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विक्रांत व्यू : फिसल गए

राजेश विक्रांत। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उर्फ मामा फिसलने और संभलने में बड़े उस्ताद हैं। राजनीति और चाल-चलन दोनों में उनका फिसलना और संभलना चलता रहता है। बकौल मामा, तकदीर ने जैसे चाहा वैसे ढल गए हम.. बहुत संभल के चले फिर भी फिसल गए हम…। किसी ने विश्वास तोड़ा तो कभी किसी ने दिल और लोगों को लगता है कि बदल गए हम..। उत्तराखंड में उनके फिसलने को इसी रूप में देखा जा रहा है। उधम सिंह नगर के काशीपुर में एक शादी के रिसेप्शन में शामिल होने पहुंचे मामा जब प्रीतिभोज कार्यक्रम के लिए निकले तो अचानक उनका पैर सीढ़ियों पर फिसल गया और वे गिर पड़े। उनके अचानक फिसलते ही कार्यकर्ताओं और सुरक्षाकर्मियों में हड़कंप मच गया। फौरन सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें संभाला और आगे के लिए रवाना हुए। मामा इस फिसलने से तनिक भी शर्मिंदा नहीं हैं। राजनीति में यह तो चलता रहता है। तमाम राजनेताओं के पैर फिसलते रहते हैं। थोड़ी तकलीफ होती है लेकिन वे संभल जाते हैं। मामा के सुपर बॉस भी कुछ समय पहले कानपुर में गंगा बैराज की सीढ़ियां चढ़ते वक्त फिसल गए थे। उनका भी कुछ नहीं बिगड़ा तो मामा का भी कुछ नहीं बिगड़ेगा। वैसे जैसे ही मामा फिसले वैसे उनके विरोधियों ने सपने देखने शुरू कर दिए थे, लेकिन मामा के संभलते ही विरोधियों के सपने भी टूट गए।
पानी में आग!
`आप’ नहीं `आग’ कहिए जनाब। यह पार्टी पानी में आग लगाना बखूबी जानती है। लेकिन इस आग में उसके ही मुख्यमंत्री भगवंत मान का कहीं हाथ न जल जाए। अपनी पार्टी की परंपरा के अनुसार एक राज्यसभा सदस्य ने यही काम किया है। अब चाहे जिसका हाथ जले। उनके मुताबिक अगर उनकी पार्टी हरियाणा में सत्ता में आई तो सतलुज-यमुना लिंक यानी एसवाईएल नहर का पानी राज्य के खेतों तक पहुंचेगा। लो जी लग गई पानी में आग। पंजाब में इसकी तीखी प्रतिक्रिया शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री भगवंत मान तो चुप हैं लेकिन विरोधियों ने मोर्चा खोल दिया है। बता दें कि पानी को लेकर पंजाब और हरियाणा में १९६६ से ही विवाद चल रहा है। पंजाब हरियाणा को कोई भी पानी नहीं देना चाहता। सतलुज-यमुना लिंक नहर के अपने हिस्से को हरियाणा ने १९८० में ही बना डाला है लेकिन पंजाब अपने हिस्से को बनाना ही नहीं चाहता। इसके पीछे की वजह खुन्नस है। वह नहर बनाएगा तो हरियाणा को पानी देना पड़ेगा। पंजाब में सत्ता पाने से खुशी के माउंट एवरेस्ट पर आसीन आप को भरोसा है कि उनकी हरियाणा में अगली सरकार बनेगी और २०२५ में, हरियाणा में हर खेत में पानी पहुंचेगा, वह भी सतलुज-यमुना लिंक नहर से। तो पंजाब की राजनीति में आग लगना स्वाभाविक ही है। अब पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान करें तो क्या करें। उनकी बोलती उनकी ही पार्टी ने बंद कर दी है।
पिरामिड के नाम पर!
