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शुरू हुआ ब्राह्मण-ब्राह्मण का खेला!

मानसून के इंतजार के साथ ही देश के सबसे उर्वर सियासी सूबे उत्तर प्रदेश में चुनावी सरगर्मियां शुरू हो गई हैं। सियासी समर के लिए सेनाएं अपने लाव लश्कर दुरुस्त करने में जुट गई हैं। यह स्थापित सत्य है कि इस हिंदी हृदय प्रदेश में सत्ता किस राजनीतिक दल को मिलेगी, अब यह जाति और धर्म का समर्थन ही तय करता है, इसलिए जातीय गोलबंदी की कसरतें शक्ल लेने लगी हैं। फिलहाल चर्चा के केंद्र में हैं ब्राह्मण और उनको लुभाने की कोशिशें हर दावेदार दल कर रहा है।
राज्य से आ रहे समाचारों के अद्यतन शीर्षक भी संकेत देने लगे हैं, यथा-
-२०२२ में ब्राह्मण बनेंगे सभी राजनीतिक दलों के तारणहार!
– विधानसभा चुनावों २०२२ के लिए सभी राजनीतिक दलों में ब्राह्मण वोटरों को लुभाने की कवायद शुरू!
– बसपा अपने २००७ के सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले को नए कलेवर में लाने की तैयारी में!
– दशकों से छिटके ब्राह्मण वोट बैंक को वापस रिझाने की कोशिश में कांग्रेस!
२०२२ के विधानसभा चुनाव में धार्मिक और जातीय समीकरण साधने के लिए १४ वर्ष बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी अपनी सक्रियता का संदेश दिया है। काफी दिनों की निष्क्रियता के बाद रविवार को बसपा सुप्रीमो ने कह दिया कि ब्राह्मण भाजपा को वोट नहीं देंगे और उनकी पार्टी अगले सप्ताह अयोध्या से ब्राह्मणों को ‘जागृत’ करने के लिए एक अभियान शुरू करेगी। मायावती ने दावा किया कि उन्हें पूरा विश्वास है कि अब ब्राह्मण भारतीय जनता पार्टी के झांसे में आकर गुमराह नहीं होगा और अगले चुनावों में उनकी पार्टी को वोट देगा। मायावती ने २००७ विधानसभा चुनावों में ब्राह्मण-पिछड़ा सोशल इंजीनियरिंग की शरुआत की थी। इसका नतीजा ये हुआ कि ब्राह्मणों का वोट उनकी झोली में जा गिरा और यूपी का ताज उनके सिर पर सजा। हालांकि उस समय प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने भी अपने ब्राह्मण चेहरों को सामने लाकर काफी संख्या में पार्टी से इस समुदाय को जोड़ने में सफलता प्राप्त की थी लेकिन सपा से पहले से जुड़ा एक बड़ा ब्राह्मण वोट बैंक उनकी कार्यशैली से नाराज होकर छिटक चुका था। २००७ चुनावों में यूपी के राजनैतिक इतिहास में पहली बार हुआ था कि ब्राह्मण कांग्रेस के अलावा किसी पार्टी के पक्ष में इतनी बड़ी संख्या में लामबंद हुए। यह अलग बात है कि सफलता का यह प्रयोग अब गुजरे जमाने की बात हो चुका है और ब्राह्मणों को लेकर मायावती स्वयं गलतफहमी पाल रही हैं। ध्यान रहे, बसपा संस्थापक कांसीराम के साथ ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ जैसे नारों के बीच मंच साझा कर चुकी मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग के इसी ब्राह्मण फार्मूले की कामयाबी के बाद ‘ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी दिल्ली जाएगा’ का भी नारा सुना।
उत्तर प्रदेश के जातीय समीकरण के हिसाब से देखा जाए तो यूपी की कुल वोटर्स में ब्राह्मणों का वोट १३ फीसदी है और कुछ विधानसभा क्षेत्रों में ब्राह्मणों का वोट २० फीसदी तक है। पूर्वांचल के कई इलाकों में जिसमें बलरामपुर, बस्ती, संत कबीर नगर, महाराजगंज, गोरखपुर, देवरिया, जौनपुर, अमेठी, वाराणसी, चंदौली, कानपुर, प्रयागराज में ब्राह्मणों का वोट १५ज्ञ् से अधिक है। इन सीटों पर किसी भी कैंडिडेट के लिए जरूरी है कि वह अधिक से अधिक संख्या में ब्राह्मण वोट हासिल कर सके।
अब विपक्ष जनता के बीच कहीं न कहीं यह बात स्थापित करने में सफल रहा है कि सूबे में योगी अदित्यनाथ की अगुवाई वाली भाजपा सरकार ब्राह्मण विरोधी है। मुख्यमंत्री योगी अपने मंत्रिमंडल में ब्राह्मणों की उपेक्षा करते आ रहे हैं। मंत्रिमंडल में केवल ८ ब्राह्मण चेहरे हैं और उन्हें कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं दी गई है। प्रमुख चेहरों में उप-मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा और ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा भी जो अपवाद हैं और इन दोनों को छोड़कर किसी ब्राह्मण को