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इस्तेमाल करो और फेंको!… बावनकुले की पार्टी रहेगी क्या?

देश तानाशाही की ओर बढ़ रहा है। उस तानाशाही का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी कर रही है। इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी ने देश पर तानाशाही थोपी और सभी प्रकार की आजादी को खत्म कर दिया, जिसकी वजह से तत्कालीन जनसंघ (आज की भाजपा) लड़ रही थी। आज वही भाजपा लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचल रही है और देश को एकाधिकारवाद और तानाशाही की खाई में धकेल रही है। भाजपा के महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले की सभी छोटी पार्टियों को हमेशा के लिए खत्म करने की भाषा उसी तानाशाही प्रवृत्ति का लक्षण है। बावनकुले भाजपा के शेखी बघारनेवाले ऐसे नेता हैं, जिनमें सामान्य ज्ञान की कमी है। उनके बयान को इतनी गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है, लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी कि बावनकुले की भाषा उनकी नहीं है बल्कि वे मोदी-शाह-नड्डा की भूमिका का उद्घोष कर रहे हैं। दो साल पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. नड्डा ने भी यही बाजा बजाया था कि भविष्य में शिवसेना समेत सभी क्षेत्रीय पार्टियों का सफाया हो जाएगा और भाजपा देश में एकमात्र पार्टी बनकर रह जाएगी। अब बावनकुले ने भी उसी सुर में सुर मिलाया है। बावनकुले कहते हैं, ‘आगामी लोकसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में विभिन्न दलों के कार्यकर्ता और पदाधिकारी भाजपा में शामिल हो रहे हैं। इसे ध्यान में रखते हुए अपने-अपने जिलों में छोटे दलों के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को भाजपा में शामिल करें और गांवों व कस्बों के छोटे-छोटे दलों को खत्म करें।’ बावनकुले का यह बयान लोकतंत्र के लिए घातक है। छोटे दलों को खत्म कर केवल हम ही राज करेंगे, इस रवैये को आखिर क्या कहें? भारतीय संविधान ने स्वतंत्रता और लोकतंत्र के जो सिद्धांत बताए हैं, उनमें बावनकुले का सुविचार कहीं फिट नहीं बैठता। मोदी ने २०१४ में कांग्रेस मुक्त देश की घोषणा की, यह भी एक अलोकतांत्रिक बयान है। कांग्रेस ने देश की आजादी की लड़ाई में बहुत बड़ा योगदान दिया। ‘भाजपा’ परिवार तब अंग्रेजों की चाकरी में था। इसीलिए भाजपा के मन में कांग्रेस के प्रति नफरत है और उन्होंने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया, लेकिन पिछले दस वर्षों में कांग्रेस तो खत्म नहीं हुई, बल्कि इसके उलट भारतीय जनता पार्टी कांग्रेसयुक्त हो गई है। भाजपा ने कांग्रेस समेत कई पार्टियों के ‘अनुभवी भ्रष्ट’ नेताओं को अपनी पार्टी में लिया। इसके चलते अन्य पार्टियां तो भ्रष्टाचार से मुक्त हो गर्इं, लेकिन भाजपा एक पोखर बन गई है क्या बावनकुले को इस बात का एहसास है? भाजपा रिश्तेदारी, गठबंधन, विचारधारा आदि का सम्मान करने वाली पार्टी नहीं है। जो-जो दल भाजपा के साथ गए उन दलों को खत्म करने का काम भाजपा ने किया। भाजपा की नीति है कि जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल करो और जरूरत खत्म होने पर फेंक दो। महादेव जानकर, बच्चू कडू, सदाभाऊ खोत आदि लोग भाजपा के वर्तमान सहयोगी हैं। लेकिन बच्चू कडू ने हाल ही में कहा है, ‘भारतीय जनता पार्टी का रवैया छोटे दलों को साथ लेकर उन्हें कुचलने का है। इसका अनुभव हम भी कर रहे हैं।’ उसी समय महादेव जानकर ने भी अपनी भड़ास निकाली। जानकर कहते हैं, ‘इस्तेमाल करो और फेंक दो’ ये भाजपा का सिद्धांत है। इसलिए भाजपा सहयोगियों का इस्तेमाल कर, बाद में उन्हें किनारे कर देती है। पिछले दिनों सदाभाऊ खोत की छोटी पार्टी ने भी यही दुख व्यक्त किया। कल को शिंदे गुट और अजीत पवार गुट भी यही दुख व्यक्त करें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। ‘इस्तेमाल करो और फेंक दो’ भाजपा की नीति है और यह सिर्फ उसके सहयोगियों तक ही सीमित नहीं है बल्कि उसकी अपनी पार्टी के कई दिग्गजों के लिए भी यही नीति है। ये सच है कि श्री राम का मंदिर बना, और उसकी प्राण-प्रतिष्ठा भी हो गई, लेकिन लोकसभा चुनाव जीतने के लिए अगर उन्हें एहसास हो गया कि श्री राम काम नहीं आ रहे हैं, तो ये लोग राम को भी कोने में डाल देंगे। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, रविशंकर प्रसाद जैसों को कब का बाहर फेंक दिया गया। महाराष्ट्र में गोपीनाथ मुंडे, प्रमोद महाजन के परिवार को सिर उठाने नहीं दिया जाता, लेकिन उनके नाम का भरपूर इस्तेमाल किया गया है। मध्य प्रदेश और राजस्थान का चुनाव जीतने के लिए शिवराजमामा चौहान और वसुंधराराजे शिंदे का इस्तेमाल किया गया, लेकिन चुनाव जीतते ही दोनों को ऐसा झटका लगा कि उन्हें समझ ही नहीं आया कि उन्हें कहां फेंक दिया गया। प्रधानमंत्री मोदी कहते थे कि वह शरद पवार की उंगली पकड़कर राजनीति में आए हैं। उसी पवार की पार्टी को मोदी ने तोड़ दिया। शिवसेना के कंधों पर बैठकर भाजपा बढ़ी, लेकिन इस शिवसेना के पीठ में खंजर घोंप कर भाजपा ने शिवसेना तोड़ दी। बेशक, भाजपा ने ये सभी हथकंडे अपनाए फिर भी भाजपा इनमें से एक भी दल को खत्म नहीं कर पाई। इसके उलट महाराष्ट्र में शिवसेना और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी मजबूती से आगे बढ़ रही है। भाजपा परजीवी पार्टी बन गई है और दूसरों से उधार लेकर जीवन यापन कर रही है। वह ईडी और सीबीआई के कूबड़ पर टिकी हुई है। जो खुद ही परजीवी हैं उन्हें दूसरों को खत्म करने के लिए बेतुकी भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। २०२४ के चुनाव के बाद बाकी सभी पार्टियां तो साबुत रहेंगी, लेकिन क्या फडणवीस, बावनकुले की भाजपा महाराष्ट्र में रहेगी? सवाल यही है। जनता तय करती है कि किसे फेंक देना चाहिए और किसे सिर पर बिठाकर नचाना चाहिए। ईवीएम, ईडी, सीबीआई का उपयोग करके खुद की पार्टी को बनाने वाले यह तय नहीं कर सकते। आने वाला कल भाजपा के लिए विषकाल है। बावनकुले, अपनी पार्टी को इलाज के लिए आईसीयू में ले जाने की तैयारी करो!

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