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महिला हिंसा : परिवर्तनकारी कार्रवाई की जरूरत!

योगेश कुमार गोयल
नई दिल्ली
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक २०२० के मुकाबले २०२१ में देश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में १५.३ फीसदी की वृद्धि हुई है। २०२० में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के ३,७१,५०३ मामले दर्ज हुए थे जबकि २०२१ में ये मामले बढ़कर ४,२८,२७८ दर्ज हुए। एनसीआरबी की इस रिपोर्ट के मुताबिक प्रति एक लाख की आबादी पर महिलाओं के खिलाफ अपराध २०२० में ५६.५ फीसदी से बढ़कर २०२१ में ६४.५ फीसदी हो गए हैं, जिनमें से अधिकांश मामले (करीब ३१.८ फीसदी) पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के हैं। २०.८ फीसदी मामले महिलाओं की गरिमा भंग करने के इरादे से उन पर हमला करने, १७.६ फीसदी उनके अपहरण और ७.४ फीसदी बलात्कार के हैं। महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में तो महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले सभी १९ महानगरों की श्रेणी में कुल अपराधों का ३२.२० फीसदी हैं। देशभर में महिलाओं के अपहरण के मामलों में भी २०२० के मुकाबले १७.६ फीसदी और बलात्कार की घटनाओं में ७.४ फीसदी वृद्धि हुई है। एक अन्य अध्ययन में बताया गया है कि भारत में प्रत्येक तीन में से एक महिला के साथ किसी न किसी तरह की घरेलू हिंसा की जाती है और करीब २१ फीसदी महिलाओं के साथ तो बहुत ही गंभीर समस्याएं होती हैं।
महिलाओं पर होने वाली हिंसा को रोकने के लिए प्रतिवर्ष २५ नवंबर को ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस’ मनाया जाता है। महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा को समाप्त करने को लेकर यूएन महासचिव गुतारेस ने दुनियाभर की सरकारों से २०२६ तक महिला अधिकार संगठनों और महिलाओं के हित में आंदोलनों के लिए वित्त पोषण ५० फीसदी बढ़ाने का भी आह्वान किया है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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