उपयोगी की जयकार

जब तक उपयोगी थे
सबकी आंख के तारे थे
सबके प्यारे थे दुलारे थे
सब चरण वंदना करते थे
समय कुछ ऐसा आया
सेहत छीन ले गया
फिर धन भी चला गया
अक्षम हुए तो अभागे हो गए
सबके लिए निरर्थक हो गए
उपेक्षा मिली तो हिम्मत हार गए
सब साथ थे अकेले हो गए
जीवन का यही सार है
कृतघ्न सारा संसार है
उपयोगी हो तो जयकार है
अक्षम हो तो तिरस्कार है

 

प्रेम पथ

प्रेम पथ में शूल बड़े हैं।
प्रणय डगर में विघ्न खड़े हैं।
निश्छल राह बड़ी विकट है।
प्रीति मार्ग बड़ा कठिन है।
समर्पण से प्रेम सफल है।
त्याग से प्रेम फलित है।
प्रेम है तो स्वार्थ नहीं है।
प्रेम में बलिदान बड़ा है।
प्रेम में कोई शर्त कहाँ है।
निशर्त हो तो सब सहज है।
प्रेम है तो आन बान है।
प्रेम बिना सब शमशान है।
तू संग है फिर सब सरल है।
तू रुष्ट है फिर सब गरल है।

सपने और यथार्थ
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सपने देखना अच्छा तो लगता है।
हवा में महल बनाना मन को खूब भाता है।
कल्पना लोक में विचरण करना सुख तो देता है।
पर सपने तो आकाश तत्व है।
नभ में केवल शून्य व्याप्त है।
फिर कुटिया कहाँ बनेगी।
ज़िन्दगी कहाँ चलेगी।
जहाँ पांव तले ज़मीन होगी।
वहीं यथार्थ की नींव बनेगी।
कुटिया भी वहीं बनेगी।
जिंदगी भी वहीं चलेगी।

-डॉ. मधुसूदन शर्मा
रुड़की, हरिद्वार (उत्तराखंड)

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