मुख्यपृष्ठनए समाचारजीएसटी किधर जा रहा है जी!

जीएसटी किधर जा रहा है जी!

राज्यों का खजाना है खाली, राजस्व प्राप्तियों में भारी गिरावट, राज्यों के पूंजीगत व्यय में बड़ी कमी

करीब सवा छह साल से ज्यादा हो चुके हैं देश में जीएसटी को लागू हुए। आधी रात को जब इसे लागू किया गया था तो दावा यही किया गया था कि इससे टैक्स की वसूली ज्यादा होगी और केंद्र व राज्य सरकारों की हालत सुधरेगी। अब हर महीने खबर छप रही है कि जीएसटी वसूली का रिकॉर्ड टूटा। एक, सवा, डेढ़ से होते हुए अब महीने में जीएसटी वसूली का आंकड़ा पौने दो लाख करोड़ रुपए का आंकड़ा छूने लगा है। ऐसा लग रहा है मानों देश में खासी समृद्धि बहने लगी है। मगर यह सब तो ऊपरी दिखावा है। असलियत में राज्यों की अवस्था काफी दयनीय है। सारी मलाई केंद्र चट कर जा रहा है और राज्यों को मानो वह भीख में कुछ टुकड़े थमा दे रहा है। यही कारण है कि कई राज्य अपने पूंजीगत व्यय के लक्ष्य से काफी पीछे हैं, क्योंकि उनके पास पैसा ही नहीं है।

सरकार के आर्थिक व्यवहार पर नजर रखनेवाली संस्था ‘इकरा’ का कहना है कि राजस्व में गिरावट, चुनाव और कई अन्य कारणों से राज्य चालू वित्त वर्ष के लिए अपने पूंजीगत व्यय के लक्ष्य से चूक सकते हैं। इकरा रेटिंग्स की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर के अनुसार, राजस्व प्राप्तियों में भारी गिरावट से राज्य के पूंजीगत व्यय में बड़ी कमी आएगी। राज्यों का पूंजीगत व्यय वित्त वर्ष २०२३-२४ की पहली छमाही में रिकॉर्ड ३५ प्रतिशत तक बढ़ गया। नायर के अनुसार, अपने बजट अनुमानों को बनाए रखने के लिए २१ राज्यों को यह सुनिश्चित करना होगा कि दूसरी छमाही में पूंजीगत व्यय की दर २८ प्रतिशत पर बनी रहे। बिक्री कर संग्रह लक्ष्य में चूक, केंद्र से अनुदान में गिरावट और राज्य की उधार सीमा में एक कदम की गिरावट के बावजूद, १३ प्रमुख राज्यों का पूंजीगत व्यय पिछले वर्ष की तुलना में वित्त वर्ष २०२४ में २९ फीसदी बढ़कर ६.२ लाख करोड़ रुपए होने की उम्मीद है।

‘पूंजीगत निवेश के लिए राज्यों को विशेष सहायता योजना के लिए आवंटन में वृद्धि के माध्यम से केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों को दिए गए समर्थन से पूंजीगत व्यय में प्रत्याशित वृद्धि का लाभ मिलता है। अगले साल लोकसभा का चुनाव है। ऐसे में आम चुनाव से पहले मार्च तिमाही में आदर्श आचार संहिता के प्रभावी होने की संभावना है। पूंजीगत व्यय तथा अन्य व्यापक आंकड़ों की उपलब्धता के आधार पर २१ राज्यों का विश्लेषण किया गया। इन २१ राज्यों का संयुक्त राजस्व और राजकोषीय घाटा अप्रैल-सितंबर के दौरान क्रमश: ७०,००० करोड़ रुपए और ३.५ लाख करोड़ रुपए तक बढ़ा है।

एक रिपोर्ट के अनुसार, देश के ज्यादातर राज्यों की वित्तीय सेहत मजबूत नहीं है। इसमें से ११ राज्य तो बीते ८ वर्षों से लगातार राजस्व घाटे का सामना कर रहे हैं। यानी उनके पास वेतन, पेंशन और ब्याज चुकाने जैसे कामों के लिए भी पर्याप्त राजस्व इकट्ठा नहीं हो पा रहा है। इस तंगहाली की एक वजह ये है कि राज्यों के खुद के टैक्स कलेक्शन में जीएसटी की हिस्सेदारी ४३ फीसदी है। लेकिन यह राज्यों को उम्मीद के मुताबिक राजस्व नहीं दे पा रही है। ज्यादातर राज्यों में एसजीएसटी से मिलने वाला राजस्व जीएसटी की शुरुआत में उन्हें मिली गारंटीड आय से कम है। जीएसटी क्षतिपूर्ति अनुदान पिछले साल ही समाप्त हो गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्यों के लिए जीएसटी मुआवजा जून २०२२ में समाप्त हो गया, लेकिन २६ राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में एसजीएसटी राजस्व प्री-जीएसटी अवधि और गारंटीकृत राजस्व दोनों से कम बना हुआ है। नॉर्थ-ईस्ट के पांच राज्यों के अलावा सभी राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश इसमें शामिल हैं। इधर, केंद्र सरकार ने पिछले साल ऑफ-बजट कर्जों को भी राज्य सरकार की उधार सीमा में शामिल कर दिया है। इससे राज्यों के पास कर्ज लेने का ज्यादा गुंजाइश नहीं बची है।

असलियत में राज्यों की अवस्था काफी दयनीय है। सारी मलाई केंद्र चट कर जा रहा है और राज्यों को मानो वह भीख में कुछ टुकड़े थमा दे रहा है। यही कारण है कि कई राज्य अपने पूंजीगत व्यय के लक्ष्य से काफी पीछे हैं, क्योंकि उनके पास पैसा ही नहीं है।’

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