मुख्यपृष्ठधर्म विशेषवट पूर्णिमा व्रत : जीवन में रहेगी खुशहाली,सुहाग की लंबी आयु

वट पूर्णिमा व्रत : जीवन में रहेगी खुशहाली,सुहाग की लंबी आयु

हिंदू धर्म में ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष के दिन मनाए जाने वाले वट सावित्री पूर्णिमा व्रत का काफी धार्मिक महत्व है। आज १४ जून को यह व्रत मनाया जाएगा। विवाहित महिलाएं पति की लंबी उम्र, बच्चों की तरक्की, उम्र और घर की खुशहाली के लिए ये व्रत रखती हैं। महिलाएं वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा करने के बाद वट सावित्री व्रत की कथा का पाठ करतीं हैं या पंडित जी से इस कथा के विषय में सुनती हैं। इस कथा को कहने और सुनने मात्र से ही पुण्य फल की प्राप्ति होती है और मनचाहा फल मिलता है।
राजा अश्वपति नि:संतान थे। संतान की प्राप्ति के लिए उन्होंने पत्नी के साथ पूरे विधि-विधान सहित देवी सावित्री की पूजा-अर्चना और उपवास किया। देवी सावित्री की कृपा से उचित समय पर रानी ने एक बहुत सुंदर कन्या को जन्म दिया। राजा अश्वपति ने मां सावित्री की कृपा से पैदा हुई बच्ची को ‘सावित्री’ नाम दिया। सावित्री जब विवाह योग्य हुई तो राजा अश्वपति ने उसे अपने लिए वर खोज लाने का आदेश दिया। पिता का आदेश मानकर सावित्री ने वर की तलाश की और सत्यवान को अपने भावी जीवनसाथी के रूप में चुना। सावित्री ने जब घर वापस आकर अपने चुनाव की बात पिता को बताई। ठीक उसी समय देवर्षि नारद वहां प्रकट हुए और उन्होंने जानकारी दी कि महाराज द्युमत्सेन का पुत्र सत्यवान की आयु काफी कम है। शादी के १२ साल के बाद ही उसकी मौत हो जाएगी। इस पर पिता अश्वपति ने सावित्री को काफी समझाया बुझाया लेकिन वो अपने फैसले  पर अडिग रही। सही समय पर सावित्री और सत्यवान का विवाह संपन्न हुआ। विवाह के बाद सावित्री पिता का महल छोड़कर अपने सास, ससुर और पति सत्यवान के साथ जंगल में जाकर रहने लगीं। दरअसल, सत्यवान का राजपाट किसी राजा ने युद्ध में उससे जीत लिया था। सावित्री ने विवाह के बाद सत्यवान की लंबी आयु के लिए उपवास रखना शुरू कर दिया। जब सत्यवान की मृत्यु का समय आ गया और यमराज उसे स्वर्गलोक ले जाने लगे तो देवी सावित्री भी उसके पीछे-पीछे हाथ जोड़कर चलने लगीं। इस पर यमराज ने उन्हें वापस लौट जाने को कहा लेकिन देवी ने उनकी बात नहीं मानी। यमराज ने जब पलट कर देखा तो देवी सावित्री उनके पीछे-पीछे चली आ रही हैं। इस पर उन्होंने सावित्री से पूछा बताओ क्या चाहती हो। इस पर सावित्री ने कहा कि मुझे सौभाग्यवती होने और १०० पुत्रों का वरदान दीजिए। मेरे पुत्र राजसिंहासन पर बैठे अपने बाबा की गोद में खेलें और मेरे ससुर उन्हें देखकर प्रसन्न हों। यमराज ने कहा तथास्तु।
अपने इस एक वरदान में सावित्री ने न केवल अपने ससुर का राजपाट, बल्कि नेत्र-ज्योति समेत सदा सौभाग्यशाली होने का आशीर्वाद भी पा लिया। इस आशीर्वाद की वजह से ही यमराज को मजबूरन सत्यवान के प्राण वापस लौटाने पड़े। तभी से सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, परिवार की सुख-समृद्धि और संतान की कामना के साथ पूरे विधि-विधान से ये व्रत रखती हैं और वट सावित्री व्रत की कथा सुनती हैं।
पूजा का सामान
वट सावित्री का व्रत रखने वाली महिलाओं को दो टोकरियों में पूजा का सामान सजाकर रखना चाहिए। इसमें सावित्री और सत्यवान की मूर्ति, कलावा, बरगद का फल, धूप, दीपक, फल, फूल , मिठाई, रोली, सवा मीटर का कपड़ा, बांस का पंखा, कच्चा सूत, इत्र, पान, सुपारी, नारियल, सिंदूर, अक्षत, सुहाग का सामान, भीगा चना, कलश, मूंगफली के दाने, मखाने का लावा जैसी चीजें शामिल होती हैं।
तिथि और शुभ मुहूर्त
वट पूर्णिमा व्रत तिथि १४ जून दिन मंगलवार

व्रत पूजा का शुभ समय ११.५४ बजे से दोपहर १२.४९ बजे तक।

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