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जनसंख्या नीति में एकरूपता जरूरी है

मुस्लिमों में आबादी नियंत्रण में जागरूकता के उपाय की बात करें तो असम के डॉ. इलियास अली के जागरूकता अभियान का जिक्र करना जरूरी है। डॉ. अली गांव-गांव जाकर मुसलमानों में अलख जगा रहे हैं कि इस्लाम एक ऐसा अनूठा धर्म है, जिसमें आबादी पर काबू पाने के तौर-तरीकों का ब्यौरा है। इसे अजाल कहा जाता है। इसी बिना पर मुस्लिम देश ईरान में परिवार नियोजन अपनाया जा रहा है। यही नहीं, इसकी जवाबदेही धर्मगुरुओं को सौंपी गई है। ये ईरानी दंपतियों के बीच कुरान की आयतों की सही व्याख्या कर लोगों को परिवार नियोजन के लिए प्रेरित कर रहे हैं। डॉ. इलियास चिकित्सा महाविद्यालय गुवाहाटी में प्राध्यापक हैं। वे प्रकृति से धार्मिक हैं। उनसे प्रभावित होकर असम सरकार ने उन्हें खासतौर से मुस्लिम बहुल इलाकों में परिवार नियोजन के क्षेत्र में जागरूकता लाने की कमान सौंपी है। डॉ. इलियास के इन संदेशों को पूरे देश में पैâलाने की जरूरत है। आबादी नियंत्रण के परिप्रेक्ष्य में हम केरल राज्य द्वारा बनाए गए कानून वूमेन कोड बिल-२०११ को भी एक आदर्श उदाहरण मान सकते हैं।

नागपुर में विजयादशमी उत्सव के मौके पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने देश की विसंगतिपूर्ण बढ़ती आबादी पर चिंता जताते हुए जनसंख्या नीति को एकरूपता में ढालने के लिए कानून बनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि विविध संप्रदायों की जनसंख्या वृद्धि दर में भारी अंतर, अनवरत विदेशी घुसपैठ व मतांतरण के चलते देश को समान जनसंख्या नीति बनाने की जरूरत है। क्योंकि जनसंख्या के अनुपात में जो अंतर बढ़ रहा है, वह देश की एकता, अखंडता एवं सांस्कृतिक पहचान के लिए गंभीर संकट का कारण बनता जा रहा है। नतीजतन स्थानीय हिंदू समाज पर पलायन का दबाव बढ़ रहा है। इस कारण आपराधिक घटनाएं भी बढ़ रही हैं इसलिए आवश्यक है कि देश के प्रत्येक नागरिक के लिए समान रूप से लागू होनेवाली जनसंख्या नीति बने। जनसंख्या वृद्धि पर एक नीति बने, जिसमें दो बच्चों के कानून का प्रावधान हो। यह नीति सभी के विचार व सहमति से बने। क्योंकि जनसंख्या एक समस्या भी है और एक साधन भी है लेकिन जिस तरह से देश के सीमांत प्रांतों और कश्मीर में जनसंख्यात्मक घनत्व बिगड़ रहा है, उस संदर्भ में जरूरी हो जाता है कि जनसंख्या नियंत्रण कानून जल्द वजूद में आए। २०१९ के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जनसंख्या विस्फोट को लेकर चिंता जताई थी। इससे लगता है कि संघ और भाजपा सुनियोजित ढंग से अपने एजेंडे को अमल में लाने के लिए सक्रिय हैं। भाजपा के घोषणा-पत्र में भी यह मुद्दा शामिल है। अलबत्ता कुछ विपक्षी अब सरकार के उस हर पैâसले का विरोध करने पर उतारू हैं, जो व्यापक देशहित में लिए जा रहे हैं। तीन तलाक, अनुच्छेद-३७०, ३५-ए, सीएए एवं किसान हित में बनाए गए कानूनों का विरोध करके कुछ विपक्षी दल अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने जब राम जन्मभूमि का पैâसला भगवान राम के पक्ष में दिया, तब भी कुछ विपक्षी एवं वामपंथियों को यह पैâसला रास नहीं आया था।