" /> बनना चाहती थीं लेखिका…!-सुरेखा सीकरी

बनना चाहती थीं लेखिका…!-सुरेखा सीकरी

कहते हैं इंसान से दो कदम आगे उसका भाग्य चलता है। इंसान बनना कुछ चाहता है और किस्मत उसे कुछ और बना देती है। ऐसा ही कुछ हुआ था सुरेखा सीकरी के साथ, जो लेखिका बनकर पत्रकारिता में अपना नाम कमाना चाहती थीं, लेकिन भाग्य उन्हें अभिनय के क्षेत्र में ले आया। आगे चलकर अपने दमदार अभिनय के बलबूते उन्होंने अपनी अदाकारी का ऐसा परचम लहराया, जिसे जमाना सदियों तक याद रखेगा।
१९ अप्रैल, १९४५ को दिल्ली में जन्मी सुरेखा सीकरी के पिता एयरफोर्स में और मां टीचर थीं। उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखनेवाली सुरेखा सीकरी का बचपन अलमोड़ा और नैनीताल में गुजरा। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करनेवाली सुरेखा सीकरी का ‘नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा’ (एनएसडी) से जुड़ने का किस्सा भी अपने आप में काफी दिलचस्प है। एक बार महागुरु इब्राहिम अलकाजी अपना नाटक ‘किंग लियर’ लेकर सुरेखा सीकरी के कॉलेज पहुंचे। उस नाटक से सुरेखा सीकरी की बड़ी बहन इतनी प्रभावित हुर्इं कि उन्होंने ‘नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा’ में एडमिशन लेने का मन बन लिया। उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए परिवारवालों ने `एनएसडी’ का फॉर्म भी मंगवा लिया। फॉर्म आ तो गया लेकिन वो बिना भरे ही कुछ दिनों तक वैसे ही पड़ा रहा और थोड़े ही दिनों बाद जाने क्या हुआ सुरेखा सीकरी की बहन का मन बदल गया और उन्होंने ‘एनएसडी’ का फॉर्म नहीं भरा। घर में फॉर्म को यूं पड़े-पड़े धूल खाता देख एक दिन उनकी मां ने सुरेखा से कहा, ‘घर में फॉर्म पड़ा हुआ है। तुम ये फॉर्म भरकर एक कोशिश क्यों नहीं करती?’ इस पर सुरेखा ने अपनी मां से कहा, ‘आप तो जानती हैं, मैं एक किताबी कीड़ा हूं। मेरी रुचि पढ़ने-लिखने में है न कि अभिनय में। लेखन कार्य करते हुए मैं पत्रकारिता से जुड़ना चाहती हूं।’ सुरेखा की बात सुनकर उनकी मां ने उनसे कहा, ‘एक कोशिश तो करके देखो। अगर बात बन गई तो ठीक है, वरना कोई बात नहीं।’ मां की बात मानकर १९६५ में सुरेखा ने `एनएसडी’ का फॉर्म भर दिया। वहां उनका ऑडिशन हुआ और वे उस ऑडिशन में पास हो गर्इं। १९६८ में ‘एनएसडी’ का कोर्स पूरा करने के बाद पूरे १५ वर्षों तक वे `नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा’ की एक कंपनी के साथ मिलकर काम करती रहीं। उस कंपनी में ओम पुरी और सुधा शिवपुरी जैसे वरिष्ठ कलाकारों के साथ ही मनोहर सिंह, उत्तरा बावकर, ओम पुरी, रघुवीर यादव जैसे कलाकार भी उनसे जुड़े थे। नाटक में काम करने के दौरान ही इब्राहिम अलकाजी ने उनके मन में थिएटर और काम के प्रति श्रद्धाभाव जगा दिए थे।
