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शाबाश स्टालिन! …सफेद हाथी को लगाम!!

शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे मराठी लोगों को एक मंत्र हमेशा देते थे, वह मतलब ‘दक्षिण के लोगों की जातीयता और मुसलमानों की कट्टरता जब तक आपके शरीर में नहीं घुलती महाराष्ट्र का उत्थान नहीं होगा।’ इसे अस्मिता कहें अथवा जातीयता का अनुभव जो तमिलनाडु के विधानसभा में नजर आया और संपूर्ण तमिलनाडु में भी वही तश्वीर दिखाई दे रही है। तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि के विधानसभा में दिए गए अभिभाषण को लेकर उनके सामने ही हंगामा मच गया और मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने ही वेल में जाकर राज्यपाल रवि का भाषण रोक दिया। सरकार द्वारा तैयार किए गए भाषण को ही राज्यपाल को पढ़ना होता है ऐसा शिष्टाचार है, लेकिन तमिलनाडु सरकार द्वारा तैयार कर दिए गए भाषण के कुछ हिस्सों को अलग कर राज्यपाल बोलने लगे, तब मुख्यमंत्री स्टालिन भड़क गए। राज्यपाल ने रामासामी पेरियार, अण्णा दुराई, डॉ. आंबेडकर, करुणानिधि आदि प्रमुख नेताओं के नाम भाषण से अलग कर दिए और अपने कुछ संदर्भ जोड़ दिए। ‘शांतिप्रिय तमिलनाडु’ यह संदर्भ भी हटा दिया। सामाजिक न्याय, स्वाभिमान, सर्वसमावेशक विकास, समानता, महिला सशक्तीकरण, धर्मनिरपेक्षता और सभी के प्रति करुणा इन तत्वों के आधार पर इस सरकार की स्थापना हुई, जैसे संदर्भ वाले हिस्से को राज्यपाल ने हटा दिया और खुद के ‘मन की बात’ वे कहने लगे। इसलिए राज्यपाल के इस बर्ताव पर स्टालिन भड़क गए। सरकार द्वारा तैयार किया गया भाषण ही विधानसभा के पटल पर रहेगा, बाकी राज्यपाल के मन की बात हटा दी जाएगी, ऐसा घोषित करते ही राज्यपाल राष्ट्रगीत तक भी नहीं रुके और सदन के बाहर निकल गए। राज्यपाल रवि भाजपा और संघ का एजेंडा चला रहे हैं और सरकार पर लाद रहे हैं, ऐसी आलोचना अब होने लगी है। राज्यपाल ने तमिल अस्मिता का अपमान किया इसलिए तमिलनाडु में हर जगह ‘गेट आउट रवि’ जैसे पोस्टर्स झलकने लगे। राज्यपाल को वापस बुलाओ ऐसी जोरदार मुहिम शुरू होने से तमिलनाडु में भी ‘राज्यपाल विरुद्ध सरकार’ का संघर्ष छिड़ा हुआ है। जो महाराष्ट्र में चल रहा है वही दूसरे रूप में तमिलनाडु में दिखाई दे रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि महाराष्ट्र में राज्यपाल द्वारा छत्रपति शिवराय का अपमान किए जाने के बाद भी सरकार, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री वगैरह चुप्पी साधे हुए हैं लेकिन तमिलनाडु में राज्यपाल द्वारा रामासामी पेरियार, डॉ. आंबेडकर, करुणानिधि जैसे महापुरुषों का अपमान करते ही मुख्यमंत्री स्टालिन ने विधानसभा में ही राज्यपाल के सामने स्वाभिमानी तेवर दिखाया। मुख्यमंत्री स्टालिन के पुत्र उदयनिधि ने विधानसभा में जो हुआ उसका स्वागत किया। उदयनिधि कहते हैं, ‘हमारे अधिकारों को प्रभावित करनेवाले राज्यपाल को मुख्यमंत्री स्टालिन ने भगा दिया!’ देश के आधा दर्जन राज्यों में ‘सरकार बनाम राज्यपाल’ का टकराव बढ़ गया है और ये सभी गैर-भाजपा शासित राज्य हैं। इन राज्यों के राजभवन में भाजपा के लोगों ने अपना कार्यालय बना लिया है और वे सरकार पर नियंत्रण रखने की कोशिश करते हैं। महाराष्ट्र में ‘ठाकरे सरकार’ के समय मौजूदा राज्यपाल खौलते तेल में पापड़ की तरह तड़तड़ाते थे। सरकार के कई पैâसलों पर आपत्ति जताते हुए मुख्यमंत्री को पत्र के माध्यम से मार्गदर्शन करते थे। सरकारी पैâसलों और सिफारिशों को टाल देते थे। उन्होंने विधान परिषद के १२ मनोनीत सदस्यों की नियुक्ति को भी लटकाकर रखा। लेकिन जैसे ही राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ, वे तड़तड़ाने वाले राज्यपाल कहीं दिखाई नहीं देते। राज्यपाल की अब ठंडी कुल्फी बन गई है। ऐसे राज्यपाल ने महाराष्ट्र के देवताओं का अपमान किया। छत्रपति शिवराय, सावित्रीबाई फुले के मामले में बहुत गहरा ज्ञान बांटा लेकिन हमारी सरकार उनसे जवाब मांगने को तैयार नहीं है। इसलिए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने वहां के राज्यपाल को तड़कते हुए जो स्वाभिमानी तेवर दिखाया, वह काबिलेतारीफ है। तमिलनाडु के राज्यपाल रवि सूट-बूट वाले भगतसिंह कोश्यारी हैं। कुछ दिनों पहले इन महोदय ने तमिलनाडु का नाम ही बदल दिया। उन्होंने तमिलनाडु का उल्लेख ‘तमिझगम’ के रूप में किया और वे इस नाम पर आग्रही हैं। राज्यपाल की यह झुंडशाही और मनमानी है। मुख्यमंत्री अक्सर राज्यपालों के साथ टकराव से बचते हैं। केंद्र से पंगा क्यों? ऐसी उनकी नीति होती है। लेकिन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने राज्यपाल से संघर्ष किया और तमिल अस्मिता के लिए केंद्र से पंगा भी ले लिया। महाराष्ट्र के दुम दबानेवाले वीरों को इस पर ध्यान देना चाहिए। शिवराय का अपमान करने के बावजूद, महाराष्ट्र के राज्यपाल राजभवन में खुश हैं। वहां स्टालिन ने अपने राज्यपाल को भागने पर मजबूर कर दिया और ‘गेट आउट रवि’ की जोरदार मुहिम शुरू कर दी। राज्यपाल संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं। वे केंद्र और राज्य के बीच एक कड़ी के रूप में अपना कर्तव्य निभाते हैं। एक तरह से वे सफेद हाथी ही होते हैं। उम्मीद है कि ये सफेद हाथी संविधान के दायरे में रहकर काम करें। लेकिन ये सफेद हाथी अब बेकाबू होने लगे हैं। श्रीमान स्टालिन ने बेकाबू सफेद हाथी को भगाया। शाबाश स्टालिन!

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