मुख्यपृष्ठस्तंभपूरे विश्व में किसान क्यों सड़कों पर, भारत अपवाद नहीं

पूरे विश्व में किसान क्यों सड़कों पर, भारत अपवाद नहीं

सुषमा गजापुरे

जनवरी २०२४ के महीने में यूरोप के कई देशों में हमने देखा कि किसान सड़कों पर हैं। जर्मनी, प्रâांस, बुल्गारिया, बेल्जियम, हंगरी, पोलैंड, स्पेन व कुछ अन्य देशों में किसान अपनी ट्रैक्टर-ट्रालियों को लेकर जब मुख्य नगरों की सड़कों पर आ गए तो सरकारें चौंकी। वो यकीन नहीं कर पार्इं कि किसान इतनी बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। शायद विश्वभर में कृषि के क्षेत्र में एक ज्वालामुखी अंदर ही अंदर उबल रहा था, पर सरकारें या तो उन्हें नजरअंदाज करती रहीं या फिर वो इस बात का अंदाजा ही नहीं लगा पार्इं कि इस असंतोष के पीछे के कारण बहुत बड़े हैं। भारत भी इसमें अपवाद नहीं रहा और सड़कों पर आते किसान शायद उस बात की गवाही दे रहे थे कि कृषि क्षेत्र में सब कुछ ठीक नहीं है। हकीकत ये है कि किसानों की समस्या को एक सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है।
आइए इस समस्या के कई आयामों को विस्तार से देखते हैं
१. किसान आंदोलनों का फैलाव कितना है: कृषि के क्षेत्र में पनपता असंतोष अब विश्व के कई देशों में देखा जा रहा है। किसानों की एक समस्या तो विश्वव्यापी है और वो है उनके फसल की सही कीमत का न मिलना। कृषि के क्षेत्र में जहां बीज, खाद, कीटनाशकों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई है, वहीं उनकी फसल को बाजार में वो कीमत नहीं मिल रही है, जिनकी उनको अपेक्षा है। यूरोप के कई देश और उनकी सरकारें इस समस्या से जूझ रही हैं। उदाहरण के तौर पर यूरोप के कई देशों के किसान यूक्रेन से आयात किए सस्ते अनाज पर घोर आपत्ति जता रहे हैं, क्योंकि उससे उनके द्वारा उत्पन्न अनाजों को बाजार में सही कीमत नहीं मिल पा रही है, जिसके कारण उनमें बेचैनी है। इसी प्रकार कई देशों के किसान लैटिन अमेरिका से सस्ते बीफ को आयात करते हैं, जिससे उन देशों के अपने बीफ को बाजार ही नहीं मिल पा रहा है। इन समस्याओं के अलावा बीज, खाद, कीटनाशकों और डीजल पर सब्सिडी में कटौती ने किसानों को सड़कों पर ला खड़ा किया है। जर्मनी, प्रâांस, बेल्जियम व अन्य देशों के किसान कई नगरों की सड़कों पर हैं, सड़कों पर खाद बिखेर दी गई है, हाईवे और पोर्ट जाने के रास्ते बाधित कर दिए गए हैं। सरकारें इस वजह से बेचैन हो उठी हैं और सभी प्रकार के सब्सिडी कट फिलहाल टाल दिए गए हैं।
२. यूरोप के कई देशों के किसान ग्रीन एनर्जी से संबंधित प्रतिबंधों पर आक्रोशित हैं: वर्ष २०५० तक यूरोपियन यूनियन द्वारा शून्य अथवा जीरो एमिशन पर जोर दिए जाने के कारण किसान खफा हैं। इन प्रतिबंधों के कारण नाइट्रोजन एमिशन में बड़ी कमी के वादे किसानों के लिए बड़ी समस्या लेकर आए हैं। किसान इस जीरो एमिशन के वादों के खिलाफ सड़कों पर हैं, क्योंकि अधिकांश सरकारों ने कीटनाशकों, नाइट्रोजन खाद पर सब्सिडी में भारी कटौती की है, जिससे किसान आक्रोशित हैं और सड़कों पर हैं। फिर सरकारों ने ये सभी सब्सिडी कट या तो टाल दिए हैं या फिर उन पर विस्तार से पुनर्विचार को मजबूर हो गए हैं।