अपने काम के प्रति श्रद्धाभाव से समर्पित सुरेखा सीकरी के पास एक दिन गोविंद निहलानी का फोन आया। फोन पर गोविंद निहलानी ने सुरेखा सीकरी से कहा कि ‘मैं ‘तमस’ बना रहा हूं और मैं चाहता हूं कि तुम मेरी इस सीरीज का हिस्सा बनो।’ गोविंद निहलानी की इच्छा का सम्मान करते हुए सुरेखा सीकरी ने ‘तमस’ में काम किया, जिसने भारतीय जनमानस के दिलों में अपनी जगह बनाने के साथ ही हंगामा मचा दिया। अभिनय की दुनिया से जुड़ने के बाद सुरेखा सीकरी को इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि एक दिन वे मुंबई में बस जाएंगी। जब उन्हें पता चला कि उनकी बहन का फ्लैट मुंबई में है, तब अपना बोरिया-बिस्तर समेट वे मुंबई आ गर्इं और यहीं की होकर रह गर्इं। मुंबई आने के बाद जहां उनका नाता थिएटर से छूटा, वहीं उनका नाता फिल्मों और टीवी सीरियल्स से जुड़ गया और वे थिएटर से हमेशा-हमेशा के लिए दूर हो गर्इं। ऐसा नहीं है कि वे थिएटर नहीं करना चाहती थीं, बल्कि मुंबई आने के बाद इसके लिए उन्होंने कोशिश भी की लेकिन मुंबई में थिएटरों के अपने-अपने ग्रुप होने के कारण वे उनमें रच-बस नहीं पार्इं और उन्होंने थिएटर से दूरी बना ली। अभिनय के जितना ही किताबों से प्रेम करनेवाली सुरेखा सीकरी थिएटर जॉइन करने से पहले ही इस्मत चुगताई, कृष्ण चंदर, रेणु, कमलेश्वर, भीष्म साहनी, गोर्की चेखव, टॉलस्टॉय, मंटो जैसे तमाम लेखकों को पढ़ चुकीं थीं। अमृता प्रीतम और शिवानी जैसी लेखिकाओं को पसंद करने के साथ ही वे फैज और फिराक की शायरी को भी बेहद पसंद करती थीं। श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, सईद मिर्जा जैसे निर्देशकों के साथ काम करनेवाली सुरेखा सीकरी को तीन मर्तबा `नेशनल फिल्म अवॉर्ड’ सहित तमाम दूसरे अवॉर्ड्स `संगीत नाटक अकादमी’, `फिल्मफेयर’, `इंडियन टेलीविजन अकेडमी अवॉर्ड’ आदि से भी नवाजा गया। हिंदी फिल्मों के साथ ही उन्होंने मलयालम फिल्मों में भी काम किया। टीवी धारावाहिक ‘बालिका वधू’ में दादी सा का रोल निभानेवाली सुरेखा सीकरी का विवाह हेमंत रेगे से हुआ था। बड़े पर्दे पर फिल्म `किस्सा कुर्सी का’ से डेब्यू करनेवाली सुरेखा सीकरी ‘नसीम’, `जुबैदा’, `सरफरोश’, `रेनकोट’, `हमको दीवाना कर गए’, `बधाई हो’ जैसी फिल्मों में और टीवी पर `सांझा चूल्हा’ से डेब्यू करने के बाद `एक था राजा, एक थी रानी’, `परदेस में है मेरा दिल’, `केसर’ जैसे कई हिट शोज में नजर आर्इं। पर्दे पर तेज-तर्रार दिखनेवाली सुरेखा सीकरी स्वभाव से बेहद विनम्र और सादगी पसंद थीं। नए कलाकारों के साथ उनका रिश्ता इतना आत्मीय होता, जिसे देखकर ऐसा लगता मानो वे उन कलाकारों की ही हमउम्र हों। एक शूटिंग के दौरान सुरेखा सीकरी को जबरदस्त चोट लगी और उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हो गया। इलाज के बाद ठीक होकर वे दोबारा अभिनय की दुनिया में लौटीं और उन्होंने फिल्म ‘बधाई हो’ में आयुष्मान खुराना की दादी दुर्गा देवी कौशिक की अविस्मरणीय भूमिका निभाई।
मां के कहने पर लेखिका बनने की इच्छा को छोड़ अभिनय की दुनिया में कदम रखनेवाली सुरेखा सीकरी अपनी बीमारी के चलते अपने अंतिम दिनों में आर्थिक तंगी का शिकार हो गई थीं। वे अभी और भी काम करना चाहती थीं लेकिन कार्डिएक अरेस्ट के चलते १६ जुलाई २०२१ को ७६ वर्ष की उम्र में उनका देहांत हो गया। फिल्म, टीवी और थिएटर से जुड़ी इस अलहदा अभिनेत्री को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि…!