मुख्यपृष्ठसंपादकीयभगवान का बाप कौन?

भगवान का बाप कौन?

मुझे शिखा, जनेऊ, सिर्फ घंटा बजानेवाला हिंदुत्व नहीं चाहिए, ऐसा हिंदृहृदयसम्राट शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे हमेशा कहते थे। उनका हिंदुत्व विज्ञानवादी व प्रगतिशील था, परंतु आज राज्य में जो ठेकेदार निर्माण हुए हैं उनका हिंदुत्व लोगों में दंगे तथा मतभेद कराने का है। छत्रपति शिवाजी महाराज, छत्रपति संभाजी, महात्मा ज्योतिबा फुले, शाहू महाराज, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ये जन्म से हिंदू थे। संत गाडगे महाराज भी जन्म से और कर्म से हिंदू थे, परंतु उन्होंने हिंदू धर्म में रूढ़िवादिता, परंपराओं की आलोचना की। इसलिए हिंदू धर्म के दुश्मन ऐसा नहीं कहा जा सकता है। भारतीय जनता पार्टी व उसके नवहिंदुत्वादियों की भूमिका अलग है। श्री शरद पवार ने सातारा में भाषण दिया। उस पर भारतीय जनता पार्टी की ‘सोशल मीडिया’ वालों ने पवार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। दावा कर रहे हैं कि पवार ने हिंदू देवताओं के पिता को लेकर आपत्तिजनक बातें कहीं। पवार नास्तिक हैं व हिंदू विरोधी हैं। पवार ने जवाहर राठोड नामक कवि की एक कविता क्या पढ़ी और भाजपा के लोगों को मानो बिच्छू ने डंक मार दिया हो। पवार ने भाषण में कहा कि शैक्षणिक पार्श्वभूमि न होने के बावजूद उपेक्षित समाज के बच्चे अच्छा लिखते थे। जवाहर राठोड नामक दिवंगत कवि को उन्होंने याद किया व उनकी ‘पाथरवट’ कविता पढ़ी। ‘पाथरवट’ कविता में कवि कहता है, ‘हम पाथरवट निर्माण करते हैं। चक्की के पाट, जिस पाट ने आपको आटा और रोटी दी। परंतु हम अनाज के दाने के लिए प्रतिदिन सिर्फ चक्की चलाते हैं। दूसरा और क्या, तो यह हमारा दुर्भाग्य है। हमारे ही द्वारा निर्मित जांत में हम ही पीसे जाते हैं। आपके ब्रह्मा, विष्णु, महेश, लक्ष्मी और सरस्वती को हमने ही आकार दिया। अब आप ही सच बताओ ब्रह्मदेव हमारा निर्माता या हम ब्रह्मदेवता के पिता?’ इसलिए हम पर होनेवाला अन्याय सहन नहीं करेंगे, ऐसा जवाहर राठोड ने लिख रखा है, ऐसा पवार ने कहा। जवाहर की कविता विद्रोही है। समाज व्यवस्था के खिलाफ बगावत करनेवाली है। नामदेव ढसाल, अर्जुन डांगले, राजा ढाले ने जो मार्ग कविता में निर्माण किया उसी मार्ग से गुजरनेवाली यह जवाहर की ‘पाथरवट’ है। उसमें की एक बागी कविता पवार ने पढ़ी। पवार जैसे राजनीतिज्ञ आज भी पढ़ते हैं। भाजपा वालों को पढ़ाई से बैर है। वे पढ़ते नहीं हैं इसलिए बचते नहीं हैं। उनके सांस्कृतिक हिचकोले जारी हैं। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के चवदार तल्याच्या सत्याग्रह, नासिक का कालाराम मंदिर संघर्ष क्या था? कालाराम मंदिर की लड़ाई में साने गुरुजी भी थे। संत गाडगे महाराज ने समाज सुधार का झाड़ू महाराष्ट्र में चलाया। गाडगे बाबा का कीर्तन जिन्होंने सुना उन्हें जवाहर राठोड का दुख समझ में आएगा। उनका कीर्तन कर्मकांड नहीं था। पोथी नहीं, पुराण नहीं, देवों का वर्णन नहीं था, मूर्ति पूजा तो बिल्कुल भी नहीं थी। जिंदगी भर वे कभी किसी भी मंदिर में नहीं गए अथवा किसी भी मूर्ति के समक्ष उन्होंने अपना सिर नहीं झुकाया। ब्रह्मदेव के विविध अवयवों से चातुर्वण्य निर्माण हुआ। इस मासूम कल्पना पर ज्योतिबा फुले ने प्रहार किया। जहां ईश्वर का स्वरूप ही इंसान ने तय किया है, वहां इंसान का स्वरूप तय करनेवाले आप कौन हो? ऐसा तीखा सवाल ज्योतिबा ने पूछा। तब पुणे के कर्मकांडियों ने ज्योतिबा का जीना मुहाल कर दिया। उसी हिंदुत्व का समर्थन आज भाजपावाले करने का प्रयास कर रहे हैं और उन्हें देश में अलग तरह की तालिबानी व्यवस्था निर्माण करनी है। आम इंसानों को धर्म के उल्टे-सीधे विचारों में फंसाना व पेट की भूख को भूलने के लिए मजबूर करना, ऐसा प्रयोग फिलहाल चल रहा है। देश में मानसिक शांति बिगाड़नेवाली धर्म की राजनीति ये लोग करना चाहते हैं। लेखक-कवि क्या लिखें और कौन क्या पढ़े इस पर राजनीतिक सेंसरशिप लगाई जा रही होगी तो ‘पाथरवट’ का विद्रोह तेज करना होगा। देश को एक हजार वर्ष पीछे ले जाने का धार्मिक प्रयोग ही हिंदुत्व ऐसा जिन्हें लगता है उनके हाथ में देश के १३० करोड़ लोगों की स्वतंत्रता सुरक्षित नहीं है। ईश्वर का पिता नहीं होता, ऐसा हमेशा ही कहा जाता है। मूलत: इन तमाम कल्पनाओं की निर्मिती इंसानों द्वारा की गई है। अपनी कल्पनाशक्ति के अनुसार इंसानों ने ईश्वर को रूप दिया। उसके अनुसार मूर्ति बनाई, परंतु जिन्होंने उसे बनाया उन्हीं को बाद में ईश्वर का दर्शन करने से रोक दिया गया। ‘पाथरवट’ इस कविता में जवाहर राठोड ने यही दुख व्यक्त किया है। ‘हमने देवताओं को रूप दिया है, तब ब्रह्मदेव हमारे निर्माता या हम देवों के पिता?’ ऐसा सवाल कवि ने किया है। उसके पीछे की भावना को समझने की बजाय ‘ईश्वर का बाप कौन?’ ऐसी हाय-तौबा चल रही है और सातारा के एक कार्यक्रम में उस कविता को पढ़नेवाले शरद पवार की आलोचना की जा रही है। यह कविता मतलब मेहनतकशों की व्यथा है। देश का मजदूर शोषित, दुर्बल-दीनों की व्यथा, आक्रोश है। भाजपा के हिंदुत्व में इन पीड़ितों के लिए स्थान नहीं है क्या? स्वतंत्रता संग्राम व महाराष्ट्र की लड़ाई इन्हीं मेहनतकश लोगों के कारण हम जीते इसे कैसे  भूला जा सकता है?

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