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साहित्य शलाका: कौन तुम मेरे हृदय में?

डाॅ. दयानंद तिवारी। महादेवी वर्मा का जन्म होलिका दहन के दिन २६ मार्च १९०७ को उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में हुआ था। लगभग २०० वर्षों के सात पीढ़ियों के बाद जन्मी कुल की इस लक्ष्मी को प्रसन्न मन से महादेवी नाम दिया गया। आधुनिक हिंदी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक होने के कारण उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है। कवि निराला ने उन्हें ‘हिंदी के विशाल मंदिर की सरस्वती’ भी कहा है। महादेवी ने स्वतंत्रता के पहले का भारत भी देखा और उसके बाद का भी। वे उन कवियों में से एक हैं, जिन्होंने व्यापक समाज में काम करते हुए भारत के भीतर विद्यमान हाहाकार, रुदन को देखा, परखा और करुण होकर अंधकार को दूर करने वाली दृष्टि देने की कोशिश की। उनके सामाजसुधार के कार्य और महिलाओं के प्रति चेतना भावना भी इस दृष्टि से प्रभावित रही। उन्होंने मन की पीड़ा को इतने स्नेह और शृंगार से सजाया कि दीपशिखा में वह जन-जन की पीड़ा के रूप में स्थापित हुई।
कौन तुम मेरे हृदय में?
कौन मेरी कसक में नित,
मधुरता भरता अलक्षित,
कौन प्यासे लोचनों में,
घुमड़ घिर झरता अपरिचित,
स्वर्ण सपनों का चितेरा,
नींद के सूने निलय में,
कौन तुम मेरे हृदय में?
अनुसरण निःश्वास मेरे,
कर रहे किसका निरंतर,
चूमने पदचिन्ह किसके,
लौटते यह श्वास फिर फिर,
कौन बंदी कर मुझे अब,
बंध गया अपनी विजय में,
कौन तुम मेरे हृदय में?
उनकी कविता में प्रेम की पीर और भावों की तीव्रता वर्तमान होने के कारण भाव, भाषा और संगीत की जैसी त्रिवेणी उनके गीतों में प्रवाहित होती है वैसी अन्यत्र दुर्लभ है।
अश्रु यह पानी नहीं है
यह न समझो देव पूजा के सजीले उपकरण ये,
यह न मानो अमरता से मांगने आए शरण ये,
स्वाति को खोजा नहीं है औ’ न सीपी को पुकारा,
मेघ से मांगा न जल, इनको न भाया सिंधु खारा!
शुभ्र मानस से छलक आए तरल ये ज्वाल मोती,
प्राण की निधियां अमोलक बेचने का धन नहीं है।
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है।
महादेवी के गीतों की वेदना, प्रणयानुभूति, करुणा और रहस्यवाद काव्यानुरागियों को भी आकर्षित करते हैं। उनकी रचनाओं की विरोधी आलोचनाएं हमेशा सामान्य पाठक को दिग्भ्रमित करती हैं। आलोचकों का एक वर्ग वह है, जो यह मानकर चलते हैं कि महादेवी का काव्य नितान्त वैयक्तिक है। उनकी पीड़ा, वेदना, करुणा, कृत्रिम और बनावटी है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे मूर्धन्य आलोचकों ने उनकी वेदना और अनुभूतियों की सच्चाई पर प्रश्न चिह्न लगाया है। दूसरी ओर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे समीक्षक उनके काव्य को समष्टि परक मानते रहे हैं।
महादेवी वर्मा के आठ कविता संग्रह हैं-
१. नीहार (१९३०), २. रश्मि (१९३२), ३. नीरजा (१९३४), ४. सांध्यगीत (१९३६), ५. दीपशिखा (१९४२), ६. सप्तपर्णा (अनूदित १९५९), ७. प्रथम आयाम (१९७४) और ८. अग्निरेखा (१९९०)। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे काव्य संकलन भी प्रकाशित हैं, जिनमें उपर्युक्त रचनाओं में से चुने हुए गीत संकलित किए गए हैं, जैसे १. आत्मिका, २. धनु, निरंतरा, ३.परिक्रमा, ४. सन्धिनी (१९६५), ५. यामा (१९३६), ६. गीतपर्व, ७. दीपगीत, ८. स्मारिका, ९. हिमालय (१९६३) और १०. आधुनिक कवि महादेवी आदि।