एक कंपनी ने पिरामिड का नाम बदनाम कर दिया है। वैसे तो दुनिया के आठ आश्चर्यों में मिश्र के पिरामिड शामिल हैं। ये ४,००० साल से बने हुए हैं। इनमें प्रकाश, जलवायु तथा ऊर्जा का प्रवाह संतुलित रूप में बना रहता है। लेकिन हिंदुस्थान की एक कंपनी मल्टी-लेवल मार्वेâटिंग-एमएलएम नेटवर्क की आड़ में पिरामिड प्रâॉड चला रही थी। इस योजना या प्रâॉड को पिरामिड का नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि इसकी कार्यशैली पिरामिड के आकार की होती है, जहां शीर्ष पर एक बिंदु से शुरू होकर ये नीचे तक फैलता जाता है। ऐसी योजनाओं के तहत निचले स्तर से पैसे इकट्ठा किए जाते हैं और ये शीर्ष पर जमा होता जाता है। इस तरह की योजना किसी संगठन के निचले स्तर (शीर्ष पर पिरामिड में) से शीर्ष पर कमाई करती है। यह कंपनी लोगों को महंगे व बेकार उत्पाद के साथ अमीर बनने के सपने भी बेचती है। इसके व्यापार मॉडल में सीधे सामान बेचने की बजाय लोगों को इस वादे पर शामिल किया जाता है कि अगर वो अपनी तरह और सदस्य बनाएंगे तो उन्हें कमीशन दिया जाएगा। ऐसे में कंपनी से जुड़ने वाले नए सदस्यों का उद्देश्य उत्पादों का उपयोग करना नहीं बल्कि सदस्य बनकर धनवान बनने पर होता है। इस तरह एक ग्राहक अपने साथ अन्य ग्राहक को जोड़कर पिरामिड बनाते जाते हैं। असली पिरामिड के तो कई जादुई प्रभाव होते हैं। लेकिन इस कंपनी के पिरामिड के प्रभाव से असंख्य लोग कंगाल हो गए हैं। ज्यादा लोगों को जोड़ने के चक्कर में वे न घर के रहे न घाट के। कंपनी पर भी अब ईडी का शिकंजा कस गया है।
शाम-ए-अवध की बात
कहते हैं कि बनारस की सुबह और अवध यानी लखनऊ की शाम निराली है। लखनऊ की इमारतें, स्वाद, लिबास, कलाएं और संस्कृति हर एक चीज का जवाब नहीं। लाजवाब है। आज भी लखनऊ के जैसे स्वाद का खजाना कहीं और नहीं है। यहां की बोली-भाषा, लिबास, लोक कलाएं और संस्कृति हर एक चीज इतिहास की एक अनुपम विरासत है। इस शहर का कहना है कि- मेरे दामन में तो इतनी विरासतें हैं कि महज नाम भर ले लूं तो कई किताबें लिख जाएं। स्वाद का खजाना लखनऊ जैसा कहीं और नहीं मिलता है। जुबान, लिबास, लोक कलाएं और संस्कृति हर एक चीज विरासत है। राजपूत, मुगलिया और यूरोपीय गौथिक शैली में निर्मित इमारतें विख्यात हैं। इमामबाड़ा के मुख्य हॉल की छत खंभे, लोहा और लकड़ी के बिना ही टिकी है। इमारतों में र्इंटों की कुछ ऐसी जोड़ाई देखने को मिलेगी, जो दुनिया में बेजोड़ है। वास्तुकला में जो प्रमुख है, उसमें सबसे खूबसूरत छत है। जैसे इमामबाड़ा की छत पर कई सारे गुंबद और मेहराबें हैं। छत की किनारों पर खास तरह का काम है। इसके गुंबद लहसुन के आकार के हैं। गुंबद के बीचों- बीच पीतल का छतर लगाते थे। बेगम आलिया ने अलीगंज वाला हनुमान मंदिर बनवाया। उस पर भी छतर और चांद-तारा दोनों चीजें हैं। यही गंगा-जमुनी संस्कृति तो लखनऊ को खास बनाती है।

(लेखक तीन दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और ११ पुस्तकों का लेखन-संपादन कर चुके वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं।)

 

 

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