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सत्ता में आते ही क्यों बढ़ जाता है चंदा? …चीफ जस्टिस का केंद्र सरकार से सवाल

• सुप्रीम कोर्ट में चुनावी बांड पर हो रही है सुनवाई

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
चुनावी बॉन्ड का मुद्दा पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है। चाल, चरित्र, चेहरा की बात करनेवाली तथा पारदर्शिता की डींग मारनेवाली केंद्र की मोदी सरकार और उसकी भारतीय जनता पार्टी की पोल खोलनेवाले विषय पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। इस दौरान चुनावी चंदे की जानकारी देने में आनाकानी कर रही केंद्र की मोदी सरकार से सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधाश धनंजय चंद्रचूड की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कई तीखे सवाल पूछे।
पांच राज्यों में इसी महीने (नवंबर में) होनेवाले विधानसभा चुनावों से पहले भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने अक्टूबर में कुल १,१४८.३८ करोड़ रुपए के चुनावी बॉन्ड बेचे। इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी चंदे से जुड़े मामले में सुनवाई के दौरान बीते मंगलवार (३१ अक्टूबर) को चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह चुनावी बॉन्ड के माध्यम से राजनीतिक दलों को मिले चंदे के विवरण की जांच करेगा।
बता दें कि २०१७ में एक वित्त विधेयक के जरिए चुनावी बॉन्ड के माध्यम से राजनीतिक दलों की गुमनाम फंडिंग की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने चुनाव आयोग से १२ अप्रैल २०१९ के शीर्ष अदालत के अंतरिम आदेश के अनुसार, राजनीतिक दलों के चुनावी बॉन्ड फंडिंग का विवरण तैयार रखने के लिए कहा है।
गौरतलब हो कि चुनावी बांड योजना को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की जा रही है। सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने बड़े सवाल खड़े किए हैं। सीजेआई ने कहा कि हम जानते हैं कि सत्तारूढ़ दल को अधिक दान मिलता है। यह व्यवस्था का हिस्सा है और यही चलन भी है।

मामले में पांच जजों की संविधान पीठ ने सवाल उठाए हैं। केंद्र सरकार से सवाल पूछते हुए कहा कि ये योजना पूरी तरह गोपनीय नहीं है। ये योजना चुनिंदा तौर पर गोपनीय है। जांच एजेंसियां एसबीआई से ब्यौरा ले सकती हैं। सत्ताधारी दल विपक्षियों के चंदे की जानकारी ले सकते हैं। लेकिन विपक्षी दल ये जानकारी नहीं ले सकते। केंद्र ये सुनिश्चित करेगा कि इस योजना में प्रोटेक्शन मनी या बदले में लेन-देन नहीं शामिल होगा। क्या ये कहना गलत होगा कि इस योजना से किकबैक को बढ़ावा मिलेगा या इसे वैध ठहराया जाएगा। सीजेआई ने कहा कि हम जानते हैं कि सत्तारूढ़ दल को अधिक दान मिलता है। यह व्यवस्था का हिस्सा है। हमें अभी भी लगता है कि बड़े दानकर्ता केवाईसी विवरण देने में सिर नहीं खपाएंगे। हम सरकार को समान खेल के मैदान, अधिक पारदर्शी योजना लाने से नहीं रोक रहे। ऐसा करना पूरी तरह विधायिका पर निर्भर है।
गौरतलब है कि चुनावी बांड योजना को असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की मांग एक याचिका के द्वारा की गई है। सुनवाई के दौरान चुनाव सुधार के लिए काम करने वाले एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि राजनीतिक दलों, लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था को मिलने वाली फंडिंग की पारदर्शिता पर उनके हानिकारक प्रभाव के बारे में चुनाव आयोग और भारतीय रिजर्व बैंक दोनों की चेतावनियों की अनदेखी करते हुए सरकार द्वारा चुनावी बॉन्ड जारी किए गए थे।
भूषण ने कहा, ‘चुनावी बॉन्ड ने विदेशी संस्थाओं, बड़ी संस्थाओं, अज्ञात संस्थाओं और बेनामी कंपनियों को शेल कंपनियों के माध्यम से बेहिसाब काले धन को आगे बढ़ाने की अनुमति देकर असीमित गुमनाम दान को वैध बना दिया है। चुनावी बॉन्ड के उद्भव के साथ अवैध धन को चुनावी प्रक्रिया में काफी आसानी से प्रवेश करने में सक्षम बनाया गया है। सत्तासीन सरकार और कॉरपोरेट दिग्गजों के बीच पारस्परिक संबंधों के कारण बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार यानी साठगांठ वाले पूंजीवाद को बढ़ावा मिल रहा है।’ उन्होंने कहा कि छह साल में ३१ पार्टियों को १६,४३८ करोड़ रुपए चंदा मिला है। भूषण ने कहा, ‘चुनावी बॉन्ड (५५.९ प्रतिशत) से ९,१८८ करोड़ रुपए प्राप्त हुए, जिनमें से ४,६१५ करोड़ रुपए कॉरपोरेट क्षेत्र (२८.१ प्रतिशत) और २,६३५ करोड़ रुपए अन्य स्रोतों (१६ प्रतिशत) से थे।’ भूषण ने तर्क दिया कि जब नागरिकों को पार्टियों के वित्तपोषण के स्रोत के बारे में पता नहीं होता है, तो यह जानने के उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है और यह एक साफ-सुथरी पार्टी से संबंधित ईमानदार उम्मीदवार को चुनने के उनके अधिकार को खत्म कर देता है। उन्होंने कहा, ‘चुनावी बॉन्ड भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं, कॉरपोरेट्स के बीच किसी काम के बदले में दिए जाने वाले लाभ की भावना को बढ़ावा दे रहे हैं और चुनावों में समान अवसर को बिगाड़ रहे हैं।’

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