मुख्यपृष्ठस्तंभतीसरा काॅलम : प्रसन्न समाजों में हम पिछड़ रहे हैं!

तीसरा काॅलम : प्रसन्न समाजों में हम पिछड़ रहे हैं!

 ललित गर्ग

संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष २०२२ की पहली तिमाही में सालाना वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट जारी की है। १४९ देशों की सूची में भारत का स्थान खुशी और प्रसन्नता के मामले में १३६वां है, जो हैरानी का बड़ा कारण है। इस सूची में फिनलैंड लगातार पांचवीं बार अव्वल रहा है। डेनमार्क, आइसलैंड, स्विटजरलैंड और नीदरलैंड ने शीर्ष पांच में अपना स्थान बनाया है। हम प्रसन्न समाजों की सूची में क्यों नहीं अव्वल आ पा रहे हैं? गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश के चुनाव की सरगर्मियों एवं शोर-शराबे के बीच इस रिपोर्ट का आना जहां सत्ता के शीर्ष नेतृत्व को आत्ममंथन करने का अवसर दे रहा है, वहीं नीति-निर्माताओं को भी सोचना होगा कि कहां समाज निर्माण में त्रुटि हो रही है कि हम लगातार खुशहाल देशों की सूची में नीचे खिसक रहे हैं। क्या खुशियों को स्थापित करना सरकार की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए? हमारी खुशी वैâसी है, इसको मापना भी इसलिए जरूरी है कि हम एक नया भारत एवं सशक्त भारत निर्मित करने की ओर अग्रसर हो रहे हैं। बिना खुशी एवं आनन्द के हमारी उपलब्धियां बेमानी होंगी। प्रश्न है कि हमारी खुशी का पैमाना क्या हो? अधिकतर लोग छोटी-छोटी जरूरतें पूरी होने को ही खुशी मान लेते हैं। इससे उन्हें उस पल तो संतुष्टि मिल जाती है, उनका मन खिल जाता है। लेकिन यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं टिकती, स्थायी नहीं होती। इच्छा पूरी होने के साथ ही उनकी खुशी भी कमजोर होने लगती है। खुशी एवं प्रसन्नता हम सबकी जरूरत है, लेकिन प्रश्न है कि क्या हमारी यह जरूरत पूरी हो पा रही है, ताजा आकलन से तो यही सिद्ध हो रहा है कि हम खुशी एवं प्रसन्नता के मामले में लगातार पिछड़ रहे हैं। विडंबनापूर्ण स्थिति तो यह है कि हमारा भारतीय समाज एवं यहां के लोग अपने ज्यादातर पड़ोसी समाजों से कम खुश हैं।
खुशहाली सूचकांक के लिए अर्थशास्त्रियों की एक टीम व्यापक स्तर पर शोध करती है। यह टीम समाज में सुशासन, प्रति व्यक्ति आय, स्वास्थ्य, जीवित रहने की उम्र, भरोसा, सामाजिक सहयोग, स्वतंत्रता और उदारता आदि को आधार बनाती है। रिपोर्ट का मकसद विभिन्न देशों के शासकों को आईना दिखाना है कि उनकी नीतियां लोगों की जिंदगी खुशहाल बनाने में कोई भूमिका निभा रही हैं या नहीं। हमारा शीर्ष नेतृत्व निरंतर आदर्शवाद और अच्छाई का झूठ रचते हुए सच्चे आदर्शवाद के प्रकट होने की असंभव कामना करता रहा है। इसी से जीवन की समस्याएं सघन होती जा रही हैं, नकारात्मकता का व्यूह मजबूत होता जा रहा है, खुशी एवं प्रसन्न जीवन का लक्ष्य अधूरा ही रह रहा है, इनसे बाहर निकलना असंभव-सा होता जा रहा है। दूषित और दमघोंटू वातावरण में आदमी अपने आपको टूटा-टूटा सा अनुभव कर रहा है। आर्थिक असंतुलन, बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, बिगड़ी कानून व्यवस्था एवं भ्रष्टाचार उसकी धमनियों में कुत्सित विचारों का रक्त संचारित कर रहा है। ऐसे जटिल हालातों में इंसान वैâसे खुशहाल जीवन जी सकता है?
यहां प्रश्न यह भी है कि आखिर हम खुशी और प्रसन्नता के मामलें में क्यों पीछे हैं, जबकि पिछले कुछ समय से भारतीय अर्थव्यवस्था की तेजी को पूरी दुनिया ने स्वीकार किया है। खुशहाल भारत को निर्मित करने के लिए आइए! अतीत को हम सीख बनाएं। उन भूलों को न दोहराएं, जिनसे हमारी रचनाधर्मिता जख्मी हुई है। एक सार्थक एवं सफल कोशिश करें खुशहाली को पहचानने की, पकड़ने की और पूर्णता से जी लेने की।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं।)

(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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