" /> रसोई में सऊदी की आग! जिम्मेदार कौन?

रसोई में सऊदी की आग! जिम्मेदार कौन?

पिछले ५-७ वर्षों के कार्यकाल के दौरान दिल्ली के सरकारी हलकों से जो खबरें बार-बार आती रही हैं उनके आधार पर हिंदुस्थान ने मध्य-पूर्व के देशों से अपने रिश्ते मजबूत किए हैं। ये रिश्ते ‘सच्ची’ मित्रता के हैं। खासकर इस्लामी देशों के अगुवा सऊदी अरब से। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सऊदी राजघराने के बीच संबंध घनिष्ठ हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों में भी सऊदी अरब को सहयोग करना प्राथमिकता में शुमार है। लिहाजा, हम कभी सऊदी को सैन्य प्रशिक्षण देते हैं तो कभी ऑइल स्टेबिलिटी के गुर सिखाते हैं। इधर, अमेरिका में भी सऊदी के प्रति सख्त रुख वाली बाइडन सरकार आने के बाद से सऊदी के लिए भी हिंदुस्थान का सहयोग अहम हो गया है। कुल मिलाकर, हमने सऊदी के साथ सहयोग के तमाम समझौते और परियोजनाएं शुरू कर रखी हैं। ताकि सऊदी में स्थिरता बनी रहे और दुनिया में ऑइल स्टेबिलिटी बरकरार रहे। बदले में सऊदी ने हमें क्या दिया है? तो जवाब है सिर्फ महंगाई! ऐसे में सवाल यह है कि क्या यह हमारी ‘विकासशील’ कूटनीति की हार तो नहीं है?

पिछले १० महीनों के दौरान कच्चे तेल की कीमतों ने आसमान छुआ है और इसका सबसे ज्यादा खामियाजा हिंदुस्थान ने ही भुगता है और इस खामियाजे का जिम्मेदार है हिंदुस्थान का मित्र देश सऊदी अरब। अफसोस इस बात का नहीं है कि हमारे सबसे अहम मित्र देश सऊदी, जिससे हम वर्तमान में सर्वाधिक तेल आयात करते हैं, हमें महंगे में तेल दे रहा है, बल्कि अफसोस तो इस बात का है कि बुरे वक्त में जिसे हमने संभाला वो वादाखिलाफी करके न तो खुद हमें सस्ता तेल दे रहा है, न ही दूसरों को ऐसा करने दे रहा है। मई २०२० में कच्चा तेल २० डॉलर प्रति बैरल था, जो एक समय १० डॉलर के करीब भी पहुंच चुका था परंतु आज वही ६५ से ७० डॉलर के बीच चल रहा है। इसी से पेट्रोल और डीजल की कीमतें प्रभावित हो रही हैं। वहीं, एलपीजी में इस्तेमाल होनेवाली प्रोपेन की कीमतों में इस माह २० डॉलर की वृद्धि हुई है, जो अब ६२५ डॉलर प्रति मेट्रिक टन की कीमत पर है। इस तरह एलपीजी की दूसरी गैस ब्यूटेन की कीमत भी १० डॉलर की वृद्धि के साथ ५९५ डॉलर प्रति मीट्रिक टन पर आ गई है। १० महीने पहले यही प्रोपेन २३० डॉलर तो ब्यूटेन २४० डॉलर प्रति मीट्रिक टन की कीमत पर बिक रही थी और यह अधिकांशत: हमें सऊदी अरब से निर्यात हो रही थी। दरअसल, मई २०२० के दौरान कच्चा तेल १९-२० डॉलर प्रति बैरल के आसपास इसलिए था क्योंकि तब वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की मांग बेहद कमजोर थी, लिहाजा तमाम देश सऊदी से कच्चा तेल खरीद ही नहीं रहे थे। सऊदी के सामने तब अपनी तेल उत्पादन की न्यूनतम क्षमता बनाए रखने में भी दिक्कतें पेश आ रही थीं। उस दौर में हिंदुस्थान ने आगे आकर सऊदी से करीब १७ मिलियन बैरल तेल