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जब मिस्र की ममियों को किया जाता था ‘नग्न’!

मनमोहन सिंह
१५ जनवरी, १८३४ की रात। लंदन के रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स के बाहर लंदन के संभ्रांत वर्ग की भारी भीड़ लगी हुई थी। मुख्य द्वार से वे लोग भीतर घुस रहे थे, जिनके पास ऊंची कीमतों पर बिकी हुई टिकट थी। इन टिकटों का मिलना आसान नहीं था। जो लोग भीतर जा रहे थे वे लोग बाहर खड़े लोगों को हेय दृष्टि से देख रहे थे। हालांकि, सभी लोग कुलीन वर्ग के थे। लंदन में एक तरह से तूफान आ गया था।
दरअसल, यह एक प्रकार का दुर्लभ शो था। मेडिकल कॉलेज का यह हाल भर चुका था, लोग साथ में इंतजार कर रहे थे थॉमस पेटीग्रेव का। एक अत्यधिक सम्मानित सर्जन थे। टिकट हासिल करने में कामयाब रहे लंदनवासी एक दुर्लभ अनुभूति की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनकी आंखों के सामने, पेटीग्रेव धीरे-धीरे २१वें राजवंश की एक प्रामाणिक मिस्र की ममी को विज्ञान के लिए खोलने जा रहे थे!
उसी साल थॉमस पेटीग्रेव इसी तरह का और एक शो कर रहे थे। मेडिकल कॉलेज के भीतर और बाहर लोगों की भीड़ में कोई कमी नहीं थी।
नेस खोंस, जिस महिला की ममी की पट्टियां उतारी जानी थीं, उसे एक विशेष उपकरण में रखा गया था। जिससे ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे वह नृत्य कर रही हो, क्योंकि उसकी लिनेन की पट्टियां उसके चारों ओर से खुल रही थीं। धीरे-धीरे, जैसे ही लिनेन हटाए गए, उसके शरीर पर कई कीमती आभूषण दिखाई दिए, जिन्हें उस महिला को उसकी अंत्येष्टि के वक्त पहनाए गए होंगे। उसके हार में ‘सुंदर माइक्रोस्कोपी बाज’ बना हुआ था।
महिला की कांख के नीचे अब रंगहीन लेकिन पूरी तरह से संरक्षित फूल था।
आवाज हाल में गूंज रही थी ‘यह एक सुंदर महिला है… जो धूप में चलती थी… मूसा से पांच सौ साल पहले, यीशु मसीह से दो हजार साल पहले जीवित थी और प्यार करती थी…!’
लोग बड़े आश्चर्य से, कौतूहल भरी निगाहों से लेनिन के कपड़े में लिपटी हुई महिला कंकाल को ‘नग्न’ होते हुए देख रहे थे… जो मिस्र की रेतीली भूमि में बाइज्जत वहां की रीति-रिवाज के साथ दफना दी गई थी, लेकिन इस हॉल में खड़े तमाशाबीनों के बीच उसकी कोई इज्जत नहीं थी। वहां पर होड़ लगी थी उसके बारे में जानने की उससे मिले आभूषणों को खरीदने की। उससे जुड़ी हुई वस्तुओं को खरीदने की। क्योंकि वे वस्तुएं लंदन के उच्च कुलीन गानों की शान बढ़ती थी, उनसे उनके समाज में उनकी इज्जत बढ़ जाती थी।
इस बीच उन्होंने एक सुझाव दिया कि उस ममी के कपाल का माप लिया जाए।
कपाल माप के माध्यम से यह साबित करना था कि प्राचीन मिस्रवासी वास्तव में कोकेशियान थे, न कि अप्रâीकी या ‘नीग्रो’ मूल के।
यह वह दौर था जब इंग्लैंड में ममियों के प्रति लोगों में गजब की दीवानगी छायी हुई थी।
ममी को खोलना १९वीं शताब्दी में इंग्लैंड में पैâले ‘इजिप्टोमेनिया’ का यह एक उदाहरण था। यूरोपीय लोग शेक्सपियर के समय से ही ममियों को दवा, रंगद्रव्य या ताबीज के रूप में उपयोग करने के लिए खरीदते रहे थे। बाद में नेपोलियन के युद्धों और इंग्लैंड के औपनिवेशिक विस्तार ने मिस्र के अतीत में एक नई दिलचस्पी पैदा कर दी थी।
इस हद तक कि ड्यूक ऑफ हैमिल्टन नेथॉमस पेटीग्रेव को उनकी मृत्यु के बाद अपनी लाश को ममी बनाने के लिए नियुक्त कर लिया। पेटीग्रेव ने १८५२ में ड्यूक को एक अनाम राजकुमारी के ताबूत में दफनाया।
ब्रिटिश हैमिल्टन, (जो अभी भी ताबूत में दफन है) और उनका नाम मैट कार्डिन के इनसाइक्लोपीडिया ऑफ ममियों (२०१४) में दर्ज है।

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