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महंगाई पर मुंह कब खोलोगे?

केंद्रीय वित्तमंत्री को हमारे देश की महंगाई ‘अधिक’ नहीं लगती होगी, फिर भी वर्तमान में देश में महंगाई ८ वर्षों के उच्चांक पर पहुंच गई है। ऐसा उनकी ही सरकार ने कहा है। केंद्र सरकार के सांख्यिकी विभाग ने गुरुवार को जो आंकड़े जारी किए हैं, उसके अनुसार अप्रैल में महंगाई ने ७.७ फीसदी का रिकॉर्ड स्तर छू लिया है। मार्च महीने में भी यह दर १७ महीने में सर्वोच्च ही थी। जनवरी महीने से ही यह दर ६ फीसदी के नीचे नहीं आई है। अप्रैल लगातार चौथा महीना है जब महंगाई रिजर्व बैंक द्वारा लगाई गई ६ फीसदी की सीमा पार पहुंच गई है। महंगाई नियंत्रण के बाहर होने की वजह से ही रिजर्व बैंक के गवर्नर डॉ. शशिकांत दास ने हाल ही में आपातकालीन बैठक बुलाकर रेपो दर में ०.४० फीसदी की वृद्धि करने का निर्णय लिया। हालात इतने गंभीर होने के बाद भी केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन ने कुछ दिन पहले अमेरिका में रहने के दौरान महंगाई की ६.९ फीसदी दर बहुत ज्यादा नहीं है, ऐसा कहा था। तो अब यह दर और कितनी बढ़नी चाहिए, मतलब केंद्र सरकार को वह वास्तविक महंगाई लगेगी? मूलत: अब जो महंगाई की आग भड़की है उसके लिए जिस तरह से र्इंधन दर वृद्धि जिम्मेदार है, उसी तरह अनाज व खाद्य तेलों की कीमतों में वृद्धि भी जिम्मेदार है। र्इंधन की दर सौ के पार, घरेलू रसोई गैस हजार की चौखट पर पहुंच गई है। उस पर दाल की कीमत भी किलो के पीछे २० से ३६ रुपए तक बढ़ गई है। चना दाल को छोड़ दें तो सभी दालों ने किलो के लिए १२० रुपए का स्तर छू लिया है। खुदरा बाजार में दालों की यह दर वृद्धि सीधे ४० से ४५ फीसदी तक बढ़ी है, ऐसी भयंकर अवस्था है। इस महंगाई को नियंत्रण में लाने के लिए उपाय मतलब रेपो दर में वृद्धि की ओर देखा जा रहा होगा तो उसका भी दुष्परिणाम ही होगा। इससे कर्ज तो महंगा होगा ही साथ-साथ कर्ज की मांग भी कम हो सकती है अथवा कर्ज वसूली प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा कर्ज महंगा होने से बड़े उद्योगों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा। इससे उत्पादन और सेवा महंगी होगी तथा ग्राहकों की क्रय शक्ति कम होगी। इसलिए कोरोना के बाद पटरी पर आ रही अर्थव्यवस्था के पहियों के एक बार फिर धीमे पड़ने का खतरा है। हमारी अर्थव्यवस्था किस तरह से रफ्तार से दौड़ रही है ये दिखाने के लिए जीएसटी वसूली का रिकॉर्ड आंकड़ा सरकार की ओर से फेंका जा रहा है। परंतु महंगाई के उच्चांक का क्या? उस पर अब रुपया भी अचानक फिसल गया है। उसका भी दुष्परिणाम अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार पर होगा यह स्पष्ट है। मतलब यहां आम लोगों का बजट भी गड़बड़ाएगा और वहां देश की अर्थव्यवस्था भी उसी मार्ग पर है। हमारा देश अब आम इंसान एक अजीब दुविधा में फिलहाल फंस गया है। पहले नोटबंदी, बाद में जीएसटी, फिर कोरोना और अब महंगाई ऐसे झटके लगातार लग रहे हैं। आमदनी सीमित और महंगाई असीमित ऐसी अड़चनों में आम इंसान का दम घुटने लगा है। रुपए में रिकॉर्ड गिरावट और महंगाई का उच्चांक ऐसे दलदल में देश की अर्थव्यवस्था फंस गई है। उस पर मार्ग निकालने की बजाय गलत राष्ट्रवाद और धर्मवाद का भोंगा बजाया जा रहा है। धार्मिक तनाव एवं ध्रुवीकरण की मदहोशी में जनता को धकेलने की कारस्तानी चल रही है। इधर तमाम विषयों पर मुंह उठाकर बोलनेवाले सत्ताधारी महंगाई के उच्चांक पर सुविधाजनक मौन रख रहे हैं। महंगाई पर मुंह कब खोलेगे पहले ये बताओ! या दर वृद्धि के लिए रूस-यूक्रेन की ओर जिस तरह से उंगली दिखाए थे, उसी तरह अब अमेरिका में भी महंगाई ने ४० वर्षों का सर्वोच्च स्तर पार कर लिया है। ऐसे कुतर्क से जिम्मेदारी से पल्ला झाड़नेवाले हो तथा आम इंसान को महंगाई के ‘मुसीबत’ में छोड़ देनेवाले हो?

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