मुख्यपृष्ठस्तंभउत्तरनामा : कांग्रेस में पीके की आमद...बढ़ाएगी अखिलेश की मुसीबत!

उत्तरनामा : कांग्रेस में पीके की आमद…बढ़ाएगी अखिलेश की मुसीबत!

हेमंत तिवारी।  हाल में संपन्न हुए यूपी के साथ चार अन्य राज्यों में कांग्रेस की पस्त हालात ने देश की सबसे पुरानी पार्टी के शुभचिंतकों की चिंता को और गहरा कर दिया है। यूपी जैसे बड़े सूबे में कांग्रेस को कई छोटी क्षेत्रीय पार्टियों से भी कम वोट और सीटें मिली हैं। देश की सत्ता पर काबिज होने का सपना पाले कांग्रेस के लिए यूपी में सुधार बहुत जरूरी माना जा रहा है। नतीजों ने सिर्फ मायूसी के आलम को गाढ़ा करने का काम किया है।
स्याह अंधेरे में अब कांग्रेस के सामने चमकती लकीर चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के रूप में ही नजर आ रही है। प्रशांत किशोर के भरोसे कांग्रेस को न केवल देश बल्कि यूपी में अपनी दशा व दिशा सुधरने की उम्मीद जगी है। प्रशांत किशोर का साथ यूपी में जी-जान से जुटी प्रियंका गांधी को और भी मजबूती देने का काम करेगा। फिलहाल अपनी ईमानदार, भरोसेमंद टीम के सहारे प्रियंका यूपी में वोट भले ही पाने में कामयाब न हो सकी हों पर जनता के दिलों तक तो पहुंच बना ही चुकी हैं।
बीते कुछ दिनों के घटनाक्रम से यह तो साफ है कि प्रसिद्ध चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर बहुत जल्द बतौर कांग्रेस नेता देश के राजनीतिक पटल पर सामने आ सकते हैं। एक हफ्ते में तीसरी बार हुई कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के साथ प्रशांत किशोर की बैठक के बाद कांग्रेस खेमे से इस तरह के संकेत मिले हैं कि प्रशांत किशोर बहुत जल्द कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। उन्हें महासचिव जैसे बड़े पद के साथ बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है।
सोनिया गांधी के साथ हुई बैठक में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के प्रस्ताव का मूल्यांकन करनेवाली टीम के अलावा दो और नेताओं को बुलाया गया था। ये हैं देशभर में बचे कांग्रेस के दो मुख्यमंत्री। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल। इनके अलावा बैठक में जयराम रमेश, अंबिका सोनी, केसी वेणुगोपाल और सोनिया गांधी ने भाग लिया। माना जा रहा है कि प्रशांत किशोर के इस प्रस्ताव पर अगले महीने राजस्थान के उदयपुर में होने वाले कांग्रेस के चिंतन शिविर में खुला विचार-विमर्श होगा। इससे पहले २०१३ में जयपुर में कांग्रेस का चिंतन शिविर हुआ था, लेकिन इसमें चुनावी रणनीति पर कोई खास चर्चा नहीं हुई थी। कई दिनों की माथापच्ची के बाद राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाने का पैâसला हुआ था। इससे पहले वो बतौर महासचिव युवक कांग्रेस और छात्र कांग्रेस का प्रभार संभाल रहे थे।
बताया जा रहा है कि इस चिंतन शिविर में कांग्रेस २०१४ के बाद से लगातार हारने के कारणों पर खुले दिल और दिमाग से चिंतन करके आने वाले विधानसभा चुनावों के साथ ही २०२४ के लोकसभा चुनाव में जीत का रास्ता खोजेगी। इसके लिए प्रशांत किशोर ने एक व्यापक रिपोर्ट सौंपी है। चिंतन शिविर में इस पर खुली चर्चा होगी।
दरअसल प्रशांत किशोर (पीके) चुनाव में विजय दिलाने वाले के रूप में जाने जाते हैं। कांग्रेस के लिए उनका मकसद १३७ साल पुरानी पार्टी का पूरी तरह कायाकल्प करने का है। कांग्रेस का व्यावहारिक रूप से सफाया हो रहा है। २०१४ और २०१९ का लोकसभा चुनाव बुरी तरह हारने के अलावा कांग्रेस ने अपनी कई राज्य की सरकारें भाजपा के हाथों गंवाई हैं, इन्हें वो दोबारा चुनाव में भी भाजपा से नहीं छीन पाई है।
हालात ये हैं कि लंबे अरसे से कांग्रेस जीत को तरस गई है और हताशा में डूबी पार्टी के लिए प्रशांत किशोर ही बड़े सहारे के तौर पर नजर आ रहे हैं। लिहाजा कांग्रेस उन पर दांव लगाना चाहती है लेकिन इस मामले में वो सामूहिक निर्णय लेना चाहती है, भले ही अंतिम निर्णय सोनिया गांधी ही लेंगी।