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुओं की आबादी घटने पर कई बार चिंता जता चुका है, साथ ही हिंदुओं को ज्यादा बच्चे पैदा करने की सलाह भी संघ के कार्यवाहक देते रहे हैं। इन बयानों को अब तक हिंदू पक्षधरता के दायरे में समेटने की संर्कीण मानसिकता जताई जाती रही है, जबकि इसे व्यापक दायरे में लेने की जरूरत है। कश्मीर, केरल समेत अन्य सीमांत प्रदेशों में बिगड़ते जनसंख्यात्मक अनुपात के दुष्परिणाम कुछ समय से प्रत्यक्ष रूप में देखने में आ रहे हैं। कश्मीर में पुश्तैनी धरती से ५ लाख हिंदुओं का विस्थापन, बांग्लादेशी घुसपैठियों के चलते असम व अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में बदलते जनसंख्यात्मक घनत्व के चलते जब चाहे तब दंगे के हालात उत्पन्न हो जाते हैं। यही हालात पश्चिम बंगाल में भी देखने में आ रहे हैं। जबरिया धर्मांतरण पूर्वोत्तर और केरल राज्यों में बढ़ता ईसाई वर्चस्व ऐसी बड़ी वजह बन रही हैं, जो देश के मौजूदा नक्शे की शक्ल बदल सकती है? लिहाजा परिवार नियोजन के एकांगी उपायों को खारिज करते हुए आबादी नियंत्रण के उपायों पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है।
भारत में समग्र आबादी की बढ़ती दर बेलगाम है। १५वीं जनगणना के निष्कर्ष से साबित हुआ है कि आबादी का घनत्व दक्षिण भारत की बजाय, उत्तर भारत में ज्यादा है। लैंगिक अनुपात भी लगातार बिगड़ रहा है। देश में ६२ करोड़ ३७ लाख पुरुष और ५८ करोड़ ६५ लाख महिलाएं हैं। शिशु लिंगानुपात की दृष्टि से प्रति हजार बालकों की तुलना में महज ९१२ बालिकाएं हैं। हालांकि इस जनगणना के सुखद परिणाम ये रहे हैं कि जनगणना की वृद्धि दर में ३.९६ प्रतिशत की गिरावट आई है। २०११ की जनगणना के अनुसार हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर १६.७ प्रतिशत रही, जबकि २००१ की जनगणना में यह १९.९२ फीसदी थी। वहीं २०११ की जनगणना में मुसलमानों की आबादी में वृद्धि दर १९.५ प्रतिशत रही, वहीं २००१ की जनगणना में यह वृद्धि २४.६ प्रतिशत थी। साफ है, मुस्लिमों में आबादी की दर हिंदुओं से अधिक है, जो चिंताजनक है। राष्ट्रीय परिवार सर्वेक्षण के अनुसार लक्षद्वीप में मुस्लिम आबादी ९६ प्रतिशत, जम्मू-कश्मीर ६८, असम ३४, पश्चिम-बंगाल २७, केरल २६ और उत्तर-प्रदेश में २० प्रतिशत है। यह बड़ी आबादी अन्य धर्मावलंबियों के विरुद्ध टकराव के हालात बना रही है। इसी सर्वे के मुताबिक हिंदू बहुल कुछ राज्यों में जन्मदर घट रही है। विसंगति यह भी है कि पारसियों व ईसाइयों में भी जन्म दर घटी है। उच्च शिक्षित व उच्च आय वर्ग के हिंदू एक संतान पैदा करने तक सिमट गए हैं, जबकि वे तीन बच्चों के भरण-पोषण व उन्हें उच्च शिक्षा दिलाने में सक्षम हैं। भविष्य में वे ऐसा करें तो समुदाय आधारित आबादियों के बीच संतुलन की उम्मीद की जा सकती है? देश में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और बांग्लादेशी मुस्लिमों की अवैध घुसपैठ, अलगावादी हिंसा के साथ जनसंख्यात्मक घनत्व बिगाड़ने