मुख्यपृष्ठस्तंभउदय शंकर भट्ट साहित्य में नाट्य और एकांकी विधा के उन्नायक

उदय शंकर भट्ट साहित्य में नाट्य और एकांकी विधा के उन्नायक

साहित्य शलाका- डॉ. दयानंद तिवारी

विद्वान सुप्रसिद्ध लेखक तथा कवि उदय शंकर भट्ट बहुमुखी प्रतिभा के धनी एकांकीकार थे। पौराणिक एकांकी, हास्य प्रधान एकांकी, समस्या प्रधान एकांकी आदि एकांकी की उन्होंने रचना की। उदयशंकर भट्ट अध्यापन काल से ही लिखने लगे थे। १९३१ में उनका पहला काव्य संग्रह ‘तक्षशिला’ प्रकाशित हुआ। उसके बाद ‘राका’, ‘मानसी’, ‘विसर्जन’, ‘युग दीप’ और ‘यथार्थ और कल्पना’ जैसी काव्य रचनाएं सामने आर्इं। लेकिन उनकी विशेष ख्याति नाटककार के रूप में है। उन्होंने ऐतिहासिक, पौराणिक और सामाजिक सभी विषयों पर नाटकों, गीति नाटकों की रचना की। ऐतिहासिक नाटकों में ‘दाहर’ अथवा ‘सिंध पतन’, ‘मुक्तिपथ’, ‘शक विजय’ आदि की गणना होती है।

उदय शंकर भट्ट का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा में अपने ननिहाल में ३ अगस्त, १८९८ को हुआ था। उनके पूर्वज गुजरात के सिंहपुर से आकर इंदौर नरेश के न्यायाधीश नियुक्त होकर उत्तर प्रदेश के बुलंद शहर के कर्णदास ग्राम में बस गए थे। घर का वातावरण सुसंस्कारित एवं संस्कृतभाषी था। उनके पिता पं. मेहता फतेहशंकर भट्ट अंग्रेजी पढ़े-लिखे थे, फिर भी वे संस्कृतनिष्ठ थे। उन्होंने ब्रजभाषा में कवित्त, सवैयों की रचना की थी और कभी-कभी काव्यगोष्ठियों में भी वे अपनी रचनाओं का पाठ करते थे। उदयशंकर को भी इन्हीं गोष्ठियों से साहित्य-लेखन की प्रेरणा मिली।

तेरह वर्ष की अवस्था में ही माता और पिता की मृत्यु के पश्चात अपने पितामह पं. दुर्गाशंकर के संरक्षण में इटावा में रहने लगे। उन्होंने संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी की शिक्षा इटावा में प्राप्त की और सन १९२३ में जीविका की खोज में लाहौर चले गए। उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से ‘बी.ए.’, पंजाब से ‘शास्त्री’ और कोलकाता से ‘काव्यतीर्थ’ की परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। लाहौर में सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लाला लाजपत राय के नेशनल कॉलेज में अध्यापक बने, वहां क्रांतिकारी सरदार भगतसिंह, सुखदेव और भगवती चरण वोहरा के अतिरिक्त प्रसिद्ध हिंदी उपन्यासकार यशपाल को भी उन्होंने पढ़ाया। इसके पश्चात आप लाहौर के खालसा कॉलेज और सनातन धर्म कॉलेज आदि में अध्यापन करते रहे।

अध्यापनकाल में ही उनमें नाटक लिखने की रुचि विकसित हुई और सन १९२१-२२ में उन्होंने ‘असहयोग और स्वराज’ तथा ‘चितरंजनदास’ शीर्षक से नाट्य-रचनाएं लिखीं और उन्हें मंच पर प्रस्तुत भी किया। इसके पूर्व वे ब्रजभाषा में कविताएं लिखना प्रारंभ कर चुके थे। तीसरे दशक में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा संचालित स्वतंत्रता आंदोलनों में भी वो सहभागी होते रहे और इस अवधि में सशस्त्र क्रांति की चेष्टा करनेवालों से भी उनका संपर्वâ रहा। १९४७ में भारत विभाजन के उपरांत वे लाहौर छोड़कर दिल्ली चले आए और देश को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात आकाशवाणी में सलाहकार के रूप में नियुक्त हो गए। कुछ वर्षों के उपरांत आकाशवाणी के नागपुर और जयपुर वेंâद्रों में वो प्रोड्यूसर के पद पर कार्य करते रहे। सेवामुक्त होने पर अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे स्वतंत्र रूप से अपने घर पर ही लेखन कार्य करते रहे। २८ फरवरी, १९६६ में ६९ वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
उदय शंकर भट्ट सेवानिवृत्त होकर स्वतंत्र रूप से कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी आदि लिखने लगे। समस्या का अंत, पर्दे के पीछे, अभिनव एकांकी, अंतोदय तथा चार एकांकी आदि उनकी प्रमुख एकांकी हैं। ये एकांकी इस बात का प्रमाण हैं कि वे रंगमंच एवं रेडियो की शिल्प विधि से अच्छी तरह से अवगत थे। इसका सम्यक ज्ञान उनके ऐतिहासिक, पौराणिक, सामाजिक, प्रतीकात्मक, समस्या प्रधान तथा हास्य-व्यंग्य पूर्ण भागों में विभाजित किया जा सकता है‌। युग की प्रवृत्तियों और सामाजिक परिवर्तनों से उन्होंने सदैव सामंजस्य बनाए रखा। उनकी एकांकी शिल्प और रेडियो दोनों दृष्टि से सफल है। यह परिदृश्य उनके पौराणिक कथाओं पर आधारित नाटकों में भी देखा जा सकता है। जहां वे युग के अनुरूप मान्यताओं और चरित्र की रचना करते हैं। रेडियो से प्रसारण की दृष्टि से उनके गीत नाट्य अत्यधिक सफल हुए हैं।

