निरुत्तर

सवाल उठे उठते रहे हैं, उठ रहे हैं उठेंगे अवश्य उठेंगे।
नैतिकता पर ईमानदारी पर, कर्तव्य पर व्यवहार पर।
आदर्श पर विचार पर, चल रहे प्रचार पर।
सत्य पर अहिंसा पर और अंत में मानवता पर भी।
सवाल तो उठेंगे अवश्य उठेंगे, हमारे देश में समाज में जीवन में।
कभी न कभी सवाल तो उठेंगे, एक न एक दिन।
तब कठिन हो जाएगा, बहुत कठिन हो जाएगा
उत्तर ढूंढ़ना एक दिन।।
इस निरूत्तर युग में सवालों के जखीरों से गुजरते हुए
हमने देखा मुरझाए हुए सवाल
ताक रहे हैं माध्यम की ओर कातर नजरों से।
कुछ सवाल हैं जो ताक रहे हैं, एकता की ओर।
और उनकी ओर जो सवालों को सीने में दबाए जी रहे हैं विवश होकर।
और उनकी ओर भी जो अंधे हो रहे हैं सवालों से।
शायद उनकी ओर भी जो बड़े शान से
कहते हैं अपने आप को वारिस भगत सिंह का।।
अन्वेषी

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