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सरकार की साख पर सवाल क्यों बनाते हैं ऐसे कानून?

योगेश कुमार सोनी

हिट एंड रन को लेकर नए कानून बनाने से सरकार एक बार फिर से घिर गई। सरकार को लगा कि वह इस कानून से ड्राइवरों पर शिकंजा कस लेगी, लेकिन जिस तरह पूरे देशभर में सरकार के खिलाफ बिगुल बजा उससे सरकार को सब अच्छे से समझ में आ गया। ड्राइवरों के आक्रोश के बीच जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ। ट्रांसपोर्टर्स ने जिस तरह देशव्यापी हड़ताल की उससे सब कुछ रुक गया। मामला बिगड़ता देख केंद्रीय गृह सचिव ने उनके साथ बैठक की। सरकार के आश्वासन के बाद ड्राइवरों ने अपना प्रदर्शन वापस ले लिया है। केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला ने मंगलवार को ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के पदाधिकारियों के साथ बैठक की और कहा कि अखिल भारतीय परिवहन कांग्रेस से विचार-विमर्श करने के बाद ही कानून के बारे में निर्णय लिया जाएगा। लेकिन इस प्रकरण से किसानों वाले कानून याद आ गए, जो सरकार को एक लंबे समय बाद वापिस लेने प़ड़े थे। दरअसल, मौजूदा सरकार किसी भी कानून को बिना किसी रिसर्च के बना लेती है, जिससे आम जन प्रभावित हो जाता है। ऐसे घटनाक्रमों से सरकार की कमजोर शैली स्पष्ट झलकती है। हालात व परिस्थिति कमजोर होने से लोकतंत्र कमजोर होता है उससे देश की छवि नकरात्मक बनती है। जहां एक हमारी सरकार अपने आप को विश्व गुरु बताने में लगी रहती है लेकिन वह एसी कमरों से बाहर निकल कर यदि धरातल पर उतरकर आमजन के एहसास को समझकर कानून बनाए तो बात बने। दरअसल, भल्ला ने कहा कि सरकार ये बताना चाहती है कि नए कानून और जुर्माने के प्रावधान अभी लागू नहीं हुए हैं। भारतीय न्याय संहिता की धारा १०६(२) लागू करने से पहले अखिल भारतीय परिवहन कांग्रेस से विचार विमर्श किया जाएगा। ड्राइवरों और ट्रांसपोर्टर की समस्याओं को सुनने के बाद ही पैâसला लिया जाएगा। मात्र कुछ समय की हड़ताल से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने आश्वस्त किया है कि सरकार, कानून के तहत १० साल की सजा और जुर्माने के प्रावधान पर रोक लगाएगी और अगली बैठक तक कोई कानून लागू नहीं किया जाएगा। हिंदुस्थान जैसे देश में हर धर्म,जाति,नस्ल व रंग के लोग रहते हैं, जो सरकार से यह कहता है सबके विषय में एक धारणा के साथ ही सोचे और साथ लेकर चले। किसी भी कानून में तमाम तरह की तकनीकियां होती है और उसे मद्देनजर रखते हुए किसी भी कानून का निर्माण करना चाहिए। यदि सरकार बार-बार इस तरह के प्रयोग करेगी तो उससे भारी नुकसान होता रहेगा। एक दिन की हड़ताल से करोड़ों रुपयों का नुकसान होता है और उसकी भरपाई घूम फिर कर जनता को ही करनी होती है। सरकार अपनी सत्ता व शक्ति का प्रयोग सही तरीके से करे। ऐसे कानून जो किसी को भी संकट में बिना वजह डाल दें उसका कोई फायदा नहीं है। किसी भी कानून को बनाने की एक निश्चित प्रक्रिया होती है और उस कानून के गुण एवं दोषों पर विस्तार से चर्चा की जाती है और फिर उस पर निर्णय लिया जाता है, जिससे कानून विफल न हो और सरकार की साख पर सवाल खड़े न हों। बहरहाल,सरकार को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं।)

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