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रोखठोक : कानून का राज चाहिए या धर्मराज्य?

कड़कनाथ मुंबैकर
आज कानून का राज निश्चित तौर पर कहां है? धर्म का ही राज चाहिए ऐसी भांग का नशा आज बहुतांश लोगों पर चढ़ा दिखता है। यह खुमारी कानून और संविधान के राज को नष्ट कर देगी। ‘तारीख पर तारीख’ का राज मतलब कानून का राज नहीं है! यह एक स्वतंत्र राज है।

कानून का राज नहीं रहा है, ऐसा अब बार-बार कहा जाता है। अंग्रेजों के दौर में एक कानून था, ऐसा भी खुलकर कहा जा रहा है। कानून की बात तो सभी करते हैं, लेकिन कृति का क्या? न्या. रमन्ना सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त हो गए। जाते समय उन्होंने विदाई भाषण दिया। देश में लंबित मामलों को लेकर बात की। न्यायपालिका में सुधारों को लेकर अपना मत व्यक्त किया। ‘तारीख पर तारीख’ पर मैं कुछ नहीं कर सका, इस पर खेद व्यक्त किया। लेकिन उनके समक्ष महाराष्ट्र की गैरकानूनी सरकार को लेकर जो संवैधानिक पेच था, थोक दलबदल, ४० विधायकों की बेईमानी, विधायकों की अयोग्यता पर निर्णय, ऐसे जो मुद्दे थे, वे सब उसी अवस्था में छोड़कर न्या. रमन्ना चले गए। इससे पहले इस प्रकरण में उन्होंने दो-पांच तारीखें दी थीं, लेकिन निर्णय लंबित ही रहा। राज्य की अवैध सरकार के संदर्भ में हमारा कानून और संविधान वास्तव में क्या कहता है, इस बारे में देश को दिशा दिखाने के बाद उन्हें सेवानिवृत्त होना चाहिए था, ऐसा हुआ नहीं। न्याय व्यवस्था में व्याप्त सुस्ती पर खेद व्यक्त करके न्या. रमन्ना मुख्य न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त हो गए। लोकतंत्र और न्यायपालिका अदृश्य राजनीतिक शक्तियों के दबाव में चल रही हैं। ये पूरा देश देख रहा है। महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य में एक गैरकानूनी सरकार प्रमुख राजनीतिक दल की इच्छानुसार बनी है इसलिए ढाई महीने से चलाई जा रही है। इसे कानून का राज कैसे कहें?

