तलब और तड़प

जिंदगी से जूझने के लिए तलब और तड़प
दोनों का होना अनिवार्य है।
जी में किसी मुकाम तक पहुंचने की तलब होगी
तो रुतबा हासिल करने तक तड़प बरकरा रहेगी।
बशर्ते तलब भी अपना दायरा न लांघे
यहां अनुशंसित तलब का जिक्र हो रहा है
न कि सनकी व्यग्रता या व्यसन-लत का
यदि है तो वो विनाशकारी तलब सिद्ध होगी।
जो तलब अपने ध्येय पर खरी न उतरे
उसकी तड़प संवारेगी तो क्या,
उसके मनसूबे को ही क्षीण कर रख देगी!
इसलिए भी तलब में संयम और सब्र का बरतना
वाजिब / वास्तविक तड़प की कसक की पहली शर्त है
तलब और तड़प का जब तक तालमेल बना रहेगा
लक्ष्यरूपी जीवन-रेल जिंदगी की पटरी पर
अपने पूरे वेग से सफलतापूर्वक रफ्तार पकड़े रखेगी।
गोया तलब और तड़प एक दूसरे के पूरक हैं।
विश्वसनीय उत्साह वर्धक पूरक चाहे प्रेरक कह लो।
किसी एक के बिना दूसरा पंगु ही जानें।

त्रिलोचन सिंह अरोरा
डोंबिवली

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