मुख्यपृष्ठस्तंभउत्तरनामा: दलितों के लिए माया-राहुल में रार लाभ उठाने को योगी तैयार

उत्तरनामा: दलितों के लिए माया-राहुल में रार लाभ उठाने को योगी तैयार

हेमंत तिवारी / लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव खत्म हो जाने के बाद राहुल गांधी ने दलितों के बहाने से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती पर हमला बोला है। राहुल ने एक किताब के विमोचन के मौके पर अपने भाषण में कहा कि मायावती ने पूरी गंभीरता से यूपी का चुनाव नहीं लड़ा और दलितों-वंचितों पर भाजपा के अत्याचार के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ी। उन्होंने यहां तक कहा कि कांग्रेस ने मायावती को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाने की पेशकश करते हुए साथ चुनाव लड़ने को भी कहा पर कोई जवाब तक नहीं मिला।
राहुल के इस बयान के बाद हमलावर मायावती ने उन्हें पहले अपना घर संभालने की नसीहत दी। माया ने कहा कि उन्हें कांग्रेस से कोई पेशकश नहीं की गई और राहुल गांधी झूठ बोल रहे हैं।
दरअसल, उत्तर प्रदेश के हालिया चुनावी नतीजों में यह साफ दिखा है कि कभी कांग्रेस का वोटबैंक रहे और फिर मायावती की बसपा के साथ चले गए दलितों के एक बड़े हिस्से ने भाजपा का साथ पकड़ लिया है। दलित वोटबैंक में यह सेंधमारी भाजपा ने २०१४ के लोकसभा चुनाव के दौरान आई मोदी लहर के समय ही शुरू कर दी थी जो चुनाव-दर-चुनाव बढ़ती ही गई है। आज यूपी में भाजपा उस स्थिति में पहुंच गई है कि वो दलितों के बड़े हिस्से के अपने साथ होने का दावा कर सकती है।
दलितों को अपना स्थाई वोटबैंक बनाने और उन्हें पार्टी से जोड़े रखने के लिए कांग्रेस-बसपा से इतर योगी के नेतृत्व में भाजपा के एक रोडमैप के साथ तैयार दिख रही है। दलित महापुरुषों की सबसे ज्यादा जंयतियां अप्रैल के महीने में ही आती हैं। इनमें ज्योतिबा फुले, जगजीवनराम से लेकर डॉ. आंबेडकर की जयंती शामिल है। लेकिन कांग्रेस या बसपा की तुलना में इन जयंतियों को लेकर सबसे ज्यादा कार्यक्रम भाजपा द्वारा किए जा रहे हैं। आंंबेडकर की जयंती के मौके पर भाजपा देशभर के गांव-शहर में अपने नेताओं को भेज रही है। भाजपा और उसके पितृ संगठन ‘संघ’ के लोगों का आए दिन प्रवास दलित बस्तियों में होता है तो उनके साथ समरसता भोज भी। भाजपा संगठन को देखें या हाल ही में गठित यूपी का मंत्रिमंडल भाजपा ने हर जगह दलितों की भागीदारी बढ़ाई है। जाहिर है कि आज की तारीख में दलितों के लिए जो रोडमैप भाजपा के पास दिखता है वैसा खासकर यूपी के किसी अन्य दल के पास दूर-दूर तक नजर नहीं आता है।
बेशक, राहुल गांधी ने उत्पीड़न अत्याचार की कई घटनाओं के माध्यम से जो संदेश दलित समाज को देने की कोशिश की, वह बेशकीमती है। लेकिन उससे बेशकीमती है दलितों को आकर्षित करने के लिए कोई ठोस योजना, जो राहुल अक पेश नहीं कर पाए हैं। हालांकि राहुल गांधी के संदेश का महत्व तब तक बना रहेगा, जब तक कि दलित समाज के लोग इस भावना से ऊपर नहीं उठ जाते कि उन पर जुल्म करने वालों पर जवाबी हमला करने की परिणति दलित समाज में ही पुनर्जन्म तय है। बात को सही संदर्भ में समझने के लिए उस उदाहरण पर गौर करना जरूरी है, जो राहुल गांधी ने सामने रखा है। उन्नाव की घटना में दलित युवक की पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है। राहुल गांधी पीड़ित के पिता से मिलते हैं। उनके कंपकंपाते हाथ थामते हैं। बात-बात में प्रतिक्रिया समझते हैं। पीड़ित के पिता बताते हैं कि जो हुआ वो बुरा हुआ, लेकिन उन्हें अच्छा भी लगा कि दलित समाज के लोगों में प्रतिक्रिया हुई। राहुल तब चौंक जाते हैं जब उन्हें पता चलता है कि मॉब लिंचिंग की इस घटना की प्रतिक्रिया में १२ लोगों ने इंसेक्टिसाइड पीकर आत्महत्या करने की कोशिश की है। वे इस बात से भी चौंक जाते हैं कि ऐसी प्रतिक्रिया से पीड़ित के पिता को खुशी हो रही है! दलित युवकों ने कहा कि बदला लेने की बात तो वे सोच भी नहीं सकते क्योंकि अगर वे ऐसा करते हैं तो उनका पुनर्जन्म फिर दलित समाज में ही होगा!
