मुख्यपृष्ठस्तंभसंडे स्तम्भ: जब सिनेमाघर बन जाता था मंदिर!

संडे स्तम्भ: जब सिनेमाघर बन जाता था मंदिर!

विमल मिश्र। जब भी पर्दे पर ‘मैं तो आरती उतारूं रे संतोषी माता की’ गीत प्रकट होता ‘एडवर्ड’ सिनेमा का दर्शक समुदाय भावविभोर होकर हाथ जोड़े कोरस में शामिल हो जाता। महिलाएं भीतर घुसने से पहले सैंडिल उतार हाथ की थाली में गुड़-चने का नैवेद्य लेकर आतीं, थाली में रखे दीयों से संतोषी माता की बाकायदा आरती होती और सबमें प्रसाद बंटता। दर्शकों पर यही जादू जगाया था ‘हम आपके हैं कौन’ ने ‘लिबर्टी’ सिनेमा में। ‘स्टर्लिंग’ सिनेमा को मशहूर किया उसके मैटिनी और लेट नाइट शोज ने।

मुंबई का कौन-सा सिनेमा हॉल ऐसा है, जहां आज भी आप महज ४०-४५ रुपए की टिकट में फिल्म की वातानुकूलित आनंद यात्रा का लुत्फ उठा सकते हैं? तो ये है कालबादेवी का ‘एडवर्ड’ सिनेमा। कालबादेवी का विशाल दरवाजों वाला थ्री -टियर खूबसूरत ‘एडवर्ड’ मेट्रो की ‘सिनेमा गली’ में सबसे पुराना सिनेमाघर है-१९१४ के जमाने से मौजूद। शायद शहर में बचे रहे सिंगल स्क्रीन थिएटरों में सबसे पुराना। फिल्में दिखाने से पहले यह ऑर्वेâस्ट्रा के कार्यक्रमों के लिए मशहूर था, जिसके ५०९ दर्शकों में मुंबई में बसे विदेशी और सैन्य अधिकारी ही ज्यादा होते थे। इसकी ऑर्वेâस्ट्रा पिट आज भी मौजूद है। हॉलीवुड की काउब्वॉय नुमा बी ग्रेड और माइथोलॉजिकल फिल्में देखने के लिए वैâथोलिक और पारसी दर्शकों की यहां लंबी लाइनें लगती थीं। एक बार तो यहां महात्मा गांधी भी आए अनाज व्यापारियों को संबोधित करने।
१९७५ में जब ‘जय संतोषी माता’ प्रदर्शित हुई तो ‘एडवर्ड’ की टिकट खिड़कियों पर महीनों लाइनें लगी रहीं। जब भी पर्दे पर अनीता गुहा ‘मैं तो आरती उतारूं रे संतोषी माता की’ के साथ प्रकट होतीं पूरी पब्लिक नम आंखों से हाथ जोड़े उसके कोरस में शामिल हो जाती। ‘एडवर्ड’ सिनेमा नहीं, जैसे मंदिर बन जाता था। महिलाएं भीतर घुसने से पहले चप्पल और सैंडिल उतार हाथ की थाली में गुड़-चने का नैवेद्य लेकर आतीं, थाली में रखे दीयों से बाकायदा आरती होती और प्रसाद बंटता। आज यह जानकर आश्चर्य लग सकता है कि जो फिल्म फिल्म इतिहास की सबसे हिट फिल्मों में मानी जाती है, उसे उसके नाम के कारण मुंबई का कोई थिएटर शुरू में प्रदर्शित करने को ही तैयार नहीं था।
‘एडवर्ड’ सिनेमा की शुरुआत गुजराती फिल्मों से हुई। सस्ती टिकट दर के कारण यहां लगी फिल्में महीनों चला करतीं। यह फिल्मोत्सवों का भी ठिकाना रहा। पॉश इलाके में इसकी मौजूदगी को देखते हुए कई बार इसे गिराकर शॉपिंग मॉल और मल्टीप्लेक्स बनाने के प्रलोभन दिए गए, पर जर्मनी में पैदा इसकी जर्मन मालकिन गर्टूड भरूचा टस-से-मस नहीं हुर्इं। काश, इसे बनाते समय जगह के अधिकतम उपयोग को ध्यान में रखते हुए इसकी डिजाइन पर भी ध्यान दिया गया होता। अगर जगह की बर्बादी नहीं होती तो यह आज मुंबई के सबसे शानदार सिनेमाघरों में शामिल हुआ होता।
‘अंदाज’ अपना-अपना
