मुख्यपृष्ठस्तंभभाजपा का सिरदर्द : किसे दें संगठन की जिम्मेदारी?

भाजपा का सिरदर्द : किसे दें संगठन की जिम्मेदारी?

हेमंत तिवारी।  उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार की दूसरी पारी शुरू होने के साथ ही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष कौन होगा, इसकी चर्चाएं चारों ओर चलने लगी हैं। सोशल मीडिया पर पिछले ४८ घंटों से पिछली सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे श्रीकांत शर्मा को बधाइयां देने की होड़ मची हुई हैं। वैसे २०२४ की बड़ी लड़ाई के मद्देनजर इस बेहद अहम पद के लिए मंत्रिपरिषद से बाहर रह गए कुछ कद्दावर चेहरों से लेकर संगठन में प्रभावी लोगों के नाम हवा में तैर रहे हैं। किसके सिर पर देश की सबसे बड़ी आबादी वाले सूबे में सबसे बड़ी पार्टी के मुखिया का ताज रखा जाएगा, इसको लेकर लोगों में उत्कंठा है। केंद्रीय नेतृत्व के सामने इस समय अध्यक्ष चुनने का काम खासा चुनौतीपूर्ण इसलिए भी हो गया है कि सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री योगी की टक्कर के संगठन अध्यक्ष तलाश बड़ी चुनौती बन गई है। दूसरी पारी में योगी के प्रभाव के अनुरूप संगठन अध्यक्ष भी होना चाहिए ऐसा जनता और पार्टी में सभी को लग रहा है। इसलिए भाजपा योगी जैसे संगठन के मुखिया की तलाश कर रही है।
भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर बीते सप्ताह सोशल मीडिया पर अटकलों का दौर तेजी से चलता रहा। पूर्व ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा को इस पद पर नियुक्त करने की खबरें वायरल होती रहीं। रायबरेली से भाजपा विधायक अदिति सिंह सहित पार्टी के कई जिम्मेदार लोगों ने भी सोशल मीडिया पर श्रीकांत को बधाई देकर अटकलों को और हवा दे दी। वहीं कुछ नेताओं ने श्रीकांत से फोन किया तो उन्होंने ऐसी कोई जानकारी होने से इनकार कर दिया।
जिसकी चर्चा होने लगती है उसका नाम रह जाता है कि तर्ज पर लोग मान रहे हैं कि कुछ नामों को तो बस इसी अंधविश्वास के नाते हवा में उड़ाया जा रहा है कि उनका नंबर न लगे। हालांकि नई भाजपा का मिजाज तो नया है ही और काम करने का तरीका भी नया है। अक्सर अपने पैâसलों से लोगों को चकित कर देनेवाला भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व यूपी में पार्टी मुखिया के चयन से भी लोगों को हैरान कर सकता है।
गौरतलब है कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह को प्रदेश सरकार में जल शक्ति मंत्री बनाया गया है। पार्टी में ‘एक व्यक्ति एक पद’ का सिद्धांत लागू होने के कारण स्वतंत्रदेव की जगह नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति होनी है। हालांकि स्वतंत्रदेव का कार्यकाल १९ जुलाई तक है लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि संगठनात्मक कार्यों को सुचारु रखने के लिए नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति जल्द हो सकती है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातियों के महत्व को देखते हुए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भाजपा का मुखिया तय करते समय इस अहम पहलू को ध्यान में नहीं रखा जाएगा। प्रदेश सरकार का मुखिया ठाकुर समुदाय से होने के बाद और मंत्रिपरिषद में पिछड़ों की भरपूर नुमाइंदगी होने के चलते निगाहें ब्राह्मण व दलित समुदाय से आने वाले नेताओं पर टिकती हैं। जिस तरह से अनदेखी, नाराजगी जैसी खबरों के बीच ब्राह्मण समाज ने झूम कर भाजपा को वोट दिया है और बंपर जीत दिला सरकार बनाने में खास भूमिका निभाई उससे इसका दावा सबसे मजबूत हो जाता है। हिंदी हृदय प्रदेश में बरसों बाद देखा गया कि भाजपा के लिए ब्राह्मण और क्षत्रिय लाइन लगाकर वोट कर रहे हैं और इसे सूबे में मोदी-योगी की जोड़ी का कमाल माना गया है।
यूपी में साल २००४ से २०१९ तक के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष ब्राह्मण रहा है। २००४ में केसरीनाथ त्रिपाठी, २००९ में रमापति राम त्रिपाठी, २०१४ में लक्ष्मीकांत बाजपेयी और २०१९ में महेंद्रनाथ पांडेय प्रदेश अध्यक्ष थे। इसलिए अटकलें लगाई जा रही हैं कि २०२४ लोकसभा चुनाव से पहले भी यह पद किसी ब्राह्मण नेता को दिया जा सकता है। ब्राह्मण नेताओं में श्रीकांत शर्मा, नोएडा के सांसद महेश शर्मा, अलीगढ़ के सांसद सतीश गौतम, बस्ती के सांसद व राष्ट्रीय मंत्री हरीश द्विवेदी, कन्नौज के सांसद सुब्रत पाठक, प्रदेश महामंत्री अश्विनी त्यागी, प्रदेश उपाध्यक्ष विजय बहादुर पाठक व बृज बहादुर उपाध्याय और पूर्व उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा के नाम प्रमुख हैं।
राज्य में ब्राह्मणों की संख्या कुल आबादी का करीब ११ज्ञ् है और यह समुदाय चुनावी रूप से काफी महत्वपूर्ण है। किसी ब्राह्मण नेता को ही प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के पीछे एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि राज्य के हालिया विधानसभा चुनाव में तमाम नाराजगी की खबरों के बावजूद ब्राह्मण वोटर भाजपा के पक्ष में ही एकजुट दिखे।
जबकि २०१४ के लोकसभा चुनावों से पहले लक्ष्मीकांत बाजपेयी और २०१९ के लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी डॉ. महेंद्रनाथ पांडेय को यूपी भाजपा की कमान सौंपी थी। ये दोनों चेहरे अगड़ी जाति से आते थे और पार्टी का ब्राह्मण चेहरा थे। इन चुनावों में भी पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया। अब सवाल ये है कि २०२४ को ध्यान में रखकर रणनीति तैयार कर रही भाजपा, पार्टी अध्यक्ष पद के लिए किस वर्ग के चेहरे को यूपी की कमान सौंपेगी?