का काम भी कर रही है। कश्मीर से १९८९-९० में आतंकी दहशत के चलते मूल कश्मीरियों के विस्थापन का सिलसिला जारी हुआ था। इन विस्थापितों में हिंदू, डोंगरे, जैन, बौद्ध और सिख हैं। उनके साथ धर्म व संप्रदाय के आधार पर ज्यादती हुई और निदान आज तक नहीं हुआ। हालांकि नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा अनुच्छेद३७० हटाए जाने के बाद घाटी में हालात तेजी से बदल रहे हैं। लिहाजा उम्मीद की जा रही है कि विस्थापितों का अपने पुराने आशियानों में जल्द पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। लेकिन हाल ही में घाटी में हिंदुओं की चुन-चुन कर हत्याओं का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उसके चलते पुनर्वास संकट में पड़ता दिखाई दे रहा है।
कश्मीर में यह स्थिति बिगड़ने के कारणों में एक कारण जनसंख्यात्मक घनत्व बिगड़ना रहा है। जिसका दृष्परिणाम लोग अपने ही देश के एक हिस्से से खदेड़े गए शरणार्थी के रूप में भोग रहे हैं। इधर असम क्षेत्र में ४ करोड़ से भी ज्यादा बांग्लादेशियों ने नाजायज घुसपैठ कर यहां का जनसंख्यात्मक घनत्व बिगाड़ दिया है। नतीजतन यहां नगा, बोडो और असमिया उपराष्ट्रवाद विकसित हुआ। इसकी हिंसक अभिव्यक्ति अलगाववादी आंदोलन के रूप में देखने में आती रहती है। १९९१ की जनगणना के अनुसार कोकराझार जिले में ३९.५ फीसदी बोडो आदिवासी थे और १०.५ फीसदी मुसलमान, किंतु २०११ की जनगणना के मुताबिक आज इस जिले में ३० फीसदी बोडो रह गए हैं, जबकि मुसलमानों की संख्या बढ़कर २५ फीसदी हो गई है। कोकराझार से ही सटा है, धुबरी शहर। धुबरी जिले में १२ फीसदी मुसलमान थे लेकिन २०११ में इनकी संख्या बढ़कर ९८.२५ फीसदी हो गई है। धुबरी अब भारत का सबसे घनी मुस्लिम आबादीवाला जिला बन गया है। २००१ की जनगणना के मुताबिक असम के नौगांव, बरपेटा, धुबरी, बोंगई गांव और करीमनगर जैसे नौ जिले में मुस्लिम आबादी की संख्या हिंदू आबादी से ज्यादा है। तय है कि घुसपैठ ने भी आबादी का घनत्व बिगाड़ने का काम किया है। यहां गौरतलब है कि असम समेत समूचा पूर्वोत्तर क्षेत्र भारत से केवल २० किलोमीटर चौड़े एक भूखंड से जुड़ा है। इन सात राज्यों को सात बहनें कहा जाता है। यह भूखंड भूटान, तिब्बत, म्यांमार और बांग्लादेश से घिरा है। इस पूरे क्षेत्र में ईसाई मिशनरियां सक्रिय हैं, जो शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के बहाने धर्मांतरण का काम भी कर रही हैं। इसी वजह से इस क्षेत्र का नागालैंड ऐसा राज्य है, जहां ईसाई आबादी बढ़कर ९८ प्रतिशत के आंकड़े को छू गई है। बावजूद भारतीय ईसाई धर्मगुरु कह रहे हैं कि ईसाइयों की आबादी बीते ड़ेढ़ दशक में घटी है। इसे बढ़ाने की जरूरत है। चर्चों में होनेवाली प्रार्थना सभाओं में इस संदेश को प्रचारित किया जा रहा है। इस पर कोई हंगामा खड़ा नहीं होता, जबकि संघ या भाजपा से जुड़ा कोई व्यक्ति आबादी नियंत्रण की वकालात करता है तो तत्काल हो-हल्ला शुरू हो जाता है। अतएव इस संवेदनशील मुद्दों को संजीदगी से लेने की जरूरत है।
(लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)