मुख्यपृष्ठग्लैमर`हम घंटों बेसमेंट में छुपे रहे!'-नुसरत भरूचा

`हम घंटों बेसमेंट में छुपे रहे!’-नुसरत भरूचा

कु छ कलाकारों के टैलेंट की पहचान देर से ही सही लेकिन जब होती है तो उनकी प्रतिभा कुछ ऐसे निखरकर आती है, जो रुकने का नाम नहीं लेती। स्कूल-कॉलेज के दिनों से स्टेज पर एक्टिंग करनेवाली नुसरत को ‘प्यार का पंचनामा’ और ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ जैसी फिल्मों की सफलता के बाद मुड़कर पीछे नहीं देखना पड़ा। हाल ही में इजरायल से सकुशल हिंदुस्थान वापस लौटने के बाद नुसरत भरूचा सुर्खियों में हैं। पेश है, नुसरत से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

आपके इजरायल जाने की क्या वजह रही?
३ अक्टूबर को मेरी फिल्म ‘अकेली’ का इजरायल के प्रतिष्ठित ‘हफीफा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ में स्क्रीनिंग थी। इस फिल्म फेस्टिवल में मेरी फिल्म का सिलेक्शन होना मेरे लिए खुशी और गर्व की बात थी। इस फेस्टिवल में आमंत्रित किए जाने के बाद निर्माता, मैं और मेरी स्टाइलिस्ट हमने इजरायल जाने की तैयारी की।

क्या वहां पहुंचने के बाद माहौल शांतिपूर्ण था?
जी, बिलकुल। हमें तो छोड़िए, वहां के नागरिकों को भी अचानक हुए इस हमले की भनक तक नहीं लगी। वहां पहुंचने के बाद हमने जेरुसलेम, जाफा, बहाई, डेड सी जैसे स्थानों की सैर की। हम सभी बेहद खुश थे, क्योंकि यह एक अनोखा और रोमांचक अनुभव था। ६ अक्टूबर की शाम फिल्म ‘अकेली’ की पूरी स्टारकास्ट के लिए आयोजकों ने एक भव्य डिनर पार्टी का आयोजन किया। सुबह ४ बजे अचानक सायरन की तेज आवाजें आने लगीं। होटल के कमरों से बाहर निकलकर हम लॉबी में आए। होटल के स्टाफ ने कहा, ‘हमास ने इजरायल पर आक्रमण कर दिया है और आप सभी को होटल के बेसमेंट में आश्रय लेना होगा।’ यह सुनकर वहां उपस्थित लोगों की आंखों के सामने अंधेरा छा गया।

होटल के बेसमेंट में आपको कितने घंटे रुकना पड़ा?
हम घंटों बेसमेंट में छुपे रहे। मैं सोच रही थी कि कुछ घंटे पहले ही मैं खुशियों के आसमान पर थी और अचानक ये सब क्यों और वैâसे हुआ? मैंने इसकी कल्पना भी नहीं की थी। बार-बार यह खयाल मन में आने लगा कि क्या मैं सही-सलामत अपने देश हिंदुस्थान लौट पाऊंगी?

क्या भारतीय दूतावास ने आपकी कोई मदद की?
हमने भारतीय दूतावास की मदद लेने के बारे में सोचा और इस बाबत होटल मैनेजर से बात की। उसने कहा इंडियन एम्बैसी होटल से महज दो किमी दूरी पर है, लेकिन वहां तक जाने के लिए कोई ट्रांसपोर्ट नहीं था।

फिर आपको इंडियन एम्बैसी से मदद कैसे मिली?
देर रात खबर आई की इजरायल की सड़कों पर हमास की फौज नागरिकों को बंदूक की नोक पर घर से बाहर निकाल रही है। कइयों को अपनी जान गंवानी पड़ी। जब खिड़की से बाहर झांककर हमने देखा तो हमास की फौजों ने रोड पर पार्क की गई कारों को तहस-नहस कर दिया था। सड़कों पर लाशों और गाड़ियों का ढेर लगा था।

फिर?
भारत लौटने की फ्लाइट अनिश्चित थी और जो भी फ्लाइट्स थीं, वे वैंâसल होती जा रही थीं। शुक्र था कि तब तक इंटरनेशनल फोन कॉल्स की सुविधा नहीं बंद हुई थी। पागलों की तरह मैं अपने देश में फोन कॉल किए जा रही थी। घर-परिवार में सभी काफी चिंतित थे। मेरे जितने भी जानने और पहचानने वाले थे सभी ने मुझे सुझाव और विकल्प सुझाए।

सुना है कि आपकी फोन सुविधा भी बंद होने के कगार पर थी?
बैटरी लो होती जा रही थी और फोन का सिग्नल नहीं मिल रहा था। अगर पाप-पुण्य की संकल्पना सच है तो हमारे पुण्य का पलड़ा भारी होगा जो इजरायल के भारतीय, इजरायली को-एक्टर्स, भारत और इजरायली दूतावास, होटल का स्टाफ सभी हमारे हिंदुस्थान लौटने के पक्ष में काफी मददगार साबित हो रहे थे। किसी तरह एक फरिश्तेनुमा टैक्सी ड्रायवर ने हमें एयरपोर्ट ड्रॉप किया। बड़ी जद्दोजहद के बाद मैं और मेरे साथी फ्लाइट में बोर्ड हुए और कुछ देरी से ही सही फ्लाइट ने जब मेरे देश की तरफ उड़ान भरी और जब हम मुंबई एयरपोर्ट पर लैंड हुए तो खुशी के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। अपनी वापसी के लिए मैं विधाता की शुक्रगुजार हूं। परिवार का आशीर्वाद, चाहनेवालों की दुआएं मुझे अपने देश सही-सलामत वापस ले आर्इं। सच कहूं तो प्रार्थनाओं में बड़ी शक्ति है।

अन्य समाचार