ब्राह्मणों के साथ ही जिस समाज को लेकर भाजपा केंद्रीय नेतृत्व सबसे ज्यादा माथापच्ची कर रहा है वह दलित समुदाय है। यूपी में आमतौर पर बड़ी तादाद में दलितों के वोटों पर हकदारी बसपा की रहती रही है। हालांकि भाजपा ने २०१४ के लोकसभा चुनाव में इस मिथक में सेंध लगाने में थोड़ी बहुत कामयाबी हासिल की थी। भाजपा को पहले २०१४ के लोकसभा चुनावों में और फिर २०१७ के विधानसभा व फिर २०१९ के लोकसभा चुनावों में कम से कम गैर जाटव दलित वोटों का बड़ा हिस्सा मिला था। भाजपा के लिए किसी भी जीत से बड़ी सफलता २०२२ के विधानसभा चुनाव में अधिसंख्य दलितों और यहां तक कि जाटव समुदाय के भी कुछ वोटों का मिल जाना रहा है। पहली बार प्रदेश की राजनीति में बीते तीन दशकों में जाटव समाज के वोटों में किसी गैर बसपा दल ने सेंध लगायी है और भाजपा इस सिलसिले को जारी रखते हुए इस बिरादरी के लिए काम करती रहेगी। इस महत्वपूर्ण तथ्य के मद्देनजर इस बात की भी संभावना जताई जा रही है कि यूपी में अगला भाजपा अध्यक्ष दलित समुदाय से हो। फिलहाल भाजपा में दलित बिरादरी के नेताओं में विद्यासागर सोनकर, जी. एस. धर्मेश, लक्ष्मण आचार्य सहित कुछ लोगों के नामों की चर्चा तेज हो रही है। पार्टी का मानना है कि ब्राह्मण समाज से उपमुख्यमंत्री देने के बाद और फिर वैâबिनेट में बिरादरी को सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व दे देने के बाद दलितों को भी पर्याप्त भागीदारी दी जानी चाहिए।
इन सबसे इतर भाजपा के संगठन में और केंद्रीय नेतृत्व में सबसे ज्यादा विचार विमर्श अपना बनाम बाहर से आए लोगों को लेकर भी हो रहा है। २०१७ के योगी मंत्रिमंडल की बात करें तो वैâबिनेट में २२ मंत्रियों में से सिर्फ पांच ऐसे थे, जो भाजपा कोर वैâडर या विचारधारा के नहीं थे बल्कि दल बदल कर भाजपा में शामिल हुए थे। लेकिन इस बार स्थितियां काफी अलग हैं। इस बार १६ वैâबिनेट मंत्रियों में से आधे यानी आठ मंत्री भाजपा विचारधारा के नहीं हैं बल्कि बाहरी हैं। इन हालात में पार्टी के लिए जरूरी है संगठन पर खांटी उन्हीं लोगों का वर्चस्व हो जो संघ-भाजपा संगठन में पले, बढ़े, पनपे और खिले हों। जाहिर है संगठन में काम करने का अनुभव, संगठन के लोगों में स्वीकार्यता और कार्यकर्ताओं में लोकप्रियता भी एक बड़ा पैमाना होगी यूपी का नया अध्यक्ष चुनने की। उम्मीद है कि सरकार और संगठन में सेतु का काम कर सकने वाले, कार्यकर्ताओं के बीच गहरी पैठ रखने वाले और २०२४ में पहले से भी बेहतर प्रदर्शन कर दिखाने वाले चेहरे की तलाश जल्द खत्म होगी।
(लेखक उत्तर प्रदेश अधिस्वीकृत पत्रकार संघ के अध्यक्ष हैं। उत्तरप्रदेश की राजनीति के जानकार और स्तंभकार हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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