उदय शंकर भट्ट की प्रमुख रचनाएं इस प्रकार हैं-

एकांकी-नए मेहमान, समस्या का अंत, अंधकार और प्रकाश, अंतोदय, चार एकांकी, पर्दे के पीछे, लोक परलोक, अभिनव एकांकी, धूप सिखा, वापसी आदि।
काव्य संग्रह- मानसी, विसर्जन, तक्षशिला, अमृत और विष, इत्यादि, यथार्थ और कल्पना, युगदीप, विजयपथ आदि।

उपन्यास- वह जो मैंने देखा, नए मोड़, सागर लहरें और मनुष्य, लोक परलोक, शेष अशेष, दो अध्याय आदि।

नाटक- नया समाज, विक्रमादित्य, कालिदास, तुलसीदास, स्त्री का हृदय, धूप सिखा, दस हजार एकांकी, अंधकार और प्रकाश, तीन नाटक, समस्या का अंत, विश्वमित्र, पार्वती, मुक्तिपथ, मत्स्यगंधा, गुरुद्रोण का अंतर्निरीक्षण, अशोक वन बंदिनी, विद्रोहिणी अंबा, अंतहीन अंत, सागर विजय, कमला, आज का आदमी आदि।

स्वयं उदयशंकर भट्ट अपने लेखन के संदर्भ में कहते हैं कि मेरे ये हास्य एकांकी अनेक बार रंगमंच पर अभिनीत हो चुके हैं। मंचन के बाद मुझे बताया गया है कि दर्शकगण खूब हंसे, खिलखिलाए और फिर सम्बद्ध समस्याओं अथवा प्रसंगों के विषय में विचार करने को भी प्रेरित हुए। इन एकांकियों में मैंने विभिन्न अवस्थाओं में पात्रों की मानसिक प्रवृत्तियों को दर्शाने का प्रयास किया है। वास्तव में प्रस्तुतिकरण की यथार्थता पर ही उसकी प्रभावशीलता निर्भर है।

मेरा विश्वास है कि समाज में रूढ़ियों, दुराग्रहों एवं मूढ़ताओं को दूर करने में रंगमंच की विशेष भूमिका है। यथार्थ यदि कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया जाए तो उससे सामाजिक, राजनीतिक तथा नैतिक दृष्टि से परिष्कार होता है।

हास्य एकांकी का समस्यामूलक होना स्वाभाविक ही है और तभी वह मनोरंजन के साथ-साथ वास्तविक स्थिति की ओर भी पाठक अथवा दर्शक का ध्यान आकर्षित करता है। इसके आंतरिक मनोवैज्ञानिक तथ्यों का समीकरण भी आवश्यक है। ‘सत्य का मंदिर’ जैसे व्यंग्य प्रधान मेरे एकांकी हैं। मेरी समझ में यह भी जीवन के सहज विकास के लिए आवश्यक है। जो हमारे अंतर को न झिंझोड़, वैसा मात्र मनोरंजन भी अभीष्ट नहीं जान पड़ता। साहित्य आत्मा के विकास का साधन है, ऐसी मेरी मान्यता है। जीवन को मैंने आलोचक की आंखों से देखने का प्रयास किया है। इसीलिए मेरे प्रहसनों के पात्रों में वास्तविकता तथा वस्तुवादी सामग्री का ठोस सम्मिश्रण है। घटनाओं की प्रस्तुति रोचक भी है और व्यंग्यात्मक भी। आशा है पाठकगण इनके रस-संचार से आनंदित होंगे।

उदय शंकर भट्ट ने खड़ी बोली में काव्य रचना की है। आपकी भाषा विषय एवं पात्र के अनुसार परिवर्तित है आप प्राय: छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग करते हैं आवश्यकता पड़ने पर अंग्रेजी तथा उर्दू के शब्दों का भी प्रयोग आपने आपके काव्य में किया है। उदय शंकर भट्ट जी ने अपनी एकांकियों में संवाद शैली का अधिक प्रयोग किया है। आवश्यकतानुसार व्यंग्य-हास्य, भावात्मक, वर्णनात्मक आदि शैली रूप भी आपने अपनाएं हैं।

अन्य समाचार