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बियाह के लड्डू

एड. राजीव मिश्र मुंबई

बलिराम सुबहिये से गहरी सोच मा डूबे हैं। यहि सहालग मा आखिर गाँव के सबसे बदसूरत अदमी परदेसिया के बियाह हुइ गवा। परदेसिया जेहिके मुँह पे चेचक के बड़ा-बड़ा चकत्ता, फरुहा जइसन दाँत अउर रंग तो अइसन की अंधियारे मा दिखइयै नही पड़े ओहिका चनरमा जइसन मेहरिया मिलि गय। बलिराम उमिर के चालीसवाँ बसंत देखि चुके हैं, पर आज तक बियाह के लड्डू छोड़व बुनिया तक नसीब नही भवा। गाँव मा केहू के इहाँ देखुहार अउतय बलिराम कपड़ा पहिन के मुँह मा किरिम पावडर अउर बार मा चमेली के तेल लगाई के बिना बुलाये पहुँच जाति रहें का पता देखुहार के नजर यहि हीरा पर परि जाय अउर बलिराम के जिनगी के असर मा दूब जामि जाय पर भागि के अइसन बज्जर बलिराम के ऊपर गिरा हय कि पूछो न। बलिराम के मुड़े मउर देखय के साध लिए बलिराम के माई-बाबू दूनउ सरग के रस्ता नापि लिहे पर हाय रे किस्मत मजाल का कि बलिराम के जवानी पर भगवान के तनिकउ दया आय होय। बलिराम के चक्कर मा ओनकर दुनउ लहुरा भाय भी बियाहे के रस्ता देखत देखत ३५ के पार होइ गए। गाहे बगाहे कउनउ देखुहार छोटके भाई के चक्कर मा दुआरे पहुँच भी गय होंय तो बलिराम के ब्रह्मचर्य के करुण कहानी सुनि के आज तक वापिस नही लउटे। बलिराम के जिनगी के सागर मंथन से अब दूनउ भाइन के मन मा क्रांति के ज्वाला निकरय लगा है अउर इही क्रांति के ज्वाला के बीच छोटकना के नजर एक कामिनी से लड़ि गई ओहि दूनउ के पियार के बरगद जब हिलोर मारे लागि तब लड़की के बाबू मजबूरी मा लड़िका के घर की राह लिए। बलिराम के दुआरे पहुँचि के हांक लगाये, ‘निकरो हो बरदेखुआ आय हएं।’ ई आवाज सुनतै बलिराम के गोड़ मा मानो मशीन लागि गवा होय। फटाफट तैयार होइके जब दुआरे पहुँचे तो लड़की के बाप बलिराम से कहें, ‘चच्चा लड़िका बुलाओ?’ एतना सुनतय बलिराम के कान से मानौ खून निकरि गवा तबो हिम्मत कइके कहें, ‘अबहीं हमहूँ कुवाँर हई दद्दा।’ लड़की के बाप छूटतय बोलि परा, ‘अइसन है चच्चा अब तोहय चार बोझ चईला के जरूरत है’, एतना सुनतय बलिराम दुआरे से उठे अउर आज तक घर नही लउटे।

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