राहुल गांधी ने यह भाषण दलित दर्शकों के बीच दिया। कांग्रेस नेता के राजू द्वारा संपादित ‘द दलित ट्रूथ’ नामक पुस्तक के विमोचन के अवसर पर उन्होंने यह भाषण दिया। समृद्ध भारत फाउंडेशन की ओर से राजीव गांधी फाउंडेशन द्वारा यह समारोह आयोजित था। इस अवसर पर देशभर में दलितों की चिंता करने वाले नेतृत्वकारी साथियों को इकट्ठा किया गया था। राहुल गांधी का भाषण इस मायने में तो सफल है कि उन्होंने दलित नेतृत्व के सामने मजबूत तरीके से दलित समाज की चिंता को सामने रखा। मगर आलोचनात्मक नजरिए से देखें तो राहुल गांधी ने दलित समाज के लिए कोई रोडमैप सामने नहीं रखा।
क्या दलितों के लिए आवाज उठाने की जरूरत को जाति की राजनीति कहा जा सकता है? या फिर उन्हें सवर्ण समाज के वोटबैंक की चिंता है? दलित समाज के लोग जुल्मोसितम की हर घड़ी में कांग्रेस की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखते रहे हैं। आज भी देख रहे हैं, लेकिन कांग्रेस मौन है। राहुल गांधी खामोश हैं।
दलितों को राजनीति की मुख्य धारा में लाने के लिए राहुल गांधी को बड़े प्रयोगों की घोषणा करनी चाहिए। गैर आरक्षित सीटों से भी उन्हें उम्मीदवार बनाने का एलान कर सकते हैं। दलित महिलाओं को संगठन और चुनावी राजनीति में जगह देने की घोषणा कर सकते हैं। मॉब लिंचिंग की घटनाओं को कतई नहीं होने देने और ऐसा होने पर र्इंट से र्इंट बजा देने का एलान कर सकते हैं। ऐसा वे संवैधानिक तरीके से कर सकते हैं। इसके बावजूद दलितों के नेतृत्वकारी समूह के बीच राहुल ऐसा कोई एलान नहीं कर सके तो इसे यही कहा जाएगा कि एक बड़ा अवसर राहुल गांधी ने खो दिया है।
दलित विमर्श और दलित दर्शकों के बीच आखिरकार मायावती की आलोचना के क्या मायने हैं? बुरी से बुरी हालत में भी मायावती के पास यूपी में दलितों के १२ फीसदी वोट हैं। दूसरे प्रदेशों में भी दलितों में उनका प्रभाव है। क्या मायावती को इसलिए धिक्कारा जाना चाहिए कि उन्होंने मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाने की एवज में कांग्रेस से गठबंधन करने को मना कर दिया?
भाजपा का बगलगीर बन कर रह जाने के लिए मायावती के ईडी, सीबीआई के डर का हवाला दिया जाता है पर खुद कांग्रेस में सक्रिय जी-२३ के नेताओं को किसका भय है? क्या राहुल गांधी के साथी ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद और आरपीएन सिंह को भी यही भय था।
सच यह है कि कांग्रेस से गठबंधन कर अखिलेश यादव अपनी सत्ता खो देते हैं। अच्छा होगा कि राहुल गांधी मायावती में कमी देखने की बजाय कांग्रेस को मजबूत करने पर ध्यान दें। अगर कांग्रेस मजबूत होगी तो क्षेत्रीय पार्टी के पास गठबंधन का निमंत्रण और उस पर प्रतिक्रिया नहीं मिलने जैसी जिल्लत से पार्टी बच जाएगी।
राहुल गांधी के भाषण में दलितों के लिए वाजिब चिंता दिखी। उन्होंने सही सवाल उठाए। इसके बावजूद देश के दलित समाज को नेतृत्व देने का अवसर राहुल गांधी ने खोया है। जो रोडमैप लेकर राहुल सामने आ सकते थे, उससे बचने की कोशिश कर उन्होंने अवसर गंवाया है।
वहीं दलितों की स्वाभाविक नेता कही जाने वाली मायावती को लेकर जिस कदर निराशा का भाव उनके अपने समाज में व्याप्त है उसका भान उन्हें नहीं है। चुनाव हों या अन्य कोई मौका दलित दोराहा पर साफ खड़ा नजर आता है। वो भी उस दोराहे पर जहां से एक साफ चमकदार सड़क उसे भाजपा की ओर जाती दिखती है पर कांग्रेस या बसपा की तरफ जाने वाली पगडंडी तक साफ नजर नहीं आ रही है। इस ओर राहुल गांधी को ध्यान देकर खासतौर पर कुछ करना चाहिए।
(लेखक उत्तर प्रदेश अधिस्वीकृत पत्रकार संघ के अध्यक्ष हैं। उत्तरप्रदेश की राजनीति के जानकार और स्तंभकार हैं।)

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