३. यूरोपियन देशों ने किसानों के प्रति वहां की सरकारों का उत्तर क्या है: भारत में किसान आंदोलन को कुचलने के लिए जिस अति बल प्रयोग को देखा जा रहा है, वहीं यूरोपियन देशों में किसी भी सरकार ने न तो किसी किस्म के बैरिकेड लगाए हैं और न ही किसी प्रकार का बल प्रयोग किया। किसानों पर नजर रखी गई पर उनके आंदोलनों का कोई भी प्रतिरोध सरकारों की ओर से नहीं किया गया। ये उन देशों की लोकतांत्रिक प्रणालियों की बड़ी सफलता है। भारत में भाजपा की सरकारों ने जिस प्रकार बल प्रयोग किया व आंदोलन को कुचलने का प्रयास किया वो हर दृष्टि से निंदनीय है। भारत ने तानाशाही के हर आयाम को प्रदर्शित किया, जिससे हमारी पूरे विश्व में बदनामी हो रही है।
४. भारत के किसान क्यों सड़कों पर: भारत में कुछ वर्ष पहले जब किसान आंदोलन हुआ था तो वह करीब-करीब १ वर्ष तक चला था और मोदी सरकार ३ काले किसान बिलों को वापस लेने को मजबूर हो गई थी, पर उसके बाद वादे करने के बाद भी मोदी सरकार ने किसानों की मांगों के संदर्भ में कोई ठोस कदम नहीं उठाए। इन मांगों में न्यूनतम समर्थन मूल्य, मनरेगा में मिलनेवाली रकम में बढ़ोतरी, किसानों की कर्ज माफी और पेंशन जैसे मुद्दे हैं। सरकार किसी भी मुद्दे पर समझौते के पक्ष में नजर नहीं आती है और बल प्रयोग के द्वारा वो किसान आंदोलन को कुचल देना चाहती है। दमन के जो दृश्य भारत से बाहर जा रहे हैं वो किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए लज्जाजनक हैं। गाहे बगाहे सरकार को बातचीत के रास्ते निकालने होंगे, वरना कहीं ये आंदोलन हाथ से निकल गया और किसी भी प्रकार की हिंसा में परिवर्तित हुआ तो ये देश और किसानों के लिए एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी।
आनेवाला समय वास्तव में ही कठिन समय होगा। लोकसभा के चुनाव बिल्कुल सामने हैं और सभी राजनैतिक दल अपनी-अपनी शक्ति का प्रदर्शन करेंगे और किसी भी विपरीत परिस्थिति का फायदा भी उठाना चाहेंगे। सरकार को चाहिए कि वो किसानों के मुद्दे पर संवेदनशील बने और अपने पूर्व के कार्यकलापों की तरह हालात को बुलडोज करने के प्रयासों को त्याग दे। जरूरत है सरकार किसी भी किस्म की मांग को लोकतांत्रिक तरीके से सुलझाए और ये समझे कि लोकतंत्र में बातचीत और संवाद के अलावा और कोई रास्ता नहीं। किसी भी किस्म का अति बल प्रयोग स्थितियों को न केवल और बिगाड़ेगा, बल्कि देश में विद्वेष की स्थितियां भी पैदा करेगा। भारत में मोदी सरकार को यूरोप के देशों की सरकारों की नीति, रीति से सीखने की आवश्यकता है कि वो कैसे लोकतांत्रिक तरीके से मुद्दों को सुलझाने के प्रयास कर रहे हैं।
(लेखिका प्रसिद्ध चिंतक, शिक्षाविद और वरिष्ठ साहित्यकार हैं)

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