मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाविक्रांत व्यू : क्रूर आयोजक!

विक्रांत व्यू : क्रूर आयोजक!

राजेश विक्रांत।  फरीदाबाद में हुई एक प्रतियोगिता के आयोजकों को मैं मधु वैâटभ, हिरण्यकश्यप, कंस, चंगेज खान, हलाकू, तैमूर, नादिरशाह व जनरल डायर के वंशजों का ही मानता हूं। आयोजक अमूमन कोमल होते हैं लेकिन ये क्रूर आयोजक की श्रेणी में आते हैं। फरीदाबाद में महिला तथा बाल विकास विभाग की तरफ से एक खेल-कूद प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। यह १८ से ३० साल की आयु वर्ग की महिलाओं के लिए थी। विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताएं तो थीं ही, गर्मी व बदइंतजामी का भी बोलबाला था। आयोजक खिलाड़ियों को मशीन समझ रहे थे। इस प्रतियोगिता में किसी भी प्रतिभागी की शिकायत पर ध्यान न देने की एक नई परंपरा आयोजकों ने शुरू की थी। ४१ डिग्री सेल्सियस की भयंकर गर्मी कई प्रतियोगियों को सहन नहीं हो पाई। कई महिलाएं बेहोश हो गर्इं। फिर भी आयोजक अपनी गलती मानने को तैयार नहीं हैं। इसे ही एक तो चोरी और ऊपर से सीनाजोरी कहते हैं।

नाम बदलो अभियान
ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जिलों, स्टेशनों व इलाकों का नाम बदलने को ही सबसे बड़ा विकास मानते हैं। मुख्यमंत्री बनने से पहले ही उन्होंने गोरखपुर का सांसद रहने के दौरान कई इलाकों का नाम बदलवा दिया था। इस कड़ी में उर्दू बाजार को हिंदी बाजार, हुमायूंपुर को हनुमान नगर, मीना बाजार को माया बाजार और अलीनगर को आर्य नगर कर दिया गया था। पिछले कार्यकाल में मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम पं. दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर किया गया तो इलाहाबाद को प्रयागराज और पैâजाबाद का नाम बदलकर अयोध्या कर दिया गया। अब दूसरे कार्यकाल में वे फिर नाम बदलो अभियान में जुटे हुए हैं। विक्रमादित्य के बेताल की भांति नाम बदलने का कार्य प्रारंभ हो रहा है। अलीगढ़ का नाम बदलकर हरिगढ़ या आर्यगढ़, फर्रुखाबाद को पांचाल नगर, सुल्तानपुर को कुशभवनपुर, बदायूं को वेद मऊ, फिरोजाबाद को चंद्र नगर और शाहजहांपुर को शाजीपुर किया जाएगा। इसके बाद भी नाम बदलो अभियान चलता रहेगा। आगरा को अग्रवन, मैनपुरी को मयानपुरी, गाजीपुर को गढ़ी पुरी, देवबंद को देववृन्द पुर तथा संभल को कल्कि नगर या पृथ्वीराज नगर किया जा सकता है।

आत्मनिर्भरता का परम सिद्धांत
सोशल मीडिया ने हमें वैâसे लोग दिए हैं इसकी एक ज्वलंत मिसाल हैं ये। ये बेहद प्रतिभाशाली व्यक्ति हैं। इनके पास मंच का सुरक्षा कवच है। किसान और गाय इनके लिए कमाई के साधन हैं, जिसमें ये घोर बिजी रहते हैं। इन्हें आस्था या नेतृत्व बदलने की आदत है। मार्च में बुलबुल, जुलाई में परवाना हूं। जैसा मौसम हो मुताबिक उसके, दीवाना हूं। समाज की सबसे महत्वपूर्ण इकाई व्यक्ति है इसलिए अपने व्यक्तिगत हित को साधने के बाद ही ये समाजसेवा करते हैं। छात्र हों, सहयोगी हों या कार्यकर्ता, इन सभी का शोषण इनके लिए सराहनीय व शुभ कर्म है। ये आत्मनिर्भरता का परम सिद्धांत पालन करते हैं। कोई इन्हें पूछता नहीं तो ये खुद ही वीडियो बनाकर अनर्गल प्रलाप करते हैं। इससे इनकी नीरसता मिट जाती है। इनके बयान सुनकर मन होता है कि चाकू से इन्हें पंचतत्व की प्राप्ति करा दें। बतकही, चुगली, गल्प, निरर्थक, फालतू बातचीत के ये सम्राट हैं। ऐसे लोग समाज में हर जगह पाए जाते हैं।

परिस्थितियों से सीखना
इसे कहते हैं परिस्थितियों से सीखना। एक गायक पहले सोशल मीडिया पर खुद ठगी का शिकार हुआ। फिर उसने अपनी मौलिक सोच का जनरेटर चलाया। गूगल रूपी जानकारी की टार्च से ठगी की तरकीब पर प्रकाश डाला और झांसे का भीमकाय लबादा ओढ़कर ठगी नात्मक शुभ कर्म करने लगा। उसने भी गैंग से संपर्क करने के बाद लोगों को पैसा डबल करने का झांसा देकर सोशल मीडिया पर ठगने लगा। चूहे को हल्दी की एक गांठ मिलती है तो वह पंसारी बन बैठता है। ठीक ऐसा ही इस गायक सह शातिर ठग के साथ हुआ। वह बड़े पैमाने पर झांसा व्यापार करने लगा, सुपरिणाम वह पुलिस के शिकंजे में है। उसके कब्जे से १५ लाख रुपए के ई-गिफ्ट कार्ड/ई-वाउचर और दो मोबाइल फोन बरामद किए गए हैं। पुलिस आरोपी से पूछताछ कर सोशल मीडिया पर पैâले ठगी के जाल को तोड़ने की कोशिश कर रही है।

(लेखक तीन दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और ११ पुस्तकों का लेखन-संपादन कर चुके वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं।)

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