मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गांव: जोंहरी, धोख और गांव घरावल

काहें बिसरा गांव: जोंहरी, धोख और गांव घरावल

पंकज तिवारी

गांव घरावल बिल्कुल पगडंडियों की भांति जाते एक सर्पीले रास्ते के किनारे पर बसा था। पेड़-पौधे इतने थे कि किसी जंगल से जाने का भान होता था। गाय, भैंस, बर्धा हर दरवाजे की शोभा हुआ करते थे। सभी के गले में बड़ी-बड़ी घंटियां बंधी होती थी। लोग दिन-दिन भर खेतों में खट रहे होते थे। दो-चार लोग जुटकर अहरा जलाकर, भूंर्इं में गड्ढा खोदकर छीमी, गेहूं, जौ, कच्चा आम समय के हिसाब से खेतों के आसपास ही भूजते और बल भर खाकर मजा लेते थे। चना के समय तो सखी-सहेली मिलकर टोंके नून और मिरचा बांधकर घंटों चना खोंटकर खाती थीं। बथुआ खोंटकर घर लाती महिलाएं भी दिख जाती थीं। वापस आते तक हर घर के मोहारे पर दीया बर रहा होता था। दादी लोग भैंस दूहने में लगी होती थीं। भैंस आराम से मतवाली चाल में पाग्गुर करते मगन रहा करती थी। कभी-कभी जब लेरुआ नहीं होता था तो उसके मुंह के पास बैठकर चोकर या भूसी भी चलाना पड़ता था। बच्चों को रोज एक ही काम करने में बड़ा भारी लगता था।

लगभग हर घर से कोई-न-कोई अपने रहने का स्थान पाही पर ही बनाकर रखता था। दिन भर वहीं डेरा डाले बैठा रहता था। बस खाने भर को घर आया करता था। जोंहरी, बजड़ी में मजाल था कि एक भी चिड़िया बैठ जाए। उसे डराने हेतु लकड़ी में न्योहड़ को बांधकर, फटा काला कपड़ा पहनाकर, खेतों में धोख खड़ा कर दिया जाता था, संतुष्टि इतने से भी नहीं होती थी तब मचान पर बैठकर घंटों टाठी या कनस्तर बजाते हुए-
‘हुर्रा होरैया चकनाचूर,
अब जिनि आयऽ बापउ-पूत
अउबउ किहऽ तऽ चचा-भतीज
होर्रा.. होर्रा… होर्रऽऽऽ…’

चिल्ला-चिल्ला कर पक्षियों को भगाया जाता था। ढेलवांस भी मारकर चिड़ियों को भगाने का रिवाज था। फुर्रऽऽऽ… एक साथ पूरा झुंड उड़ता तो दूर किसी दूसरे खेत में जाकर बैठ जाता था। झूलन ददा सनई सिर पर लादे गड़हा में भिगोने चले गए थे। दो-तीन दिन बाद पानी में पीटकर घर लाए। सुखवाने के बाद संठा और सनई को अलग कर ढेरा से कातते हुए ददा सनई से खूब सूत बनाते थे। उसी सूत से खटिया की बिनाई होती थी। झूलन ददा के साथ और भी कई लोग थे जो सूत कातते थे। पीपल के पेड़ के नीचे सजी चौपाल भी गांव की शोभा होती थी। वहीं हरा-भरा शुद्ध हवा वाला एक बगीचा भी था, जहां बच्चे दिन भर चिल्होर पाती खेलने में मशगूल रहा करते थे। पढ़ाई बड़ी दूर की चीज थी उस समय। कोस भर दूर से पंडित जी यहां पढ़ाने आया करते थे। बच्चे पेड़ों के नीचे घर से लाए बोरों पर बैठते थे। शुरू-शुरू में तो ढूंढ़ने से भी बच्चे नहीं मिल रहे थे। समय के साथ बच्चों की संख्या बढ़ती गई। बगीचा के नीचे गांव वालों के सहयोग से छान भी बन गया। सब कुछ ठीक-ठाक से चल रहा था। बात परीक्षा तक आ पहुंची। बस एक बच्चे को छोड़ सभी खुशी-खुशी परीक्षा में शामिल हुए। कुछ ही देर बीता होगा कि पंडित जी कालू को ढूंढ़ने लगे पर वो तो नदारद था। तुरंत चार-पांच बच्चों का समूह कालू को ढूंढ़ने निकल पड़ा। घर छान लेने के बाद पता चला कि कालू तो वहां है ही नहीं। बहुत ढूंढ़ने पर पता चला कि वो तो भैंस चराने ताल में भाग गया है, जबकि भैंस चराने तो भकुना फूआ जाती थीं। मतवाली सेना बिना कालू के कहां लौटने वाली थी। बच्चे झूमते हुए ताल की तरफ बढ़ने लगे, जबकि उधर बेचारा कालू भैंस के ऊपर बैठकर अपने धुन में गाते हुए मगन था। अचानक उसकी निगाह अपने साथी मित्रों पर जा पड़ी। कालू कूदकर खरगोश की भांति भागा पर पलक झपकते ही दबोच लिया गया। चारों हाथ-पैर पकड़कर, लटकाते हुए बच्चे कालू को लिए पंडित जी के सामने पहुंच गए। कालू को मजबूरन परीक्षा में बैठना पड़ा। पंडित जी के माध्यम से ही बच्चे पढ़ना-लिखना सीख सके।

(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

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