मुख्यपृष्ठस्तंभउम्मीद की किरण : बच्ची और बबल बेबी सिंड्रोम!

उम्मीद की किरण : बच्ची और बबल बेबी सिंड्रोम!

धीरेंद्र उपाध्याय

मैंगलोर में पैदा हुई अनीशा के माता-पिता गितिका और गीतेश को यह पता चल गया था कि वह `बबल बेबी सिंड्रोम’ के साथ पैदा हुई है। इस बीमारी में एकमात्र इलाज बोन मैरो प्रत्यारोपण होता है। इसके बाद जब चिकित्सकों ने उन्हें बताया कि उनकी बच्ची बिना प्रतिरक्षा प्रणाली के पैदा हुई है तो ये दूसरा झटका लगया। गौर करने वाली बात ये है कि इस दंपित ने पिछली गर्भावस्था के समय भी संक्रमण के कारण अपने बच्चे को खो दिया था इसलिए इस बार वे अपनी बच्ची को नहीं खोना चाहते थे।
ऐसे में बच्ची का इलाज कर रहे चिकित्सकों ने मुंबई के वाडिया अस्पताल में जाने की सलाह दी। उनकी सलाह पर दंपति बच्ची को लेकर मुंबई के वाडिया अस्पताल में पहुंच गए। तमाम जांच करने के बाद मरीज को बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट में ले जाया गया। यहां प्रत्यारोपण के लिए हिंदुस्थान में तीन बोन मैरो रजिस्ट्री केंद्रों में १० से अधिक दाता पाए गए। उसके प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त दाता सुनिश्चित करने के लिए सभी बोन मैरो रजिस्ट्री केंद्र चौबीसों घंटे काम कर रहे थे। उसमें से एक उपयुक्त दानदाता का चयन किया गया। संयुक्त इम्युनोडेफिशिएंसी वाले बच्चों में समय बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि बाद में संक्रमण जीवन के लिए खतरा बन सकता है।
वाडिया अस्पताल के प्रत्यारोपण विशेषज्ञों ने कहा कि अनीशा को एक पूरी तरह से मेल खानेवाले दाता की प्रतीक्षा थी। ऐसे में उसे बोन मैरो प्रत्यारोपण यूनिट में भर्ती कराया गया था। इस बीच वायरल संक्रमण को रोकने के लिए उसकी देखभाल की गई। दाता से स्टेम सेल प्राप्त करने के तुरंत बाद उसका प्रत्यारोपण किया गया, जो सफल रहा। बच्ची के पूरी तरह स्वस्थ्य होने के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। वाडिया अस्पताल के प्रत्यारोपण विशेषज्ञों के अनुसार, बीमारी का समय पर पता लगने से बच्ची को बचाया जा सका है।
ट्रांसप्लांट विशेषज्ञों का कहना है कि पूरी तरह से मेल खानेवाले स्टेम सेल डोनर की उपलब्धता से ट्रांसप्लांट की जटिलताएं भी कम हो जाती हैं। हम मरीजों को समय पर डोनर उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बोन मैरो रजिस्ट्री के आभारी हैं। बढ़ती जागरूकता के कारण बोन मैरो रजिस्ट्री में दाता पूल का विस्तार हो रहा है और दस साल पहले की तुलना में भारतीय रोगी के लिए एक आदर्श साथी खोजने की संभावना में काफी सुधार हुआ है। वाडिया अस्पताल की सीईओ डॉ. मिनी बोधनवाला का कहना है कि यह डोनर से स्टेम सेल प्राप्त करने वाले देश के सबसे प्रसिद्ध ट्रांसप्लांट अस्पतालों में से एक है। वाडिया अस्पताल में अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण जैसे जटिल उपचारों का उपयोग करके बहुत छोटे बच्चों सहित रोगियों का इलाज करना इस बात का एक बड़ा उदाहरण है कि वैâसे सफल प्रत्यारोपण जीवन-घातक इम्यूनोडेफिशिएंसी को दूर कर सकता है। बबल बेबी सिंड्रोम का समय पर पता होने पर इसका तुरंत इलाज संभव हो सका। बबल बेबी सिंड्रोम को चिकित्सकीय भाषा में संयुक्त इम्यूनोडेफिशियेंसी के रूप में जाना जाता है। ऐसे बच्चे बिना प्रतिरक्षा प्रणाली के पैदा होते हैं, जिससे उनमें जानलेवा संक्रमण होने का खतरा रहता है। यह आनुवंशिक दोष टी कोशिकाओं की कमी का कारण बनता है, जो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण घटक है। अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण के बिना संयुक्त इम्युनोडेफिसिएंसी वाले अधिकांश बच्चे अपने जन्म के एक वर्ष के भीतर तक संक्रमण के प्रति संवेदनशील होते हैं। बबल बेबी सिंड्रोम १,००,००० शिशुओं में से एक में होता है।

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