जिस समय न्यू मरीन लाइंस स्थित इस थिएटर का निर्माण चल रहा था, उसी समय हिंदुस्थान आजाद हुआ और फिल्म के मालिक हबीब हुसैन को इसका नाम मिल गया- ‘लिबर्टी’। १९४९ में पुराने जमाने की सुपरहिट ‘अंदाज’ के साथ यह हिंदी फिल्में भी दिखाने लगा। सुपरहिट फिल्मों के लिए देश के मशहूर थिएटरों में गिना जाता है ‘लिबर्टी’, जहां ‘मुगल-ए-आजम’ का प्रीमियर हुआ। ‘अंदाज’ यहां दो वर्ष चली, ‘मदर इंडिया’ वर्ष भर तो ‘हम आपके हैं कौन’ लगातार १०५ हफ्ते (कुल मिलाकर ८४७ दिनों में २,३४१ शो)। मशहूर चित्रकार एम.एफ. हुसैन ने शक्तिरूपा नारी के सम्मान में इस अवसर पर विशेष प्रदर्शनी लगाई, जिसकी नायिका थीं इस फिल्म की नायिका माधुरी दीक्षित। ‘हम आपके हैं कौन’ के कलाकारों ने जो परिधान पहने थे, उनकी यहां अलग से नुमाइश हुई।
‘सिनेमा गली’ में मौजूद ‘लिबर्टी’ मुंबई के उन सिनेमाघरों में से है, जो दर्शकों और फिल्म निर्देशकों के बीच एक जैसे लोकप्रिय हैं। यहां कई फिल्मों की शूटिंग हुई है, जिनमें सबसे नई है काजोल और अजय देवगन की ‘हेलिकॉप्टर ईला’। आर्ट डेको स्थापत्य का सर्वश्रेष्ठ थिएटर माना जाता है ‘लिबर्टी’, जो अपने लोगो ‘पियानो’ के साथ मुंबई का सर्वश्रेष्ठ जॉज म्यूजिक स्मारक भी कहलाता है। पुश बैकवाली सीट्स यहां १९४७ से ही हैं। १,२०० दर्शकों की क्षमतावाले मुख्य थियेटर के साथ ‘लिबर्टी मिनी’ नाम से एक मिनी थियेटर (३०) भी है।
दर्शकों की कमी से आजिज आकर ‘लिबर्टी’ थिएटर फिल्मों के लिए १९१२ से चार वर्ष बंद रहा। अब कल्चर सेंटर बन गया है और रेग्युलर मूवी शोज के लिए कम, म्यूजिक, आर्ट, थिएटर, डांस शोज और फिल्म फेस्टिवल्स के लिए ज्यादा जाना जाता है। मौजूदा मालिक नाजिर हुसैन ने खर्च चलाने के लिए बिल्डिंग को आंशिक रूप से कार्यालयों को किराए पर दे दिया है। सितंबर, १९१६ से आधुनिकतम प्रोजेक्टर व साउंट सिस्टम के साथ नए कायापलट में यहां दोबारा फिल्म शो शुरू हुए। अब यह ‘कॉर्निवाल लिबर्टी सिनेमा’ के नाम से जाना जाता है।
लेट नाइट वंडर
दक्षिण मुंबई के सिनेमा में बनिस्बत नया स्टर्लिंग १९६९ में हॉलीवुड म्यूजिकल हिट Dदम्ूदr Dदत्ग्ूूत के साथ खुला तो डॉल्बी साउंड के साथ जीनॉन प्रोजेक्टर के साथ टेक्नोलॉजी के मामले में देश का सबसे उन्नत सिनेमाहॉल था। मई, २००७ में शुरू तीन स्क्रीनों वाला उसका मल्टीप्लेक्स रूप स्टर्लिंग सिने प्लेक्स आज भी ऊपर््ें सर्टिफिकेशन वाला पहला सिनेमाघर माना जाता है। इसकी ‘पहले-पहल’ में दो और बातें शामिल हैं। स्नैक (वैâरामेल पॉपकॉर्न) सर्व करनेवाला फूड कोर्ट से सज्ज यह देश का पहला सिनेमा हॉल कहा जाता है। इसी तरह लोग इसे मैटिनी शो और लेट नाइट शो का रिवाज शुरू करनेवाला पहला थिएटर भी मानते हैं। मशहूर सीढ़ियों के साथ कॉलेज स्टुडेंट्स के बीच फोर्ट का सबसे हिट हैंग आउट प्लेस। सिंगल स्क्रीन थिएटर के रूप में केवल हॉलीवुड फिल्में ही दिखानेवाला यह थिएटर अब ज्यादातर हिंदी फिल्में ही दिखलाता है। ‌यह फिल्म समारोहों का भी मशहूर ठिकाना है।
स्टर्लिंग १९९९ में हुई कुख्यात डवैâती की वजह से देश भर में चर्चा की वजह बना था, जब चाकुओं से लैस लुटेरों ने सिनेमा स्टॉफ को पीटकर टॉयलेट में बंद कर दिया था और नकदी के साथ कीमती सामान ले भागे थे। २००८ के आतंकवादी हमलों से पहले लश्कर-ए-तोइबा के आतंकवादियों ने यहां भी रेकी की थी। (क्रमश:)
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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