जंगलराज की ओर!
हम जंगलराज के दौर में नहीं रह रहे हैं। जंगलराज के उस युग में भी कानून, रीति और परंपराएं थीं। महाभारत में एक मानवीय एवं आदर्शों पर स्थापित हुए देश का वर्णन मिलता है।
न राज्यं न च राजासीत्,
न दण्डो न च दाण्डिक:।
स्वयंमेव प्रजा: सर्वा,
रक्षन्ति स्म परस्परम।।
उस देश में कोई राजा नहीं था, सजा देने के लिए कोई दंड नहीं था, दंडित करनेवाला कोई सिपाही नहीं था। वहां के लोग स्वाभाविक रूप से धर्म का पालन करनेवाले थे। वे धर्म-बुद्धि के योग से एक दूसरे की रक्षा करते थे। आज ऐसी तस्वीर कहीं देखने को मिलती है क्या? रावण ने सीता का हरण किया, लेकिन उन्हें छुआ नहीं। छत्रपति शिवराय ने अफजल खान की अंतड़ियां निकाल दीं। उस शत्रु की कब्र प्रतापगढ़ की सीढ़ियों के पास बनाने का आदेश दिया। राम को १४ साल के वनवास की ‘सजा’ दिए जाने पर उन्होंने विरोध नहीं किया और न ही उसके खिलाफ ‘स्टे ऑर्डर’ लाया। क्योंकि वे मातृ-पितृ धर्म में विश्वास करते थे। जब रावण ने सीता का हरण किया तो वे लंका के विरोध में राजपत्र नहीं भेजते रहे, अथवा सिता का हरण किया, इस वजह से अदालत नहीं गए। लंका पर सीधे चढ़ाई कर दी। यदि न्यायालय में गए होते तो कदाचित उस दौर की अदालतें भी लंकापति रावण की इच्छानुसार ही न्यायदान करतीं। आज कानून है, संविधान है, लेकिन इससे किसे क्या मिलता है, यह चर्चा का विषय हो सकता है। दार्शनिक लाओत्से हमेशा कहते थे, ‘शास्त्रों को पढ़ने से इंसान को कुछ नहीं मिलता है।’ फिर भी उनके समकालीन उनसे कहते थे, ‘महाशय, आप यह वैâसे कह सकते हैं? आपने कानून और शास्त्रों का बहुत अध्ययन किया है। उसमें आपको क्या हासिल हुआ?’ लाओत्से तब कहते थे, ‘धार्मिक ग्रंथ, कानून की किताबों को पढ़ने से भी उसमें से कुछ हासिल नहीं होता है, यह जो मुझे पता चला, यही अत्यंत मौलिक है।’ लाओत्से और हमारी न्यायिक प्रणाली के विचार मुझे एक जैसे लगते हैं। देश के भावी मुख्य न्यायाधीश धनंजय चंद्रचूड़ ने हाल ही में एक क्रांतिकारी बयान दिया, ‘न्यायालय में जाने से न्याय मिलता ही है, ऐसा नहीं है, बल्कि सामाजिक प्रक्रियाओं से भी समस्या हल हो सकती है।’ इसका मतलब लाओत्से जो कहते हैं वह सच है। शास्त्रों और कानून की पुस्तकों की शक्ति समाप्त हो गई है।

न्यायाधीशों की शक्ति!
‘सीधी और स्पष्ट बात करना एक न्यायाधीश की सच्ची शक्ति होती है’, ऐसा दुनियाभर के कानून के जानकारों का मत है। रोमन लोगों के नजरिए से न्याय के देवता के लिए झंझावातों में भी न हिलनेवाला सिंहासन, किसी भी भावना का शिकार न बननेवाला अंत:करण, किसी को भी पक्षपात या द्वेषपूर्ण सोच के साथ नहीं देखनेवाली पट्टी से ढंकी आंखें और सभी अपराधियों पर समान निश्चितता और एक तटस्थ सामर्थ्य के साथ चलनेवाली तलवार अगला प्रतीक है। वहां के मुख्य न्यायाधीशों की न्यायालयों में इस देवता की प्रतिमा है, लेकिन उनका उग्र रूप लुप्त जैसा हो गया है और उनके चेहरे पर मुस्कान दौड़ती है तथा जब न्याय के इस देवता के समक्ष सामान्य व्यक्ति के खिलाफ झूठे आरोप लगाए जाते हैं, तब उनके मुख से कठोर, भद्दे शब्दों की आग बरसने लगती है। यह सच है। हमारे ‘सत्यमेव जयते’ के नीचे न्याय की दृष्टिहीन देवी हैं, आज उनकी स्थिति वास्तव में कैसी है?

