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तबादला

अब तो बख्श दीजिए!
हुजूर, माईबाप मुझे अब तो बख्श दीजिए! अब मेरे पास कुछ नहीं बचा। मैं कानूनी रूप से दिवालिया हो गया हूं। सरकार, आप मेरा दर्द समझिए। मैंने बैंकों से सिर्फ ६,२०० करोड़ कर्ज लिए थे लेकिन मेरी १४,००० करोड़ की प्रॉपर्टी कुर्क की जा चुकी है। इस पर मैं हंसू कि आंसू बहाऊं, समझ में नहीं आता कि अब मेरा नाम उस इंडिविजुअल इन्सॉल्वेंसी रजिस्टर में दर्ज होने वाला है, जिसमें लक्ष्मी मित्तल के भाई प्रमोद मित्तल का नाम भी शामिल है। मेरा सभी बैंक अकाउंट, सारी प्रॉपर्टी, क्रेडिट कार्ड आदि प्रâीज कर दिया जाएगा। मैं अब किसी कंपनी का डायरेक्टर नहीं बन सकता और न ही किसी नई कंपनी का गठन कर सकता हूं। काहे की लक्जरी लाइफ? वो शानो शौकत व जिंदगी के सुख! मैं अब पाई पाई का मोहताज होने जा रहा हूँ। ५०० पाउंड (५० हजार रुपए ) से ज्यादा लोन के लिए मुझे यह बताना होगा कि मैं दिवालिया घोषित किया जा चुका हूं।
तबादला
तबादला ही सरकार का विजन है, एजेंडा है, योजना है, व्यवस्था है, इंतजाम है, इनाम है, दंड है। तबादला ही सरकार का सच है, कार्यक्रम है, खुशी है, भरोसा है, कार्यान्वयन है और प्रोत्साहन है। तबादला नामक औजार से सरकार बारह बाट भी करती है और बालू की भीत भी उठाती है। जो जैसा समझे वैसा आनंद तबादले में खोज सकता है। मध्य प्रदेश राज्य शिक्षा केंद्र में अपर संचालक और आईएएस अफसर लोकेश कुमार जांगिड़ सरकार और आईइएस लॉबी पर सवाल उठाते रहते हैं इसलिए वे अक्सर तबादले की दशा को प्राप्त होते हैं। २०१४ बैच के युवा आईइएस अफसर जांगिड़ की फील्ड पोस्टिंग के अभी साढ़े ४ साल हुए हैं। लेकिन इतने कम समय में उनका ८ बार तबादला हो चुका है। यानी हर ६ महीनें में उन्होंने तबादला सुख लिया है। उनकी छवि हरियाणा कैडर के आईइएस अफसर अशोक खेमका जैसी बनती जा रही है। खेमका के ३० साल की नौकरी में ५३ तबादले हुए थे। यानी लगभग हर ७ महीने में तबादले हुआ था।
लिहाजा मेरी राय में बदला से कम खतरनाक नहीं होता तबादला। वैसे देखा जाए तो यह वस्तुतः बड़े अफसर की बुद्धि, इच्छा और सनक पर निर्भर होता है। अफसर से यह भी याद आया कि यह जीव कई कामों के लिए जाना जाता है। उसमें अधीनस्थों को डांटना फटकारना, फाइलों पर सांप की तरह कुंडली मार कर बैठ जाना, फाइल रूपी दुल्हन का खरीदार खोजना, सोमरस, निंदा स्तुति, नींद, आराम, षडयंत्र, लल्लो-चप्पो के साथ किसी का का तबादला करवाना या खुद तबादले की दशा को प्राप्त होना शामिल है।
नौ की लकड़ी…..
जब तक लोगों में लालच है तब तक भ्रष्टाचार कभी खत्म नहीं होगा। कमीशनखोरी की प्रवृत्ति बढ़ने के साथ सरकारी खरीद व टेंडर में सेवाओं व उत्पादों की कीमतें इतनी बढ़ती हैं कि नौ की लकड़ी ९० खर्च का मुहावरा चरितार्थ हो जाता है। दिल्ली की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी की सत्ता वाले नगर निगम पर कूड़े का ढेर कम करने के लिए इस्तेमाल होनेवाली मशीन किराए पर लेकर बेवजह करोड़ों रुपए खर्च करने का आरोप लगाया है। ट्रॉमल नामक मशीन से कूड़े की ऊंचाई को कम किया जा रहा है। ये मशीन किराए पर ली गई है। मजे की बात ये है कि मशीन का बाजार में दाम करीब १८ लाख है। लेकिन इसके लिए ६ लाख ३० हजार प्रतिमाह किराया दिया जाता है। तीन महीने के किराए में एक ट्रॉमल मशीन की पूरी की पूरी कीमत वसूल हो जाती है। नगर निगम ने २३ ट्रॉमल मशीनें किराए पर ली हैं जो पिछले डेढ़ साल से कार्यरत हैं। अगर हम १७ लाख ७० हजार के हिसाब से इन २३ ट्रॉमल मशीनों की कुल कीमत लगाएं तो यह ४ करोड़ है, जिनके लिए निगम ने अभी तक २६ करोड़ का भुगतान किराए के तौर पर कर दिया है। धन्य हो दिल्ली नगर निगम।
कानून की लाठी
कहते हैं कि कानून की लाठी बेआवाज होती है लेकिन जो इसका शिकार होता है वो बहुत चिल्लाता भी है। समाज में बदलाव के साथ नियम व कानूनों में बदलाव होना चाहिए पर ऐसा होता नहीं। लेकिन जब जागो तभी सवेरा की तर्ज पर यूपी सरकार सदियों पुराने १३ विभागों के ४८ कानूनों को ३१ जुलाई तक खत्म करने जा रही है। तो ये एक अच्छा कदम है। देर आयद दुरुस्त आयद। सबसे अधिक आबकारी विभाग के १८ नियम और अधिनियम हैं। इसमें उप्र र्इंट नियंत्रण आदेश, उप्र सीमेंट नियंत्रण आदेश व उप्र कोयला नियंत्रण आदेश के साथ बिजली विभाग के १८, वन विभाग के सात, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति के  चार, आबकारी पंचायती राज के तीन-तीन समेत अन्य विभागों के नियम, अधिनियम व कानून हैं जो ३१ जुलाई से इतिहास में दर्ज होने वाले हैं।
लेखक तीन दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और ११ पुस्तकों का लेखन-संपादन कर चुके वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं।