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कब जाएगी कातिल ‘ईडी’ सरकार … समय पर इलाज न मिलने से पेट में ही शिशु ने तोड़ा दम … आदिवासी मां की भी हुई मौत

धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई
पालघर जिले की मोखाड़ा तहसील में समय पर मां को इलाज न मिलने से दुनिया देखने से पहले ही शिशु ने पेट में ही दम तोड़ दिया, जबकि आदिवासी मां की भी चार दिनों के बाद मौत हो गई है। इस घटना को सुनने के बाद जहां लोगों के दिलों को झकझोर कर रख दिया है, वहीं इस कातिल ‘ईडी’ सरकार की कब नींद खुलती है, इस पर लोगों की निगाहें टिकी हैं। फिलहाल, दिखावे के लिए स्वास्थ्य विभाग की तरफ से जच्चा-बच्चा मौत मामले की जांच शुरू कर दी गई है।
मिली जानकारी के अनुसार, पालघर जिले के मोखाड़ा तहसील से १५-२० किमी अंतर पर स्थित देवबांध से सटे आडोसी गांव (गणेशवाड़ी) में रूपाली भाऊ रोज (२५) नामक गर्भवती महिला का आठवां महीना शुरू था। इसी बीच १३ जनवरी को उसके पेट में दर्द शुरू होने के बाद उसे खोडाला प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने जांच करने के बाद कहा कि अभी प्रसूति में समय है। ऐसे में एक दिन स्वास्थ्य केंद्र में रखकर महिला को घर भेज दिया। दो दिन बाद १५ जनवरी को फिर से महिला की तबीयत खराब होने लगी। इसके बाद परिजन उसे खोडाला से मोखाड़ा के ग्रामीण अस्पताल में ले जाकर भर्ती करा दिया। अस्पताल में जांच के बाद पता चला कि युवती के पेट में ही उसके बच्चे की मौत हो गई है। इसके साथ ही यह भी पता चला कि महिला भी कई अन्य बीमारियों की चपेट में आ गई है। उसकी स्थिति को देखते हुए मोखाड़ा ग्रामीण अस्पताल के चिकित्सा अधिकारी ने बिना देर किए महिला को नासिक के सिविल अस्पताल में भेज दिया। वहां सर्जरी करने के बाद मृत शिशु को महिला के पेट से बाहर निकाल दिया गया। इसके बाद इलाज के दौरान महिला ने भी १९ जनवरी को अस्पताल में दम तोड़ दिया।
मौत के लिए जिम्मेदार है
खोडाला की स्वास्थ्य व्यवस्था
मृतक महिला के पति भाऊ रोज का आरोप है कि इस मौत के लिए खोडाला की स्वास्थ्य व्यवस्था जिम्मेदार है। दूसरी तरफ जिला स्वास्थ्य अधिकारी संतोष चौधरी का कहना है कि खोडाला में हुई घटना की जांच जारी है। यहां जांच कर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए हैं। इसके अलावा महिला की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद यदि इस मामले में कोई दोषी पाया गया तो संबंधित के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी।
साल २०२२-२३ में २०० से अधिक बच्चों और १० से ज्यादा मातृ मृत्यु के मामले सामने आए है। इनमें से अधिकांश बच्चों की मौत जव्हार, डहाणू, मोखाड़ा और विक्रमगढ़ तहसीलों में हुई है। कई बच्चों की मौत तो सिर्फ इसलिए हो गई कि गांव तक सड़कें नहीं थीं। ऐसे में महिलाओं और बच्चों को डोलियों के सहारे नदी-नाले से उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा।

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