मुख्यपृष्ठस्तंभदबाव में क्यों है भाजपा

दबाव में क्यों है भाजपा

रमेश सर्राफ धमोरा

राजस्थान विधानसभा के चुनाव का परिणाम घोषित हुए एक सप्ताह के करीब होनेवाला है। उसके उपरांत भी अभी तक न तो विधायक दल की बैठक बुलाई गई है और न ही नेता का नाम ही सामने आया है। जबकि ११५ सीटें जीतकर भाजपा ने पूर्ण बहुमत प्राप्त कर लिया है। राजनीतिक हल्के में चर्चा है कि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे द्वारा मुख्यमंत्री बनने के लिए की जा रही लॉबिंग के चलते विधायक दल का नया नेता चुनने की प्रक्रिया ठंडी पड़ी हुई है। हालांकि, वसुंधरा राजे को दिल्ली बुला लिया गया है। दिल्ली में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा व केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मिलकर राजस्थान की राजनीति पर वे लंबी चर्चा कर चुकी हैं।

इसी दौरान जयपुर में घटे एक घटनाक्रम ने भाजपा के बड़े नेताओं को चौंका दिया है। बारां जिले में किशनगंज से नवनिर्वाचित भाजपा विधायक ललित मीणा के पिता हेमराज मीणा जो स्वयं पूर्व विधायक हैं, ने जयपुर में मीडिया को बताया कि उनके बेटे विधायक ललित मीणा सहित बारां, झालावाड़ जिलों के पांच विधायकों को जयपुर में होटल ‘आपनो राजस्थान’ में जबरन रखा गया है और उन्हें घर नहीं आने दिया जा रहा है। होटल में विधायकों को रखने की बात हेमराज मीणा ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी, संगठन महासचिव चंद्रशेखर, पार्टी के प्रदेश प्रभारी अरुण सिंह को भी बताई। हालांकि, विधायक कंवरलाल मीणा ने आरोप को झूठा बताते हुए कहा कि हम सब अपनी मर्जी से वहां रुके थे। हमें किसी ने जबरन नहीं ठहराया था। जब कुछ अनजान लोग आकर ललित मीणा को ले जाने लगे तो हमने उन्हें नहीं ले जाने दिया और जब हेमराज मीणा अपने पुत्र विधायक ललित मीणा को लेने आए तो उनके साथ भेज दिया था। जयपुर में हुई इस घटना से भाजपा आलाकमान के कान खड़े हो गए और उन्हें एहसास हो गया कि प्रदेश में सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा है। इससे पूर्व वसुंधरा राजे के यहां करीबन तीन दर्जन विधायक उनसे मिलने पहुंचे थे, जिसे वसुंधरा राजे गुट द्वारा अपने शक्ति प्रदर्शन के रूप में प्रचारित किया गया था। वसुंधरा राजे गुट के कालीचरण सर्राफ सहित कई विधायकों का कहना था कि उनके समर्थन में ५० से अधिक विधायक हैं। ऐसे में उनको तीसरी बार भी मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए। वैसे भी राजस्थान में भाजपा के पास वसुंधरा राजे से अधिक लोकप्रिय कोई चेहरा नहीं है। वहीं राजनीतिक हलकों से निकलनेवाली बातों से लगता है कि भाजपा आलाकमान किसी भी स्थिति में वसुंधरा राजे को तीसरी बार मुख्यमंत्री बनाने के मूड में नहीं है। वसुंधरा राजे के लिए सबसे नकारात्मक बात उनका दो बार मुख्यमंत्री बनने के बाद दोनों ही बार पार्टी का चुनाव हार जाना रहा है। पार्टी नेताओं का मानना है कि चुनाव के समय वसुंधरा राजे कांग्रेस सरकार की एंटी इनकम्बेंसी के बल पर सरकार बना लेती हैं। मगर खुद के मुख्यमंत्री रहते भी उनकी सरकार के प्रति आमजन में भारी नाराजगी व्याप्त हो जाती है और उन्हें सत्ता से हटाना पड़ता है। इस बार पार्टी आलाकमान चाहता है कि ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया जाए जो पांच साल बाद फिर से सरकार रिपीट कर सके। मगर वसुंधरा राजे अपनी जिद पर अड़ी हुई हैं कि वह स्वयं के अलावा अन्य किसी को मुख्यमंत्री पद पर बैठने नहीं देना चाहती हैं।

राजस्थान में भाजपा की सरकार गठन में अबकी बार जितना समय बीत रहा है, उतना पहले कभी नहीं लगा। इसलिए लोगों के मन में संशय पैदा हो रहा है। हालांकि, पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने केंद्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, राज्यसभा सांसद सरोज पांडे और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावडे को राजस्थान के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त किया है, जो राजस्थान के विधायकों से मिलकर रायशुमारी कर विधायक दल की बैठक बुलाएंगे। राजनाथ सिंह का राजस्थान में पर्यवेक्षक बनकर आना अपने आप में बहुत कुछ कहता है। वैसे भी प्रदेश के सभी नेताओं से उनका व्यक्तिगत संपर्क है। वसुंधरा राजे ने भी राजनाथ सिंह के साथ लंबे समय तक काम किया है। इसलिए राजनाथ सिंह के पर्यवेक्षक बनने के बाद यह अनुमान लगाए जा रहा है कि उनको वसुंधरा राजे को अच्छे से हैंडल करना आता है। जिसे पार्टी ने मुख्यमंत्री बनना तय किया है, वही भाजपा के नवनिर्वाचित विधायक दल का नेता चुना जाएगा। हो सकता है आनेवाले समय में वसुंधरा राजे को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया जाए। फिलहाल, तो वह पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनी हुई हैं। ऐसे में देखना होगा कि सरकार के गठन से पहले ही भाजपा में जो गुटबाजी पनपी है। उसे पार्टी मिटा पाती है या नहीं, इसका पता तो आनेवाले समय में ही चल पाएगा।
(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं। इनके लेख देश के कई समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं।)

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