ये कैसी बगावत?

हर उम्र का है तकाजा
कुछ बासी, कुछ है ताजा
दिल है वो `अनमोल रतन’
जिसे रब ने कमल रूप-सा नवाजा,
स्वभाव से अल्हड़ ये सदा
चले उधर, जिधर हो निर्देश
`इधर आना है मना!
आना न इस देश।
न समझे ये तो `ऊंच-नीच’ का भेद
ये न जाने देश और परदेश
न ही समझे नाम… बदनाम
रिश्तों की रेखाएं या दरवेश।
भरी महफिल में भी अचानक
जोर से धड़क `बगावत ले आए
अपनी आंखें, ये अपने होंठ
बेकाबू, बेबाक हो जाए
बन बैठे ये जैसे `मदहोश शराबी’
बायोडाटा प़ढ़े बिना ही
बोतल गट-गट गटक जाए।
लाख संभालो भीड़ में खुद को
सब को सब दिख जाता है
चेहरा बन जाए खुली किताब यूं
अनपढ़ भी पढ़ जाता है
दिल अपना यूं गैर बना
इश्तहार-सा छप जाता है
लाख जतन कर लो भैयाजी
कुछ भी छिप नहीं पाता है।
-नैंसी कौर, नई दिल्ली

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