हालांकि शुरू में कांग्रेस के ज्यादातर नेताओं ने प्रशांत किशोर के प्रस्तावों को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह गुजरात के लिए केवल एक बार का प्रस्ताव है। बाद में प्रशांत किशोर के संगठन आईपैक ने कहा कि इसमें कांग्रेस का कायाकल्प और २०२४ के आम चुनावों की रणनीति शामिल है। प्रशांत किशोर के पार्टी में शामिल होने पर कांग्रेस नेताओं के बीच आम राय नहीं बन पा रही है। इस पर बातचीत पिछले साल से चल रही है। बीच में बातचीत टूट गई थी। दस महीने बाद ये बातचीत फिर शुरू हुई है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक प्रशांत किशोर पार्टी में अहमद पटेल की तरह बड़ा पद और सहयोगी दलों से बातचीत की खुली छूट चाहते थे। लेकिन पार्टी में बड़े नेताओं को ये गवारा नहीं था, पर अब कोई बीच का रास्ता निकालने की कोशिश हो रही है।
कांग्रेस समिति के ज्यादातर सदस्यों का कहना है कि प्रशांत किशोर की ताकत डेटा विश्लेषण है। लिहाजा पार्टी के लाभ के लिए इसका उपयोग करना बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है। बुधवार की बैठक के बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि प्रशांत किशोर, नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, जगनमोहन रेड्डी, ममता बनर्जी और अमरिंदर सिंह के साथ काम कर चुके हैं। उनसे सेवा लेने में कोई हर्ज नहीं है।
कांग्रेस में प्रशांत किशोर की आमद देश के अन्य राज्यों के साथ ही यूपी में भी खास रणनीतियों के साथ इसे स्थापित करने और राजनीति के केंद्र में लाने की होगी। कम से कम यूपी में तो प्रशांत किशोर की आमद प्रदेश में प्रमुख विपक्षी दल के तौर पर स्थापित समाजवादी पार्टी के लिए खतरे की घंटी होगी।
हाल में निपटे यूपी विधानसभा चुनावों में अल्पसंख्यकों के दम पर काम भर की सफलता हासिल कर चुके अखिलेश यादव पहले से ही मुसीबतों में घिरे हुए हैं। उनकी मजबूती के दो प्रमुख आधार मुसलमान और यादव नाराज हैं। कम से कम मुसलमान तो साफ तौर पर विकल्प की तलाश में नजर आते दिखने लगे हैं। विधानसभा चुनावों में जब मुसलमान एकतरफा सपा की ओर की मुड़ चुके थे। उस समय भी पूरे समुदाय में २०२४ के लोकसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस की मदद का नारा फिजाओं में तैरने लगा था। चुनाव बाद अखिलेश के ढीले-ढाले रवैये, महत्वपूर्ण मुद्दों पर चुप्पी और अहम नेताओं की नाराजगी ने राह को और मुश्किल ही किया है।
जो रुझान दिख रहा है और इसमें पीके की रणनीति के साथ टीम प्रियंका की मेहनत जुड़ी तो कम से कम आने वाले लोकसभा चुनावों में सपा नहीं बल्कि कांग्रेस यूपी में भाजपा के सामने मुख्य विपक्षी पार्टी के तौर पर उभर सकती है। पीके को भी यूपी की अहमियत और यहां की मजबूती के सहारे देश की राजनीति में सफल होने के फार्मूले पर यकीन है। यही कारण है कि अपने प्रजेंटेशन में भी उन्होंने यूपी और बिहार में कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने की ही सलाह दी है।
प्रशांत किशोर की आमद से पहले कांग्रेस ने जेल में बंद सपा के कद्दावर नेता आजम खान से मिलने अपने बड़े चेहरे प्रमोद कृष्णन को भेजा। दोनों की मुलाकात घंटे भर से ज्यादा चली। आजम इन दिनों सपा मुखिया से नाराज हैं और उनके समर्थक किसी बड़े कदम उठाने जैसी बातें कर रहे हैं। उधर अखिलेश के चाचा शिवपाल भी अलग राग अलाप रहे हैं और भतीजे को सबक सिखाने के मूड में हैं। राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष जयंत चौधरी के भी प्रियंका गांधी के ठीक-ठीक रिश्ते हैं और विधानसभा चुनावों से पहले दोनों में कई दौर की बातचीत भी हो चुकी थी। कुल मिलाकर राजनैतिक घटनाक्रम आने वाले दिनों में यूपी में अखिलेश के हाशिए पर जाने और कांग्रेस के उनकी जगह लेने की ओर ही इशारा करते दिख रहे हैं।
(लेखक उत्तर प्रदेश अधिस्वीकृत पत्रकार संघ के अध्यक्ष हैं। उत्तरप्रदेश की राजनीति के जानकार और स्तंभकार हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

अन्य समाचार