मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाफिजूल खर्च करने में उल्हासनगर अव्वल?

फिजूल खर्च करने में उल्हासनगर अव्वल?

उल्हासनगर शहर में फिजूल खर्च के चलते मनपा कंगाली की राह पर जा पहुंची है। एक ही काम को बार-बार किया जाता है। मनपा प्रशासन द्वारा इस तरह से कार्य करने के कारण दिव्यांग लोगों को मनपा द्वारा मिलनेवाली सहायता राशि नहीं मिल रही है। ठेकेदार यह कहते फिर रहे हैं कि उन्हें काम के बदले मोटी रकम रिश्वत के तौर पर बांटनी पड़ रही है। इसका ही नतीजा है कि उल्हासनगर की सड़कें कुछ माह में ही खराब हो जाती हैं। शहर की एक चौथाई सड़क को मरम्मत के दौरान ही छोड़ दिया जाता है। ‘दोपहर का सामना’ के सिटीजन रिपोर्टर सालिकराम सोनावने ने उल्हासनगर के घटिया कारोबार की पोल खोली है।
सालिकराम सोनावने ने बताया कि उल्हासनगर में अब उल्हासनगर को प्रेम करनेवाले नहीं रहे। उल्हासनगर को अब केवल लूटने का चक्र शुरू है। उल्हासनगर में सड़कों की पूरी चौड़ाई तक का काम नहीं किया जाता है। नालियों के रिपेयरिंग के नाम पर काम चलाऊ काम किया जाता है। जगह पर प्रवेश द्वार बनाया गया है, जिसका कोई फायदा नहीं है। शहर में दीवार पर पौधे लगाकर उसको वर्टिकल गार्डन नाम दिया गया है। पौधों पर पानी मारने के लिए ठेकेदार नियुक्त किए गए हैं। फाउंटेन बनाया गया है। जिसका काफी सामान चोरी हो जाने के कारण यह बंद पड़ा है। उल्हासनगर में बाग-बगीचे और उसमें लगे खेल के साधनों का उद्घाटन के बाद उसकी मरम्मत और देखभाल करनेवाला कोई नहीं है। आज निर्माण कार्य मुकादम के भरोसे पर है। तरह-तरह के इंजीनियर सिर्फ ऑफिस में बैठकर साइन करते हैं। जिस शहर का कारोबार इस तरह का होगा, उस शहर की प्रजा तो दुखी ही रहेगी। नेता, समाजसेवी के साथ पूर्व नगरसेवक और प्रशासकीय अधिकारी ठाट से रहते हैं। उल्हासनगर की लूट से शहर कंगाली की राह पर है। उल्हासनगर में प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए विकास के नाम पर खर्च तो होते हैं, लेकिन वहां विकास कार्य दिखाई नहीं दे रहा है।
अभी हाल ही में प्रदूषण को लेकर कोहराम मचा था। उसे रोकने के लिए सरकार की तरफ से कुछ दिशानिर्देश जारी किए गए थे। आज उस आदेश की खिल्ली उड़ रही है। उल्हासनगर की सड़कों के किनारे धूल ही धूल जमा है, जिसके कारण लोगों को श्वसन रोग हो रहा है। उल्हासनगर में फिजूल खर्च के कारण शहर बर्बाद और कंगाल हो रहा है। उल्हासनगर में विकास कार्य के नाम पर राज्य, केंद्र अन्य तमाम योजना से पैसा तो आता है, परंतु उससे कोई सुधार नहीं दिखाई दे रहा है। इस काम के लिए कर्मठ, ईमानदार आयुक्त, उपायुक्त और सहायक आयुक्त जैसे तमाम लोगों की जरूरत है, जो यहां नहीं है।

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