मंत्रिमंडल में अहम विभाग नहीं दिया गया है, वहीं बराबर संख्या में मंत्रिमंडल में शामिल हुए ८ क्षत्रिय मंत्रियों को ब्राह्मणों से बेहतर विभागों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके अलावा कानून व्यवस्था सुधारने के नाम पर जो एनकाउंटर हुए, उनमें भी ज्यादातर आरोपी ब्राह्मण जाति के हैं। भाजपा सरकार के कार्यकाल में सबसे ज्यादा एससी-एसटी एक्ट के मुकदमें ब्राह्मणों पर ही दर्ज हुए। आरोप यह भी है कि महत्वपूर्ण पदों पर अधिकारियों की तैनाती में भी ब्राह्मणों की उपेक्षा की गई। हालांकि बाद में इस आरोप से उबरने के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार ने मुख्य सचिव आरके तिवारी, डीजीपी एचसी अवस्थी और एसीएस गृह के पद पर अवनीश अवस्थी को बैठाकर एक संदेश देने का प्रयास जरूर किया है। वर्ष २०२२ के चुनावों के लिए कांग्रेस, ब्राह्मण-दलित-मुस्लिम कॉम्बिनेशन पर भरोसा कर रही है। ब्राह्मणों को लुभाने के लिए प्रतापगढ़ से पुराने पुरोधा प्रमोद तिवारी और मिर्जापुर से ललितेशपति त्रिपाठी को ब्राह्मण चेहरा बनाकर पेश करने की तैयारी में हैं, वहीं सपा यादव-कुर्मी-मुस्लिम-ब्राह्मण कॉम्बिनेशन पर काम कर रही है। सपा उन ओबीसी वोटरों को भी पार्टी से जोड़ने के लिए सक्रियता से काम कर रही है, जो भाजपा से नहीं जुड़ पाए हैं। वहीं ब्राह्मणों को जोड़ने के लिए सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पार्टी के तीन प्रमुख ब्राह्मण चेहरों -अभिषेक मिश्र, मनोज पांडे और माता प्रसाद पांडे को ब्राह्मण वोटर्स को लुभाने के लिए लगाया है।
वहीं बसपा ने अपनी पुरानी रणनीति पर काम करते हुए एक बार फिर ब्राह्मणों को पार्टी से जोड़ने की जिम्मेदारी सतीश चंद्र मिश्रा को दी है। है। अपने ब्राह्मण जोड़ो अभियान के लिए २३ जुलाई को बीएसपी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्र अयोध्या पहुंचकर राम जन्मभूमि का दर्शन करेंगे। २००७ के तर्ज पर बीएसपी ने प्रदेश भर में ब्राह्मणों को जोड़ने के लिए रणनीति तैयार की है। सपा द्वारा सत्ता में वापसी करने पर भगवान परशुराम की १०८ फीट ऊंची प्रतिमा लगवाने की घोषणा के जवाब में बसपा सुप्रीमो मायावती ने भगवान परशुराम की इससे भी ऊंची प्रतिमा लगाने तथा पार्क और अस्पताल के नाम भी भगवान परशुराम के नाम पर रखने का एलान किया है।
भाजपा ने ब्राह्मणों का वोट अपने पक्ष में करने के लिए उप मुख्यमंत्री
डॉ. दिनेश शर्मा को जिम्मेदारी सौंपी हैं। कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे जितिन प्रसाद को पार्टी में साथ ही में लखीमपुर खीरी से सांसद अजय मिश्र टेनी को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर ब्राह्मणों को तवज्जो देने का संदेश दिया है। इसके अलावा पार्टी रीता बहुगुणा जोशी को ब्राह्मण चेहरे के रूप में पेश करेगी ताकि ज्यादा से ज्यादा ब्राह्मण वोटरों को पार्टी से जोड़ा सके। गुजरे दो दशकों में यूपी में ब्राह्मण मतदाताओं के चुनावी समर्थन का रुख समझने के लिए एक अध्ययन रिपोर्ट पर निगाह डालना जरूरी है। सेंटर फॉर द स्टडी डेवलपिंग सोसायटी के सर्वे में यह बात सामने आई कि २००९ और २०१४ लोकसभा चुनावों में ब्राह्मणों ने कांग्रेस के पक्ष में ३१ज्ञ् जबकि २०१४ में सिर्फ ११ज्ञ् ब्राह्मणों ने कांग्रेस को वोट दिया। २००९ में भाजपा को ५३ज्ञ् ब्राह्मणों ने वोट किया। जबकि २०१४ में ७२ज्ञ् वोट प्राप्त हुए जिसके चलते उत्तर प्रदेश जैसे सबसे उर्वर राजनीतिक राज्य में उसे सहयोगी अपना दल के साथ अस्सी में कुल ७३ लोकसभा सीटों पर जीत मिली तथा नरेंद्र मोदी की अगुवाई में देश में पार्टी की प्रचंड बहुमत की सरकार बनी। वास्तव में उत्तर प्रदेश में भाजपा की इतनी बड़ी कामयाबी के पीछे नरेंद्र मोदी का चेहरा और ब्राह्मणों के साथ गैर यादव ओबीसी का एकजुट होकर वोट करना एक बड़ा कारण था। इस बार ब्राह्मण मतदाताओं का रुख पहले की भांति ही नतीजों के संकेत देगा, दो राय नहीं है। भाजपा के साथ पहले की तरह तो यह वोट बैंक कतई नहीं जाएगा, यह भी तय है।
(लेखक उत्तर प्रदेश अधिस्वीकृत पत्रकार संघ के अध्यक्ष हैं। उत्तरप्रदेश की राजनीति के जानकार और स्तंभकार हैं।)