‘लव जिहाद’ का खेल
धर्म का राज लाया जाए, ऐसा कुछ लोगों को लगता है। धर्म का राज मतलब कानून का राज नहीं है। धर्म का राज असल में वैâसा होगा, इसकी झलक आज सामने दिख रही है। अमरावती की सांसद श्रीमती राणा ने वहां थाने में जाकर हंगामा किया। उस क्षेत्र की एक युवती लापता हो गई और अपहरण करने के बाद उसका जबरन धर्म परिवर्तन करवाकर उसकी शादी करा दी गई। यह ‘लव जिहाद’ का मामला है, ऐसा श्रीमती राणा का कहना था। इस आरोप की वजह से अमरावती ही नहीं, बल्कि सर्वत्र तनाव का माहौल बन गया। देशभर के ‘धर्मप्रेमी’ समाचार चैनलों ने इस खबर को जोर-शोर से प्रसारित करके तनाव बढ़ाने में मदद की। महाराष्ट्र की धर्मप्रेमी सरकार ने जांच के आदेश दिए। पुलिस व्यवस्था काम में जुट गई। उस रात वह युवती सातारा रेलवे स्टेशन पर मिली थी। वह अकेली ही थी। युवती कहती है, गुस्से में मैं खुद ही घर से निकली थी। ‘लव जिहाद’ आदि सब फर्जी है! उस युवती का अपहरण आदि नहीं हुआ था, बल्कि धर्म के नाम पर तनाव बढ़ाने की कोशिश की गई। फिलहाल ऐसा रोज ही हो रहा है। इस प्रकार हम जंगलराज के युग की ओर बढ़ रहे हैं, यही कहना होगा। कानून की शुरुआत सुव्यवस्था के लिए की गई। कानून में जनता की राय महत्वपूर्ण है। ‘पब्लिक क्राय’ इस शब्द का उपयोग हमारी अदालतों द्वारा अक्सर किया गया है। ब्रह्मांड से परे एक व्यवस्था है ये तय है। हमारे पूर्वज उसी को ‘ऋतु’ कहते थे और ऋतु का उल्लंघन करनेवालों को वरुण दंडित करते हैं, ऐसा उनका मानना था। यूनानियों ने उस देवता को ‘नेमेसिस’ नाम दिया था। आर्य, यूनानियों जैसे सुसंस्कृत समाज से पहले रहे इंसानी वंश के आदिकाल व अस्तित्व में मौजूद कुछ जंगली समाज व्यवस्था में भी कुछ न कुछ नियम और पाबंदिया होती हैं। समूह बनाकर रहनेवाले पशुओं को भी प्रकृति अनुशासन का पालन करना सिखाती है और वो उनका स्वभाव बन जाते हैं। मानव समाज के प्रथम चरण में व्यवहार आदत से स्थापित होते हैं। ये मान्यताएं जनता की राय के डर से अमल में लाई जाती हैं। यह कानून का आधुनिक अवतार है। लेकिन जब कुछ लोग इस आधुनिक अवतार से जंगलराज की ओर बढ़ते दिखते हैं, तो डर लगता है। निरंकुश राजशाही मनमाने प्रतिबंध लगाती है और ये प्रतिबंध अत्याचारी होते हैं, लेकिन डर के कारण लोगों को इनका पालन करना पड़ता है। कानून बनाने और उन्हें लागू करने के तरीके में जनता की राय का महत्व होना, लोकतंत्र का ध्येय है। राजा अथवा किसी तानाशाह द्वारा ‘हम करे सो कायदा’ से आम जनता की रक्षा करनी होगी। तभी हम ‘आम लोक करे सो कानून’ तक पहुंच सकते हैं।

संविधान, ‘कॉन्स्टिट्युशन शब्द को अब मजाक के तौर पर लिया जाता है। ‘भाषा के लिए जिस तरह से व्याकरण, उसी तरह से स्वतंत्रता के लिए संविधान’ ऐसा थॉमस पेन का कथन लोकतंत्र के कानून का वेद वाक्य है। कानून बनाने वाले वि-नायक गण-राजा ने अपने लिए भी संवैधानिक अंकुश सुरक्षित रखा है।

पाकिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लीबिया में धर्म का राज है। धर्मराज्य की भांग जिनके दिमाग में चढ़ गई है, उन्हें इन सभी देशों के धर्मराज्यों की बर्बादी आंख भरकर देख लेनी चाहिए। इस महान देश को मिले संविधान, स्वतंत्रता और कानून की सत्ता को हम नष्ट करने जा रहे हैं।

कर्तव्य पथ पर केवल कानून का राज होना चाहिए! धर्म का राज अपने-अपने घर में!
kadaknathmumbaikar@gmail.com

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