शोमेर ने ‘दीप’ (नीहार), मधुर-मधुर मेरे दीपक जल (नीरजा) और मोम-सा तन गल चुका है। कविताओं को उद्धृत करते हुए निष्कर्ष निकाला है कि ये कविताएं महादेवी के ‘आत्मभक्षी दीप’ अभिप्राय को ही व्याख्यायित नहीं करतीं, बल्कि उनकी कविता की सामान्य मुद्रा और बुनावट का प्रतिनिधि रूप भी मानी जा सकती हैं।
यह मेरा मिटने का अधिकार
वे मुस्काते फूल नहीं,
जिनको आता है मुरझाना,
वे तारों के दीप नहीं,
जिनको भाता है बुझ जाना;
वे नीलम के मेघ नहीं,
जिनको है घुल जाने की चाह,
वह अनंत रितुराज नहीं,
जिसने देखि जाने की राह।
वे सूने से नयन नहीं,
जिनमें बनते आंसू मोती,
वह प्राणों की सेज नहीं,
जिनमें बेसुध पीड़ा सोती,
ऐसा तेरा लोक वेदना नहीं,
नहीं जिसमें अवसाद,
जलना जाना नहीं,
नहीं जिसने जाना मिटने का स्वाद।
हिंदी गद्यविधा में भी महादेवी जी का वर्चस्व बना रहा। स्मृति की रेखाएं और अतीत के चलचित्र में निरंतर जिज्ञासा शील महादेवी ने स्मृति के आधार पर अमिट रेखाओं द्वारा अत्यंत सहृदयतापूर्वक जीवन के विविध रूपों को चित्रित कर उन पात्रों को अमर कर दिया है। इनमें गांव, गंवई के निर्धन, विपन्न लोग, बालविधवाओं, विमाताओं, पुनर्विवाहिताओं तथा कथित भ्रष्टाओं और वृद्ध-विवाह के कारण प्रताड़िताओं के अत्यंत सशक्त एवं करुण चित्र है। उनके इन रेखाचित्रों में गंभीर लोक का भी पर्याप्त समावेश हुआ है।
अब यह चिड़िया कहां रहेगी?
आंधी आई जोर शोर से,
डालें टूटी हैं झकोर से,
उड़ा घोंसला अंडे फूटे,
किससे दुख की बात कहेगी,
अब यह चिड़िया कहां रहेगी?
हमने खोला आलमारी को,
बुला रहे हैं बेचारी को,
पर वो चीं-चीं कर्राती है,
घर में तो वो नहीं रहेगी!
अब यह चिड़िया कहां रहेगी?
घर में पेड़ कहां से लाएं,
वैâसे यह घोंसला बनाएं,
वैâसे फूटे अंडे जोड़े,
किससे यह सब बात कहेगी!
अब यह चिड़िया कहां रहेगी?
छायावाद से संबंधित उनकी शास्त्र मीमांसा के विषय में कई आलोचकों का मानना है कि महादेवी ने वैदुष्य युक्त तार्किकता और उदाहरणों के द्वारा छायावाद और रहस्यवाद के वस्तु शिल्प की पूर्ववर्ती काव्य से भिन्नता तथा विशिष्टता ही नहीं बताई, यह भी बताया कि वह किन अर्थों में मानवीय संवेदन के बदलाव और अभिव्यक्ति के नए पन का काव्य है। उन्होंने किसी पर भाव साम्य, भावोपहरण आदि का आरोप नहीं लगाया केवल छायावाद के स्वभाव, चरित्र, स्वरूप और विशिष्टता का वर्णन किया है। जो लोग उन्हें पीड़ा और निराशा की कवयित्री मानते हैं वे यह नहीं जानते कि उस पीड़ा में कितनी आग है जो जीवन के सत्य को उजागर करती है।
यह सच है कि महादेवी का काव्य संसार छायावाद की परिधि में आता है, पर उनके काव्य को उनके युग से एकदम असम्पृक्त करके देखना, उनके साथ अन्याय करना होगा। महादेवी एक सजग रचनाकार हैं। बंगाल के अकाल के समय १९४३ में इन्होंने एक काव्य संकलन प्रकाशित किया था और बंगाल से संबंधित ‘बंग भू शत वंदना’ नामक कविता भी लिखी थी। इसी प्रकार चीन के आक्रमण के प्रतिवाद में हिमालय नामक काव्य संग्रह का संपादन किया था। यह संकलन उनके युगबोध का प्रमाण है। गद्य साहित्य के क्षेत्र में भी उन्होंने बहुत काम किया है। उनका आलोचना साहित्य उनके काव्य की भांति ही महत्वपूर्ण है। उनके संस्मरण भारतीय जीवन के संस्मरण चित्र हैं। उन्होंने चित्रकला का काम अधिक नहीं किया फिर भी जलरंगों में ‘वॉश’ शैली से बनाए गए उनके चित्र धुंधले रंगों और लयपूर्ण रेखाओं के कारण कला के सुंदर नमूने समझे जाते हैं। उनके अपने कविता संग्रहों यामा और दीपशिखा में उनके रंगीन चित्रों और रेखांकनों को देखा जा सकता है। (क्रमश:)

(लेखक श्री जेजेटी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर व
सुप्रसिद्ध शिक्षाविद् और साहित्यकार हैं।)

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