खरीदा और उसे इस संकट से उबारा। वहां की अर्थव्यवस्था कमजोर न हो और दुनियाभर में आइल स्टेबिलिटी बनी रहे इसके लिए हिंदुस्थान ने, न केवल सऊदी बल्कि यूएई जैसे देशों से तेल खरीदकर उन्हें सहारा दिया और कोरोना की विकट परिस्थिति में भी तेल खरीद जारी रखी। ऐसे वक्त में जब हमें खुद निवेश को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता थी हमने अपनी भंडारण क्षमता का अत्यधिक इस्तेमाल करके तेल उत्पादक देशों से १६.१७ मिलियन बैरल तेल खरीदा। साथ ही अन्य बड़े तेल उत्पादक देशों से भी ऐसा करने की अपील की, ताकि सऊदी जैसे बड़े तेल निर्यातक देश को सहारा मिल सके और भविष्य में दुनिया के सामने तेल की क्राइसिस न खड़ी हो जाए। नि:संदेह सस्ते तेल खरीद में भारत का भी हित था पर भारत से ज्यादा उसे बेचना सऊदी की जरूरत थी। उसका उत्पादन था और भंडारण क्षमता लगभग खत्म। सऊदी की इस परेशानी को भांपकर हिंदुस्थान ने बाकायदा ग्रुप-२० सम्मेलन में सऊदी का पक्ष लेते हुए उसे खुलकर साथ दिया। तब ग्रुप-२० के उस सम्मेलन में सऊदी ने हिंदुस्थान के सहयोग की प्रशंसा करते हुए यह भरोसा दिलाया था कि फिलहाल तेल की मांग कम होने की वजह से ओपेक तेल का कम उत्पादन करेंगे और जैसे ही मांग बढ़ेगी तो उत्पादन फिर बढ़ा दिया जाएगा, ताकि तेल की कीमतों में इजाफा न हो और दुनिया में ऑइल स्टेबिलिटी बनी रहे। परंतु कोरोना वैक्सीन आने के बाद जैसे ही स्थिति बदली, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल की मांग बढ़ी तो सऊदी अपने वादे से मुकर गया। बल्कि उसके दबाव में ओपेक देशों ने भी तेल का उत्पादन नहीं बढ़ाया। सऊदी के नेतृत्व में ओपेक देशों ने ग्रुप-२० में जो भरोसा दिलाया था, उसे तोड़ दिया और हिंदुस्थान के याद दिलाने के बावजूद उन्होंने तेल के उत्पादन को कम रखकर बाजार में कीमतों का उछाल बनाए रखा। जिसका सबसे ज्यादा खामियाजा आज भारत को ही भुगतना पड़ रहा है। हमने जरूरत के वक्त अपनी प्राथमिकताओं को दरकिनार कर सऊदी को सहारा दिया था और उसने वक्त बदलते ही लालचवश हमें महंगाई की आग में झोंक दिया। गरीब, मध्यमवर्गीय लोगों की रसोई में आग लगा दी। तेल की कीमतों को कृत्रिम तौर पर ऊपर चढ़ने दिया। लिहाजा आज हालात ये हैं कि हिंदुस्थान में पेट्रोल-डीजल १०० का आंकड़ा पार करने को हैं तो घरेलू गैस पिछले १० महीनों में प्रति सिलिंडर ४१ फीसदी की दर से बढ़ चुकी है, जबकि २०१४ से अब तक के ७ सालों में इसकी कीमत लगभग दोगुनी हो गई है।
हिंदुस्थान जैसे घनी आबादी वाले मध्यमवर्गीय विकासशील देश में एलपीजी सिलिंडरों की कीमत बढ़ने के क्या मायने हैं यह विस्तार से समझाने की आवश्यकता नहीं है। इस मामले की गंभीरता को सिर्फ इसी बात से समझा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र की महिलाएं तक सड़कों पर उतरकर जब उज्वला योजना के मुफ्त में मिले एलपीजी सिलिंडर लौटाने लगें तो मामला किस हद तक बिगड़ चुका है उसे सहज ही समझा जा सकता है। आज हालात यह है कि हिंदुस्थान के लगभग ९५ प्रतिशत परिवार रसोई के सस्ते र्इंधन यानी एलपीजी पर आश्रित हैं। २०१४-१५ में ऐसे परिवारों की संख्या जहां १४.