मुख्यपृष्ठनए समाचारवसुंधरा राजे की ‘कद किंटग’! ...आखिरी मोहरा भी चित

वसुंधरा राजे की ‘कद किंटग’! …आखिरी मोहरा भी चित

• राजस्थान की दोनों चुनाव समितियों से हुईं बाहर

राजस्थान में विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने कमर कस ली है। दूसरी तरफ भाजपा खेमे में अनिश्चितता का माहौल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समय पूरे देश में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा हैं। तीन महीने पहले उन्होंने अजमेर में एक बड़ी रैली को संबोधित करके चुनावी तैयारियों का श्रीगणेश किया था। राजस्थान में वसुंधरा राजे भाजपा का चेहरा हैं और पूर्व में वे मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। मगर दिक्कत यह है कि पीएम मोदी और वसुंधरा के बीच जमती नहीं है। पिछली बार वसुंधरा इसका खामियाजा उठा चुकी हैं, जब मोदी ने राजस्थान में अपेक्षा से कम सभाएं की थीं।
हालांकि, मोदी ने जब अजमेर में जनसभा की थी तो मंच पर वसुंधरा मौजूद थीं। इससे कयास लगाए जा रहे थे कि दोनों के बीच सब ठीक हो गया है और वसुंधरा ही वहां सीएम फेस होंगी। मगर कल अचानक हलचल मची और पार्टी ने विधानसभा चुनाव से पहले जो दो प्रमुख समितियां घोषित की, उनमें से वसुंधरा का नाम गायब हो गया। ये हैं संकल्प (घोषणापत्र) समिति और चुनाव प्रबंधन समिति। अब कहा जा रहा है कि वसुंधरा की कटिंग करने से आखिरी मोहरा भी चित हो गया। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि राजस्थान भाजपा में भयंकर उथल-पुथल मची हुई है।

हाशिए पर कई नेता
जब से भाजपा में मोदी युग का उदय हुआ है, तब से पार्टी के कई वरिष्ठ व कद्दावर नेता किनारे लगा दिए गए। खुद को शीर्ष नेतृत्व के समानांतर समझना या उसकी शान में गुस्ताखी इन नेताओं पर भारी पड़ी। वसुंधरा महारानी हैं और किसी के भी सामने झुकती नहीं, यही उनकी गुस्ताखी है। पिछली बार ऐसी ही गुस्ताखी शिवराज सिंह चौहान ने की थी, यह कहकर कि मैं भी तीन टर्म मुख्यमंत्री रह चुका हूं और पीएम बन सकता हूं। इसके बाद एमपी विधानसभा चुनाव में मोदी ने काफी कम सभाएं की और करीबी अंतर से शिवराज की कुर्सी चली गई। इतना ही नहीं, शिवराज के पर्याय के रूप में ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस से तोड़कर भाजपा में ले आया गया। वह तो बाद में शिवराज जब समर्पण की मुद्रा में आए तब तोड़-फोड़ के जरिए उनकी कुर्सी वापस मिली थी। महाराष्ट्र भाजपा के भी दो कद्दावर नेता जब मोदी को चुनौती लगे तो उन्हें भी किनारे धकेलने का प्रयास किया गया।

महारानी की विरासत
१९८० में जब जनता पार्टी से अलग होकर भाजपा बनी थी, तब पार्टी के तीन प्रमुख संस्थापक चेहरे अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और राजमाता विजयाराजे सिंधिया थे। राजमाता के पुत्र माधवराव सिंधिया तो कांग्रेस में चले गए पर पुत्री विजयाराजे ने मां की विरासत संभाली। अब उन्हें लगता है कि उनका परिवार भाजपा के संस्थापकों में से एक है तो वह ठसक उनके हाव-भाव में दिखती है। विजयाराजे आज भी महारानी वाले अंदाज में ही जीती हैं। वे सामान्य कार्यकर्ताओं को आसानी से उपलब्ध नहीं होतीं। उन्हें लगता है कि वे तो जन्म से ही महारानी हैं, ऐसे में लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनके लिए मुसीबत खड़ी हो जाती है। यही वजह है कि मोदी-शाह के युग में वसुंधरा राजे की ‘कद कटिंग’ कर दी गई है। इससे अब सवाल पैदा हो रहा है कि क्या भाजपा को वसुंधरा का कोई विकल्प मिल गया है? दरअसल, भाजपा ने पूरी कोशिश की थी कि सचिन पायलट को कांग्रेस से तोड़कर भाजपा में लाया जाए। अगर ऐसा हो जाता तो वसुंधरा की कटिंग काफी पहले ही हो चुकी होती। वैसे गत महीने भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में वसुंधरा को जगह दी गई थी। तब ऐसा कहा गया था कि हो सकता है कि उन्हें राजस्थान की राजनीति से निकालकर पार्टी राष्ट्रीय स्तर कोई जिम्मेदारी देगी और राजस्थान में कोई नया चेहरा आएगा। अब राजस्थान में नया चेहरा कौन होगा, इस पर तो सस्पेंस बना हुआ है, पर राज्य स्तर की समितियों से कटिंग इस बात का संकेत है कि संभवत: भाजपा ने प्रदेश में उनकी पैकिंग शुरू कर दी है।

उम्र के आधार पर कई रिटायर
भाजपा में मोदी-शाह युग के आने के बाद कई वरिष्ठ नेता हाशिए पर धकेल दिए गए। इनमें सबसे पहले लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को ज्यादा उम्र का हवाला देकर रिटायर कर दिया गया। इसके बाद कलराज मिश्र, शांता कुमार व सुमित्रा महाजन जैसे नेताओं की छुट्टी कर दी गई।

अन्य समाचार