुपए में हवाई जहाज की टिकट कहीं से कहीं भी आओ-जाओ करवा देगा। आटा, चावल, दाल, गेहूं, सब्जी सब २० रुपया किलो होगी। औरतों की हिफाजत करवाएगा। मीडिया को निष्पक्ष बनवा देगा। हर हफ्ते दो प्रेस कॉन्प्रâेंस करेगा। संस्कृत और इंग्लिश में बोलना बंद कर देगा। पीना बंद कर देगा और तो और मौसी अगले पांच साल विदेश भी नहीं जाएगा…! मौसी हां कर दो, सुंदरी खुश रहेगी?’ पन्ना की दलील जारी रही।
मौसी ने कहा, ‘बेटा, लेकिन ये करेगा वैâसे…? पिछली दो बार भी तो यही सब कहके सबको उल्लू बनाया था…!’
पन्ना बोला, ‘अरे मौसी, सब करेगा, बल्कि इससे ज्यादा करेगा, बस इस बार मोतीलाल के सपूत उसे काम करने दे, कोई रोड़ा ना अटकाएं। सब करेगा मौसी, देखते जाइये, सब करेगा…!!’
‘अच्छा बेटा ये बताओ आज तुम इतनी बड़ी-बड़ी क्यों फेंक रहे हो?’ मौसी ने पूछा।
‘वो क्या है न मौसी कि आज उसका गिलास मैं पी गया, वरना क्या मैं कभी ऐसी बातें करता?’

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

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