८ करोड़ थी, तो आज वो लगभग दोगुनी मतलब २८.८ करोड़ तक पहुंच चुकी है। इसके पीछे बाजारवाद के तमाम कारणों के अलावा सरकारी प्रयास भी हैं। परंतु सरकार ने जहां चतुराई से ७ वर्षों में एलपीजी कनेक्शनों की संख्या दोगुनी की तो इस मद में मिलनेवाली सब्सिडी एक चौथाई ही कर डाली। गत ३ वर्षों के आंकड़ों को देख लीजिए तो पता चलेगा कि २०१९-२० में सरकार एलपीजी पर ३५,६०५ करोड़ की सब्सिडी देती थी, जो अगले वित्त वर्ष २०२०-२१ में घटाकर २५,५२० करोड़ कर दी गई, जबकि इस वर्ष, २०२१-२२ के प्रस्तावित बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने तो इसे आधा करके १२,४८० करोड़ ही कर दिया। यदि एलपीजी कनेक्शन देना सरकार जरूरी समझती है तो उन्हें किफायती गैस मिलती रहे, ये सुनिश्चित करना भी उसी का कर्तव्य है। तभी जनता का भविष्य ‘उज्जवल’ कहलाएगा वरना उनके गुस्से का सिलिंडर फटे बिना नहीं रहेगा। आज हालात यह है कि राजधानी दिल्ली में जो एलपीजी सिलिंडर मई, २०२० में ५८१ रुपए का मिल रहा था वो १० महीने बाद २३८ रुपए की वृद्धि के साथ आज ८१९ रुपए में मिल रहा है। केंद्र में भाजपा नित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार आने से पूर्व मार्च, २०१४ में एलपीजी के इसी सिलिंडर की कीमत ४१० रुपए थी, जो आज तकरीबन दोगुनी हो चुकी है।

आज सऊदी, भारत को सलाह दे रहा है कि उनसे खरीदकर जिस तेल का हमने भंडारण कर रखा है, हम उसे इस्तेमाल करें क्योंकि वो तेल का फिलहाल उत्पादन नहीं बढ़ाएगा। जानकार मान रहे हैं कि सऊदी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को ८० से ९० डॉलर के बीच देखना चाहता है। इसका अर्थ यह है कि तब भारत में पेट्रोल १२० से १३० रुपए प्रति लीटर होगा, तो घरेलू गैस १००० से १,१०० रुपए प्रति सिलिंडर। लिहाजा, अब हमें भी अपना रास्ता चुन लेना चाहिए। रसोई गैस की कीमतों पर काबू रखने के लिए फौरी राहत के तौर पर एलपीजी पर सब्सिडी बढ़ाने के साथ-साथ ईरान और वेनेजुएला जैसे देशों से तेल व गैस की बड़ी खरीद के रास्ते खोलने होंगे। चाहे फिर हमारे इस कदम से अमेरिका खुश हो या नाराज। वैसे अमेरिका की जो बाइडन सरकार इस पर सख्त रुख अपनाएगी, ऐसा नहीं लगता। बाइडन सऊदी की नीतियों के समर्थक नहीं हैं। यदि ऐसा न होता तो बाइडन के आते ही सऊदी पर तमाम प्रतिबंध न लगते, जमाल खशोगी हत्याकांड के मसले पर सऊदी राज परिवार की अमेरिका प्रवेश बंदी न होती। सऊदी की रिफाइनरी पर ‘होती विद्रोहियों’ के हमले के बाद नरम रुख न अपनाया होता। लिहाजा, भारत को जो बाइडन के सऊदी पर सख्त और ईरान पर नर्म रुख का लाभ उठाना चाहिए। अन्यथा घर-घर की रसोई में चूल्हे की आग फूंकती महिलाओं का भी सरकार से विश्वास उठ जाएगा।